Tuesday, April 17, 2012

शरीर की मौत हो जाना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन श्रद्धा की मौत हुई तो समझो सर्वनाश हुआ।
शिष्य चार प्रकार के होते हैं:
1. एक वे होते हैं जो गुरु के भावों को समझकर उसी प्रकार से सेवा, कार्य और चिंतन करने लगते हैं | 2.दूसरे वे होते हैं जो गुरु के संकेत के अनुसार कार्य करते हैं |
3.तीसरे वे होते हैं जो आज्ञा मिलने पर काम करते हैं और
4.चौथे वे होते हैं जिनको गुरु कुछ कार्य बताते हैं तो ‘हाँ जी… हाँ जी…’ करते रहते हैं किन्तु काम कुछ नहीं करते | सेवा का दिखावामात्र ही करते हैं |

गुरू की सेवा साधु जाने, गुरुसेवा का मुढ पिछानै |
खाली हाथों को भरना यहाँ आम होता है,
मैं कौन हूँ , यह जानों यही पैगाम होता है,
जीवन तो बदला है, यही आने से हमारा सबका,
कृपा आपकी होती है मुकद्दर का नाम होता है.....
बहुत से रास्ते यूँ तो दिल की तरफ जाते हैं।
राहे मोहब्बत से आओ तो फासला बहुत कम है।

जीवत्मा अगर परमात्मा से मिलने के लिए तैयार हो तो परमात्मा का मिलना भी असंभव नहीं। कुछ समय अवश्य लगेगा क्योंकि पुरानी आदतों से लड़ना पड़ता है, ऐहिक संसार के आकर्षणों से सावधानीपूर्वक बचना पड़ता है। तत्पश्चात् तो आपको रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होगी, मनोकामनाएँ पूर्ण होने लगेगी, वाकसिद्धि होगी, पूर्वाभ्यास होने लगेंगे, अप्राप्य एवं दुर्लभ वस्तुएँ प्राप्य एवं सुलभ होने लगेंगी, धन-सम्पत्ति, सम्मान आदि मिलने लगेंगे।
उपरोक्त सब सिद्धियाँ इन्द्रदेव के प्रलोभन हैं।
कभी व्यर्थ की निन्दा होने लगेगी। इससे भयभीत न हुए तो बेमाप प्रशंसा मिलेगी। उसमें भी न उलझे तब प्रियतम परमात्मा की पूर्णता का साक्षात्कार हो जाएगा।
दर्द दिल में छुपाकर मुस्कुराना सीख ले।
गम के पर्दे में खुशी के गीत गाना सीख ले।।
तू अगर चाहे तो तेरा गम खुशी हो जाएगा।
मुस्कुराकर गम के काँटों को जलाना सीख ले।।
दर्द का बार-बार चिन्तन मत करो, विक्षेप मत बढ़ाओ। विक्षेप बढ़े ऐसा न सोचो, विक्षेप मिटे ऐसा उपाय करो। विक्षेप मिटाने के लिए भगवान को प्यार करके 'हरि ॐ' तत् सत् और सब गपशप का मानसिक जप या स्मरण करो। ईश्वर को पाने के कई मार्ग हैं लेकिन जिसने ईश्वर को अथवा गुरूतत्त्व को प्रेम व समर्पण किया है, उसे बहुत कम फासला तय करना पड़ा है।

श्रद्धा की रक्षा एवं संवर्धन ....

श्रद्धा मन का विषय है और मन चंचल है । मनुष्य जब सत्त्वगुण में होता है, तब श्रद्धा पुष्ट होती है ।

सत्त्वगुण बढ़ता है सात्त्विक आहार-विहार से, सात्त्विक वातावरण में रहने से एवं सत्संग सुनने से । मनुष्य जब रजो-तमोगुणी जीवन जीता है, तो मति नीचे के केन्द्रों में, हलके केन्द्रो में पहुँच जाती है । मति जब नीचे चली जाती है, तब लगता है कि झूठ बोलने में, कपट करने में सार है, कोर्ट कचहरी जाना चाहिए… आदि-आदि ।

श्रद्धा बनी रहे उसके लिए क्या करना चाहिए ? अपनी श्रद्धा, स्वास्थ्य और सूझबूझ को बुलंद बनाये रखने एवं विकसित करने के लिए अपना आहार शुद्ध रखें । यदि असात्त्विक आहार के कारण मन में जरा भी मलिनता आती है तो श्रद्धा घटने लगती है । अत: श्रद्धा को बनाये रखने के लिए आहार शुद्धि का ध्यान रखें ।

पवित्र संग करें, सत्संग में जायें एवं पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करें ।

