Wednesday, September 26, 2012

श्री योगवसिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
हे देवि! जब इस प्रकार राजा ने मुझसे कहा तब मैं विमान और अप्सरा आदि सबको लेकर स्वर्ग को गया और सम्पूर्ण वृत्तान्त इन्द्र से कहा । इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और सुन्दर वाणी से मुझसे बोला कि: हे दूत! तुम फिर जहाँ राजा है वहाँ जाओ । वह संसार से उपराम हुआ है । उसको अब आत्मपद की इच्छा हुई है इसलिये तुम उसको अपने साथ वाल्मीकिजी के पास , जिसने आत्मतत्त्व को आत्माकार जाना है, ले जाकर मेरा यह सन्देशा देना कि हे महाऋषे! इस राजा को तत्त्वबोध का उपदेश करना क्योंकि यह बोध का अधिकारी है । इसको स्वर्ग तथा और पदार्थों भी इच्छा नहीं, इससे तुम इसको तत्त्व बोध का उपदेश करो और यह तत्त्वबोध को पाकर संसारदुःख से मुक्त हो ।
हे सुभद्रे! जब इस प्रकार देवराज ने मुझसे कहा तब मैं वहाँ से चलकर राजाके निकट आया और उससे कहा कि हे राजन्! तुम संसारसमुद्र से मोक्ष होने के निमित्त वाल्मीकिजी के पास चलो; वे तुमको उपदेश करेंगे । उसको साथ लेकर मैं वाल्मीकिजी स्थान पर आया और उस स्थान में राजा को बैठा और प्रणामकर इन्द्र का सन्देशा दिया । तब वाल्मीकिजी ने कहा: हे राजन् कुशल तो है? राजा बोले, हे भगवान्! आप परमतत्त्वज्ञ और वेदान्त जाननेवालों में श्रेष्ठ हैं, मैं आपके दर्शन करके कृतार्थ हुआ और अब मुझको कुशलता प्राप्त हुई है । मैं आपसे पूछता हूँ कृपा करके उत्तर दीजिए कि संसार बन्धन से कैसे मुक्ति हो?
शेष कल......
अपने स्वरूप का पता नहीं है, इसीलिए जीव बिचारा विषय विकारों में
भटक-भटककर अपना जीवन गँवा देता है। समझदार लोग समझते हैं कि शरीर की
नश्वरता क्या है। आग लगने पर कुआँ खोदना पड़े, उसके पहले ही कुआँ खोदकर
तैयार कर देते हैं।

बुढ़ापा आने से पूर्व ही शरीर को विषय-विकारों में न गिराकर परमात्मा के
ज्ञान में लगा देते हैं। सारी रात दूसरों की नींद खराब हो और लोग बोलने
लगें कि बुढ्ढा जल्दी मर जाये तो अच्छा, उसके पहले वह अपने अहंकार को मार
देता है, वासना को मार देता है।

चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ जायें और चेहरा भद्दा हो जाये उसके पहले वह अपना
असली चेहरा देख लेता है। बाल सफेद होने से पूर्व वह अपना हृदय स्वच्छ कर
लेता है। आँखें कमजोर हो जायें, कान बहरे हो जायें और मित्र-संबंधी सब
पराये होने लग जायें, इसके पूर्व वह परमात्मा का हो जाने की कोशिश करता
है।…….पूज्यपाद श्रीबापूजी
उठ जाओ और वैराग्य का आश्रय लो। जैसे साईकल के पहिए निकाल दो तो साईकल
चलना मुश्किल है ऐसे ही जीवन से अभ्यास और वैराग्य हटा दो तो प्रभु की
यात्रा होना मुश्किल है।

अतः तुम ध्यान का अभ्यास करो और विवेक के साथ अपने भीतर छुपे हुए वैराग्य
को जगाकर वैराग्य में ही राग रखो। वैराग्यरागरसिको भवः। संसार के राग से
बचकर प्रभु परायण हो जाओ।

भगवन कहते हैं: जैसे कोई व्यक्ति आँखों में शूल नहीं भोंकना चाहता ऐसे ही
समझदार व्यक्ति अपने आप को विषयों के शूल नहीं भोंकना चाहता। जैसे कोई भी
समझदार मनुष्य अपने भोजन में विष नहीं डालना चाहता, ऐसे ही हे उद्धव !
जिज्ञासु व्यक्ति अपने जीवन में विषयों का विष नहीं डालना
चाहता।…….पूज्यपाद श्रीबापूजी