Monday, August 27, 2012

जिनका जीवन आज भी किसी संत या महापुरुष के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सान्निध्य में है, उनके जीवन में निश्चिन्तता, निर्विकारिता, निर्भयता, प्रसन्नता, सरलता, समता व दयालुता के दैवी गुण साधारण मानवों की अपेक्षा अधिक ही होते हैं तथा देर-सवेर वे भी महान हो जाते हैं और जो लोग महापुरुषों का, धर्म का सामीप्य व मार्गदर्शन पाने से कतराते हैं, वे प्रायः अशांत, उद्विग्न व दुःखी देखे जाते हैं व भटकते रहते हैं। इनमें से कई लोग आसुरी वृत्तियों से युक्त होकर संतों के निन्दक बनकर अपना सर्वनाश कर लेते हैं।

अति नींद करने वाला, जड़, स्थूलकाय, निष्क्रिय, आलसी एवं मूर्ख मन का शिष्य गुरू संतुष्ट हों, इस प्रकार उनकी सेवा नहीं कर सकता।
जिस शिष्य में उपदेश के आचरण का गुण होता है वह अपने गुरू की सेवा में सफल होता है। आबादी एवं अमरत्व उसको आ मिलते है।
गुरू की सेवा करने की उत्कण्ठा एवं लगन शिष्य में होनी चाहिए।
गुरू के प्रति भक्तिभाव तमाम योग्य मानवमहेच्छाओं का एकमात्र ध्येय है।
शिष्य जब गुरू के पास रहकर अभ्यास करता हो तब उसके कान श्रवण के लिए तत्पर होने चाहिए। वह जब गुरू की सेवा करता हो तब उसकी दृष्टि सावधान होनी चाहिए।
शिष्य को अपने गुरू, माँ-बाप, बुजुर्ग, सब योगी एवं संतों के साथ अच्छी तरह बरताव करना चाहिए।
अच्छी तरह बरताव करना माने अपने गुरू के प्रति अच्छा आचरण करना।
गुरू शिष्य के आचरण पर से उसका स्वभाव तथा उसके मन की पद्धति जान सकते हैं।
अपने पवित्र गुरू के प्रति अच्छा आचरण परम सुख के धाम का पासपोर्ट है।
शिष्य जब गुरू की सेवा करता हो तब उसे तरंगी नहीं बनना चाहिए।
अपने गुरू की सेवा करके प्राप्त किये हुए व्यवहारू ज्ञान की अभिव्यक्ति है ‘आचरण ’।
दैवी एवं उत्तम गुण दुकान से खरीद करने की चीजें नहीं हैं। वे गुण तो लम्बे समय तक की हुई गुरू सेवा, श्रद्धा एवं भक्तिभाव द्वारा ही प्राप्त किये जा सकते हैं।

संत में एक भी सदगुण दिखे तो लाभ ले लें। उनमें दोष देखना और सुनना अपने को मुक्तिफल से वंचित करके अशांति की आग में झोंकने के बराबर है।

श्री योगवाशिष्ठ महारामायण' के निर्वाण प्रकरण के 208वें सर्ग में आता हैः "हे रामजी ! जिसकी संतों की संगति प्राप्त होती है, वह भी संत हो जाता है। संतों का संग वृथा नहीं जाता। जैसे, अग्नि से मिला पदार्थ अग्निरूप हो जाता है, वैसे ही संतों के संग से असंत भी संत हो जाता है और मूर्खों की संगति से साधु भी मूर्ख हो जाता है। जैसे, उज्जवल वस्त्र मल के संग से मलिन हो जाता है, वैसे ही मूढ़ का संग करने से साधु भी मूढ़ हो जाता है। क्योंकि पाप के वश उपद्रव भी होते हैं, इसी से दुर्जनों की संगति से साधु को भी दुर्जनता घेर लेती है। इससे हे राम! दुर्जन की संगति सर्वथा त्यागनी चाहिए और संतों की संगति कर्त्तव्य है। जो परमहंस संत मिले और जो साधु हो और जिसमें एक गुण भी शुभ हो, उसका भी अंगीकार कीजिए, परंतु साधु के दोष न विचारिये, उसके शुभ गुण ही ग्रहण कीजिये।"

द्वेष बुद्धि से तो श्रीकृष्ण, श्रीराम, संत कबीर आदि दुनिया के सभी संतों में दोष देखने को मिलेंगे। उनके यश को देखकर निंदा करने वाले भी बहुत मिलेंगे, परंतु गुणग्राहियों ने संत-महापुरुषों से लाभ उठाया है और अपना जीवन सफल किया है।

सद्गुरु को तुम खोज नहीं सकते, प्रत्युत जब तुम्हारे भीतर सत्य की सच्ची प्यास होती है, तब सद्गुरु स्वयं जी खोज लेते हैं....