Sunday, April 15, 2012

जैसे भगवान निर्वासनिक हैं, निर्भय हैं, आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे तुम भी निर्वासनिक और निर्भय होकर आनन्द में रहो। यही उसकी महा पूजा है।
मन को उदास मत करो। सदैव प्रसन्नमुख रहो। हँसमुख रहो। तुम आनन्दस्वरूप हो। भय, शोक, चिन्ता आदि ने तुम्हारे लिए जन्म ही नहीं लिया है, ऐसी दृढ़ निष्ठा के साथ सदैव अपने आत्मभाव में स्थिर रहो।
शरीर की मौत हो जाना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन श्रद्धा की मौत हुई तो समझो सर्वनाश हुआ।
बिना तेरे मन में, समाये ना कोई,
लगन का ये दीपक, बुझाए ना कोई,
तूही मेरी कश्ती, तू ही किनारा,
तुम्हारा ही गुणगान, गाता रहूँ मैं,
हृदय से तुम्ही को, ध्याता रहूँ मैं,
... तुम्हारे सिवा अब, लगे कुछ ना प्यारा,
तुम्हे क्या बताऊँ की, तुम मेरे क्या हो,
मेरी जिंदगी का, तुम्ही आसरा हो,
तुम्ही ने बनाया, जीवन हमारा,

Thursday, April 12, 2012

हे मेरे प्रभु … !
तुम दया करना । मेरा मन … मेरा चित्त तुममें ही लगा रहे ।
अब … मैं कब तक संसारी बोझों को ढोता फिरुँगा … ? मेरा मन अब तुम्हारी यात्रा के लिए ऊर्ध्वगामी हो जाये … ऐसा सुअवसर प्राप्त करा दो मेरे स्वामी … !
हे मेरे अंतर्यामी ! अब मेरी ओर जरा कृपादृष्टि करो … । बरसती हुई आपकी अमृतवर्षा में मैं भी पूरा भीग जाऊँ …। मेरा मन मयूर अब एक आत्मदेव के सिवाय किसीके प्रति टहुँकार न करे ।

हे प्रभु ! हमें विकारों से, मोह ममता से, साथियों से बचाओ …अपने आपमें जगाओ ।

हे मेरे मालिक ! अब … कब तक … मैं भटकता रहूँगा ? मेरी सारी उमरिया बिती जा रही है … कुछ तो रहमत करो कि अब … आपके चरणों का अनुरागी होकर मैं आत्मानन्द के महासागर में गोता लगाऊँ ।

ॐ शांति ! ॐ आनंद !!
सोऽहम् सोऽहम् सोऽहम्

आखिर यह सब कब तक … ? मेरा जीवन परमात्मा की प्राप्ति के लिए है, यह क्यों भूल जाता हूँ ?

मुझे … अब … आपके लिए ही प्यास रहे प्रभु … !
अब प्रभु कृपा करौं एहि भाँति ।
सब तजि भजन करौं दिन राती ||

आँखों के द्वारा, कानों के द्वारा दुनियाँ भीतर घुसती है और चित्त को चंचल करती है । जप, ध्यान, स्मरण, शुभ कर्म करने से बुद्धि स्वच्छ होती है । स्वच्छ बुद्धि परमात्मा में शांत होती है और मलिन बुद्धि जगत में उलझती है । बुद्धि जितनी जितनी पवित्र होती है उतनी उतनी परम शांति से भर जाती है । बुद्धि जितनी जितनी मलिन होती है, उतनी संसार की वासनाओं में,विचारों में भटकती है ।

आज तक जो भी सुना है, देखा है, उसमें बुद्धि गई लेकिन मिला क्या? आज के बाद जो देखेंगे, सुनेंगे उसमें बुद्धि को दौड़ायेंगे लेकिन अन्त में मिलेगा क्या? श्रीकृष्ण कहते हैं :

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥

जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरुप दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जायेगा ।

यह कौन सा उकदा है जो हो नहीं सकता ।

तेरा जी न चाहे तो हो नहीं सकता ॥

छोटा सा कीड़ा पत्थर में घर करे ।

और इन्सान क्या दिले दिलबर में घर न करे ॥

देखा अपने आपको, मेरा दिल दीवाना हो गया ।
ना छेड़ो मुझे यारों ! मैं खुद पे मस्ताना हो गया ॥
देखा अपने आपको, मेरा दिल दीवाना हो गया ।
ना छेड़ो मुझे यारों ! मैं खुद पे मस्ताना हो गया ॥
दु:ख और चिन्ता, हताशा और परेशानी, असफलता और दरिद्रता भीतर की चीजें होती हैं, बाहर की नहीं । जब भीतर तुम अपने को असफल मानते हो तब बाहर तुम्हें असफलता दिखती है ।

भीतर से तुम दीन हीन मत होना । घबराहट पैदा करनेवाली परिस्थितियों के आगे भीतर से झुकना मत । ॐकार का सहारा लेना । मौत भी आ जाए तो एक बार मौत के सिर पर भी पैर रखने की ताकत पैदा करना । कब तक डरते रहोगे ? कब तक मनौतियाँ मनाते रहोगे ? कब तक नेताओं को, साहबों को, सेठों को, नौकरों को रिझाते रहोगे ? तुम अपने आपको रिझा लो एक बार । अपने आपसे दोस्ती कर लो एक बार । बाहर के दोस्त कब तक बनाओगे ?

कबीरा इह जग आय के, बहुत से कीने मीत ।
जिन दिल बाँधा एक से, वे सोये निश्चिंत ॥

बहुत सारे मित्र किये लेकिन जिसने एक से दिल बाँधा वह धन्य हो गया । अपने आपसे दिल बाँधना है । यह ‘एक’ कोई आकाश पाताल में नहीं बैठा है । कहीं टेलिफोन के खम्भे नहीं डालने हैं, वायरिंग नहीं जोड़नी है । वह ‘एक’ तो तुम्हारा अपना आपा है । वह ‘एक’ तुम्हीं हो । नाहक सिकुड़ रहे हो । ‘यह मिलेगा तो सुखी होऊँगा, वह मिलेगा तो सुखी होऊँगा …’

अरे ! सब चला जाए तो भी ठीक है, सब आ जाए तो भी ठीक है । आखिर यह संसार सपना है । गुजरने दो सपने को । हो होकर क्या होगा ? क्या नौकरी नहीं मिलेगी ? खाना नहीं मिलेगा ? कोई बात नहीं । आखिर तो मरना है इस शरीर को । ईश्वर के मार्ग पर चलते हुए बहुत बहुत तो भूख प्यास से पीड़ित हो मर जायेंगे । वैसे भी खा खाकर लोग मरते ही हैं न ! वास्तव में होता तो यह है कि प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलनेवाले भक्त की रक्षा ईश्वर स्वयं करते हैं । तुम जब निश्चिंत हो जाओगे तो तुम्हारे लिए ईश्वर चिन्तित होगा कि कहीं भूखा न रह जाए ब्रह्मवेत्ता ।

Wednesday, April 11, 2012

आदत के गुलाम ....

एक सज्जन ने पूछाः "गाँधी जी के बारे में उनके आश्रमवासी प्यारेलाल ने जो लिखा है, क्या आप उसे जानते हैं?"
दूसराः "हाँ, मैं उसे जानता हूँ।"
पहलाः "क्या यह सब सत्य होगा?"
दूसराः "हमें उस पर विचार करने की आवश्यकता ही क्या है? जिसे अभद्रता पसन्द है, चन्द्रमा में भी कलंक देखेगा। वह चन्द्र की शीतल चाँदनी का लाभ लेने के बदले दूसरी-तीसरी बातें करेगा, क्या यह ठीक माना जायेगा?
मैंने अनेक अनुभवों के बाद यह निश्चय किया है कि जिस बरसात से फसल पैदा न हो, वह बरसात नहीं झींसी है। इस संसार में ऐसे अनेक मनुष्य हैं, जो अपनी अलभ्य चैतन्य शक्ति को इधर-उधर नष्ट कर देते हैं। ऐसे लोग अमृत को भी विष बनाकर ही पेश करते हैं।"

दुष्टता की दुनिया....

मार्टिन लूथर नामक एक गुरु ने क्रिश्चियन धर्म में प्रचलित अनेक बुराइयों और मतभेदों को सुधारने के लिए झंडा उठाया तो पोप और उनके सहयोगियों ने मार्टिन को इतना हैरान करना आरंभ किया कि उनके एक शिष्य ने गुरु से कहाः "गुरुजी! अब तो हद हो गई है। अब एक शाप देकर इन सब लोगों को जला कर राख कर दीजिए।"
लूथरः "ऐसा कैसे हो सकता है?"
शिष्यः "आपकी प्रार्थना तो भगवान सुनते हैं। उन्हें प्रार्थना में कह दें कि इन सब पर बिजली गिरे।"
लूथरः "वत्स! यदि मैं भी ऐसा ही करने लगूँ तो मुझमें और उनमें क्या अन्तर रह जाएगा?"
शिष्यः "लेकिन इन लोगों का अविवेक, अन्याय और इनकी नासमझी तो देखिये! क्या बिगाड़ा है आपने इनका.....? आप जैसे सात्त्विक सज्जन और परोपकारी संत को ये नालायक, दुष्ट और पापी जन......"
शिष्य आगे कुछ और बोले उसके पहले ही लूथर बोल पड़ेः "उसे देखना हमारा काम नहीं है। हमें तो अपने ढंग से असत्य और विकृतियों को उखाड़ फेंकने का काम करना है। शेष सारा काम भगवान को स्वयं देखना है।"
शिष्य से रहा न गया तो उसने पुनः विनम्रता से कहाः "गुरुदेव! आप अपनी शक्ति आजमा कर ही उन्हें क्यों नहीं बदल देते? आप तो सर्वसमर्थ हैं।"
लूथरः "यदि राग और द्वेष, रोग और दोष अन्तःकरण से न घटे तो गुरुदेव किस प्रकार सहायक बन सकते हैं? मेरा काम है दुरित (पाप) का विसर्जन कर सत्य और शुभ का नवसर्जन करना। दूसरों को जो करना हो, करें। अपना काम तो अपने रास्ते पर दृढ़तापूर्वक चलना है।"

Shree Ashraramayan ....

गुरु चरण रज शीष धरि, हृदय रूप विचार।

श्रीआसारामायण कहौं, वेदान्त को सार।।

धर्म कामार्थ मोक्ष दे, रोग शोक संहार।

भजे जो भक्ति भाव से, शीघ्र हो बेड़ा पार।।


भारत सिंधु नदी बखानी, नवाब जिले में गाँव बेराणी।

रहता एक सेठ गुण खानि, नाम थाऊमल सिरुमलानी।।

आज्ञा में रहती मेंहगीबा, पतिपरायण नाम मंगीबा।

चैत वद छः उन्नीस अठानवे, आसुमल अवतरित आँगने।।

माँ मन में उमड़ा सुख सागर, द्वार पै आया एक सौदागर।

लाया एक अति सुन्दर झूला, देख पिता मन हर्ष से फूला।।

सभी चकित ईश्वर की माया, उचित समय पर कैसे आया।

ईश्वर की ये लीला भारी, बालक है कोई चमत्कारी।।


संत की सेवा औ' श्रुति श्रवण, मात पिता उपकारी।

धर्म पुरुष जन्मा कोई, पुण्यों का फल भारी।।



सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी।

समाज में थी मान्यता जैसी, प्रचलित एक कहावत ऐसी।।

तीन बहन के बाद जो आता, पुत्र वह त्रेखन कहलाता।

होता अशुभ अमंगलकारी, दरिदता लाता है भारी।।

विपरीत किंतु दिया दिखाई, घर में जैसे लक्ष्मी आयी।

तिरलोकी का आसन डोला, कुबेर ने भंडार ही खोला।

मान प्रतिष्ठा और बड़ाई, सबके मन सुख शांति छाई।।


तेजोमय बालक बढ़ा, आनन्द बढ़ा अपार।

शील शांति का आत्मधन, करने लगा विस्तार।।



एक दिना थाऊमल द्वारे, कुलगुरु परशुराम पधारे।

ज्यूँ ही बालक को निहारे, अनायास ही सहसा पुकारे।।

यह नहीं बालक साधारण, दैवी लक्षण तेज है कारण।

नेत्रों में है सात्विक लक्षण, इसके कार्य बड़े विलक्षण।।

यह तो महान संत बनेगा, लोगों का उद्धार करेगा।

सुनी गुरु की भविष्यवाणी, गदगद हो गये सिरुमलानी।

माता ने भी माथा चूमा, हर कोई ले करके घूमा।।


ज्ञानी वैरागी पूर्व का, तेरे घर में आय।

जन्म लिया है योगी ने, पुत्र तेरा कहलाय।।

पावन तेरा कुल हुआ, जननी कोख कृतार्थ।

नाम अमर तेरा हुआ, पूर्ण चार पुरुषार्थ।।



सैतालीस में देश विभाजन, पाक में छोड़ा भू पशु औ' धन।

भारत अमदावाद में आये, मणिनगर में शिक्षा पाये।।

बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति, आसुमल की आशु युक्ति।

तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता, त्वरित कार्य औ' सहनशीलता।।

आसुमल प्रसन्न मुख रहते, शिक्षक हँसमुखभाई कहते।

पिस्ता बादाम काजू अखरोटा, भरे जेब खाते भर पेटा।।

दे दे मक्खन मिश्री कूजा, माँ ने सिखाया ध्यान औ' पूजा।

ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे, रहे न मछली जल बिन जैसे।।

हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे, वही है विद्या या विमुक्तये।

बहुत रात तक पैर दबाते, भरे कंठ पितु आशीष पाते।।


पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम।

लोगों के तुम से सदा, पूरण होंगे काम।।



सिर से हटी पिता की छाया, तब माया ने जाल फैलाया।

बड़े भाई का हुआ दुःशासन, व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन।।

छूटा वैभव स्कूली शिक्षा, शुरु हो गयी अग्नि परीक्षा।

गये सिद्धपुर नौकरी करने, कृष्ण के आगे बहाये झरने।।

सेवक सखा भाव से भीजे, गोविन्द माधव तब रीझे।

एक दिन एक माई आई, बोली हे भगवन सुखदाई।।

पड़े पुत्र दुःख मुझे झेलने, खून केस दो बेटे जेल में।

बोले आसु सुख पावेंगे, निर्दोष छूट जल्दी आवेंगे।

बेटे घर आये माँ भागी, आसुमल के पाँवों लागी।।


आसुमल का पुष्ट हुआ, अलौकिक प्रभाव।

वाकसिद्धि की शक्ति का, हो गया प्रादुर्भाव।।


बरस सिद्धपुर तीन बिताये, लौट अमदावाद में आये।

करने लगी लक्ष्मी नर्तन, किया भाई का दिल परिवर्तन।।

दरिद्रता को दूर कर दिया, घर वैभव भरपूर कर दिया।

सिनेमा उन्हें कभी न भाये, बलात् ले गये रोते आये।।

जिस माँ ने था ध्यान सिखाया, उसको ही अब रोना आया।

माँ करना चाहती थी शादी, आसुमल का मन वैरागी।।

फिर भी सबने शक्ति लगाई, जबरन कर दी उनकी सगाई।

शादी को जब हुआ उनका मन, आसुमल कर गये पलायन।।


पंडित कहा गुरु समर्थ को, रामदास सावधान।

शादी फेरे फिरते हुए, भागे छुड़ाकर जान।।



करत खोज में निकल गया दम, मिले भरूच में अशोक आश्रम।

कठिनाई से मिला रास्ता, प्रतिष्ठा का दिया वास्ता।।

घर में लाये आजमाये गुर, बारात ले पहुँचे आदिपुर।

विवाह हुआ पर मन दृढ़ाया, भगत ने पत्नी को समझाया।।

अपना व्यवहार होगा ऐसे, जल में कमल रहता है जैसे।

सांसारिक व्यौहार तब होगा, जब मुझे साक्षात्कार होगा।

साथ रहे ज्यूँ आत्माकाया, साथ रहे वैरागी माया।।


अनश्वर हूँ मैं जानता, सत चित हूँ आनन्द।

स्थिति में जीने लगूँ, होवे परमानन्द।।


मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु, संस्कृत भाषा है एक सेतु।

संस्कृत की शिक्षा पाई, गति और साधना बढ़ाई।।

एक श्लोक हृदय में पैठा, वैराग्य सोया उठ बैठा।

आशा छोड़ नैराश्यवलंबित, उसकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित।।

लक्ष्मी देवी को समझाया, ईश प्राप्ति ध्येय बताया।

छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा, लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा।।

केदारनाथ के दर्शन पाये, लक्षाधिपति आशिष पाये।

पुनि पूजा पुनः संकल्पाये, ईश प्राप्ति आशिष पाये।।

आये कृष्ण लीलास्थली में, वृन्दावन की कुंज गलिन में।

कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला, वे जा पहुँचे नैनिताला।।

वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित, स्वामी लीलाशाह प्रतिष्ठित।

भीतर तरल थे बाहर कठोरा, निर्विकल्प ज्यूँ कागज कोरा।

पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी, ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी।।


ईशकृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान।

ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान।।



जानने को साधक की कोटि, सत्तर दिन तक हुई कसौटी।

कंचन को अग्नि में तपाया, गुरु ने आसुमल बुलवाया।।

कहा गृहस्थ हो कर्म करना, ध्यान भजन घर ही करना।

आज्ञा मानी घर पर आये, पक्ष में मोटी कोरल धाये।।

नर्मदा तट पर ध्यान लगाये, लालजी महाराज आकर्षाये।

सप्रेम शीलस्वामी पहँ धाये, दत्तकुटीर में साग्रह लाये।।

उमड़ा प्रभु प्रेम का चसका, अनुष्ठान चालीस दिवस का।

मरे छः शत्रु स्थिति पाई, ब्रह्मनिष्ठता सहज समाई।।

शुभाशुभ सम रोना गाना, ग्रीष्म ठंड मान औ' अपमाना।

तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास, महल औ' कुटिया आसनिरास।

भक्तियोग ज्ञान अभ्यासी, हुए समान मगहर औ' कासी।।


भव ही कारण ईश है, न स्वर्ण काठ पाषान।

सत चित्त आनंदस्वरूप है, व्यापक है भगवान।।

ब्रह्मेशान जनार्दन, सारद सेस गणेश।

निराकार साकार है, है सर्वत्र भवेश।।


हुए आसुमल ब्रह्माभ्यासी, जन्म अनेकों लागे बासी।

दूर हो गई आधि व्याधि, सिद्ध हो गई सहज समाधि।।

इक रात नदी तट मन आकर्षा, आई जोर से आँधी वर्षा।

बंद मकान बरामदा खाली, बैठे वहीं समाधि लगा ली।।

देखा किसी ने सोचा डाकू, लाये लाठी भाला चाकू।

दौड़े चीखे शोर मच गया, टूटी समाधि ध्यान खिंच गया।।

साधक उठा थे बिखरे केशा, राग द्वेष ना किंचित् लेशा।

सरल लोगों ने साधु माना, हत्यारों ने काल ही जाना।।

भैरव देख दुष्ट घबराये, पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाये।

कामीजनों ने आशिक माना, साधुजन कीन्हें परनामा।।


एक दृष्टि देखे सभी, चले शांत गम्भीर।

सशस्त्रों की भीड़ को, सहज गये वे चीर।।



माता आई धर्म की सेवी, साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी।

दोनों फूट-फूट के रोई, रुदन देख करुणा भी रोई।।

संत लालजी हृदय पसीजा, हर दर्शक आँसू में भीजा।

कहा सभी ने आप जाइयो, आसुमल बोले कि भाइयों।।

चालीस दिवस हुआ न पूरा, अनुष्ठान है मेरा अधूरा।

आसुमल ने छोड़ी तितिक्षा, माँ पत्नी ने की परतीक्षा।।

जिस दिन गाँव से हुई विदाई, जार जार रोय लोग-लुगाई।

अमदावाद को हुए रवाना, मियाँगाँव से किया पयाना।।

मुंबई गये गुरु की चाह, मिले वहीं पै लीलाशाह।

परम पिता ने पुत्र को देखा, सूर्य ने घटजल में पेखा।।

घटक तोड़ जल जल में मिलाया, जल प्रकाश आकाश में छाया।

निज स्वरूप का ज्ञान दृढ़ाया, ढाई दिवस होश न आया।।


आसोज सुद दो दिवस, संवत् बीस इक्कीस।

मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस।।

देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ निस्सार।

हुआ आत्मा से तभी, अपना साक्षात्कार।।



परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया, जीव गया और शिव को पाया।

जान लिया हूँ शांत निरंजन, लागू मुझे न कोई बन्धन।।

यह जगत सारा है नश्वर, मैं ही शाश्वत एक अनश्वर।

दीद हैं दो पर दृष्टि एक है, लघु गुरु में वही एक है।।

सर्वत्र एक किसे बतलाये, सर्वव्याप्त कहाँ आये जाये।

अनन्त शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी।।

सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा, चले उसकी इच्छानुसारा।

यदि वह संकल्प चलाये, मुर्दा भी जीवित हो जाये।।


ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे ना शेष।

मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।


पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।

आसुमल से हो गये, साँई आसाराम।।



जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते, ब्रह्मानन्द का आनन्द लेते।

खाते पीते मौन या कहते, ब्रह्मानन्द मस्ती में रहते।।

रहो गृहस्थ गुरु का आदेश, गृहस्थ साधु करो उपदेश।

किये गुरु ने वारे न्यारे, गुजरात डीसा गाँव पधारे।

मृत गाय दिया जीवन दाना, तब से लोगों ने पहचाना।।

द्वार पै कहते नारायण हरि, लेने जाते कभी मधुकरी।

तब से वे सत्संग सुनाते, सभी आर्ती शांति पाते।।

जो आया उद्धार कर दिया, भक्त का बेड़ा पार कर दिया।

कितने मरणासन्न जिलाये, व्यसन मांस और मद्य छुड़ाये।।


एक दिन मन उकता गया, किया डीसा से कूच।

आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक।।


वे नारेश्वर धाम पधारे, जा पहुँचे नर्मदा किनारे।

मीलों पीछे छोड़ा मन्दर, गये घोर जंगल के अन्दर।।

घने वृक्ष तले पत्थर पर, बैठे ध्यान निरंजन का घर।

रात गयी प्रभात हो आई, बाल रवि ने सूरत दिखाई।।

प्रातः पक्षी कोयल कूकन्ता, छूटा ध्यान उठे तब संता।

प्रातर्विधि निवृत्त हो आये, तब आभास क्षुधा का पाये।।

सोचा मैं न कहीं जाऊँगा, यहीं बैठकर अब खाऊँगा।

जिसको गरज होगी आयेगा, सृष्टिकर्त्ता खुद लायेगा।।

ज्यूँ ही मन विचार वे लाये, त्यूँ ही दो किसान वहाँ आये।

दोनों सिर बाँधे साफा, खाद्यपेय लिये दोनों हाथा।।

बोले जीवन सफल है आज, अर्घ्य स्वीकारो महाराज।

बोले संत और पै जाओ, जो है तुम्हारा उसे खिलाओ।।

बोले किसान आपको देखा, स्वप्न में मार्ग रात को देखा।

हमारा न कोई संत है दूजा, आओ गाँव करें तुमरी पूजा।।

आसाराम तब में धारे, निराकार आधार हमारे।

पिया दूध थोड़ा फल खाया, नदी किनारे जोगी धाया।।


गाँधीनगर गुजरात में, है मोटेरा ग्राम।

ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का, यहीं है पावन धाम।।

आत्मानंद में मस्त हैं, करें वेदान्ती खेल।

भक्तियोग और ज्ञान का, सदगुरु करते मेल।।

साधिकाओं का अलग, आश्रम नारी उत्थान।

नारी शक्ति जागृत सदा, जिसका नहीं बयान।।



बालक वृद्ध और नरनारी, सभी प्रेरणा पायें भारी।

एक बार जो दर्शन पाये, शांति का अनुभव हो जाये।।

नित्य विविध प्रयोग करायें, नादानुसन्धान बतायें।

नाभ से वे ओम कहलायें, हृदय से वे राम कहलायें।।

सामान्य ध्यान जो लगायें, उन्हें वे गहरे में ले जायें।

सबको निर्भय योग सिखायें, सबका आत्मोत्थान करायें।।

हजारों के रोग मिटाये, और लाखों के शोक छुड़ाये।

अमृतमय प्रसाद जब देते, भक्त का रोग शोक हर लेते।।

जिसने नाम का दान लिया है, गुरु अमृत का पान किया है।

उनका योग क्षेम वे रखते, वे न तीन तापों से तपते।।

धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते, आपद रोगों से बच जाते।

सभी शिष्य रक्षा पाते हैं, सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं।।

सचमुच गुरु हैं दीनदयाल, सहज ही कर देते हैं निहाल।

वे चाहते सब झोली भर लें, निज आत्मा का दर्शन कर लें।।

एक सौ आठ जो पाठ करेंगे, उनके सारे काज सरेंगे।

गंगाराम शील है दासा, होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा।।


वराभयदाता सदगुरु, परम हि भक्त कृपाल।

निश्छल प्रेम से जो भजे, साँई करे निहाल।।

मन में नाम तेरा रहे, मुख पे रहे सुगीत।

हमको इतना दीजिए, रहे चरण में प्रीत।।

Thursday, April 5, 2012

चित्त का निर्माण होता है आत्मविचार से। ध्यान करें और शून्यमनस्क नहीं लेकिन अनात्मप्रवाह का तिरस्कार करें और आत्मप्रवाह को चलायें। आत्मभाव को चलायें और देहभाव को हटायें।

ब्रह्मभाव को जगाना और देहभाव को अलविदा देना, यह है चित्त के निर्माण की पद्धति। इस प्रकार ध्यान होगा तो मस्त हो जायेंगे। ध्यान के वक्त भी मस्त और ध्यान के बाद भी मस्त।

इस प्रकार चित्त का निर्माण हो जायगा तो जो संसार बूँद होकर भी दरिया बनकर डूबता था वह अब दरिया होकर आयेगा तो भी बून्द होकर भासेगा। जरा-जरा बात से सुख-दुःखादि द्वन्द्व परेशान कर रहे थे वे अब प्रभाव नहीं डालेंगे। जितने प्रमाण में चित्त का निर्माण होता जायेगा उतने प्रमाण में द्वन्द्वैर्विमुक्ताः होते जायेंगे।..... पूज्यपाद श्रीबापूजी
महापुरूषों का अनुभव है कि वे कभी मरते नहीं। वे कभी बिगड़ते नहीं, कभी बनते नहीं। वास्तव में जीवमात्र का जो असली स्वरूप है वह बनने बिगड़ने से बहुत ऊँचा है।

बनता बिगड़ता तुम्हारा शरीर है, बनता बिगड़ता तुम्हारा मन है, बनता बिगड़ता तुम्हारा भाव है लेकिन तुम्हारा स्वरूप, तुम्हारा आत्मा कभी बनता बिगड़ता नहीं।..... पूज्यपाद श्रीबापूजी
सुख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा तो दुःख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा। पर्दे को क्या? कई फिल्में और उनके दृश्य आये और चले गये, पर्दा अपनी महिमा में स्थित है। तुम तो छाती ठोककर कहोः ‘अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दुःख जिसे आना हो आये और जाय। मुझे क्या...?’ किसी भी दृश्य को सच्चा मत मानो। तुम दृष्टा बनकर देखते रहो, अपनी महिमा में मस्त रहो।
‘मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे है’ ये स्वमानतीकता है; अभिमान नही…नम्रता आती है..सहजता आती है..जन-बल, बुध्दी-बल, शरीर-बल, द्रव्य-बल ये सच्चा नही है; लेकिन भगवत प्रेम-बल मंगलमय बल है – सच्चा बल है..उस के आगे ’सर्प विषैले बाबा तेरे वश में’ हो जाते है…ये सर्व – सर्वसुमंगल की पहेचान है…ऐसे सर्वमंगल से प्रेम, सेवा, स्नेह, समर्पण सहेज में हो जाता है…

Tuesday, April 3, 2012

हम शांत सुखस्वरूप आत्मा हैं। तूफान से सरोवर में लहरें उठ रही थीं। तूफान शान्त हो गया। सरोवर निस्तरंग हो गया। अब जल अपने स्वभाव में शान्त स्थित है। इसी प्रकार अहंकार और इच्छाओं का तूफान शान्त हो गया। मेरा चित्तरूपी सरोवर अहंकार और इच्छाओं से रहित शान्त हो गया। अब हम बिल्कुल निःस्पंद अपनी महिमा में मस्त हैं।

मन की मनसा मिट गई भरम गया सब दूर।

गगन मण्डल में घर किया काल रहा सिर कूट।।

इच्छा मात्र, चाहे वह राजसिक हो या सात्त्विक हो, हमको अपने स्वरूप से दूर ले जाती है। ज्ञानवान इच्छारहित पद में स्थित होते हैं। चिन्ताओं और कामनाओं के शान्त होने पर ही स्वतंत्र वायुमण्डल का जन्म होता है।

हम वासी उस देश के जहाँ पार ब्रह्म का खेल।

दीया जले अगम का बिन बाती बिन तेल।।

आनन्द का सागर मेरे पास था मुझे पता न था। अनन्त प्रेम का दरिया मेरे भीतर लहरा रहा था और मैं भटक रहा था संसार के तुच्छ सुखों में।

ऐ दुनियाँदारों ! ऐ बोतल की शराब के प्यारों ! बोतल की शराब तुम्हें मुबारक है। हमने तो अब फकीरों की प्यालियाँ पी ली हैं..... हमने अब रामनाम की शराब पी ली है।
उस नजर की तरफ मत देखो जो आप को देखने से इंकार करती है ,
दुनिया की भीड़ में उस नज़र को देखीये जो सिर्फ आप का इंतजार करती है ,
वो नजर है इश्वर और गुरु की .
सुख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा तो दुःख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा। पर्दे को क्या? कई फिल्में और उनके दृश्य आये और चले गये, पर्दा अपनी महिमा में स्थित है। तुम तो छाती ठोककर कहोः ‘अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दुःख जिसे आना हो आये और जाय। मुझे क्या...?’ किसी भी दृश्य को सच्चा मत मानो। तुम दृष्टा बनकर देखते रहो, अपनी महिमा में मस्त रहो।
इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही इस प्रकृति में स्थित मन और पाँचो इन्द्रियों को आकर्षित करता है । वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इस मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है । (८)

बापूजी, मैं आपसे प्रार्थना करना चाहती हूँ ,आपसे बातें करना चाहती हूँ ,पर जब साधन -भजन के लिए बैठती हूँ तो मन शांत हो जाता है . न प्रार्थना कर पाती हूँ ,न बातें कर पाती हूँ . न हीं मेरे मन में कोई भाव उठता है . गुरुदेव मै क्या करू ?

**तुम करने के झंझट से पार हो जाओ । जो प्रभु तेरी मर्ज़ी । बातें करके भी क्या करोगी ? तो बातें कर -कराके अगर अच्छी बातें होंगी तो मैं बोलूँगा ,भगवान में शांत हो जाओ । संकल्प रहित हो जाओ । वो तो आ गई तो , फिर बातें करने की झंझट को क्यों बुलाती हो ? तुम मेरे से बैठ कर मानसिक बातें करोगी तो मैं इतना खुश नहीं होऊंगा जितना तुम भगवान में शांत हो जाओगी तो मैं खुश होऊंगा । शराबी दूसरे को शराबी देख कर खुश हो जाता है । ऐसे ही तुम भगवान में स्थित होने लगोगी तो मुझे अधिक प्रसन्नता होगी ।
न मुझसे बाहर से मिलने की कोशिश करो ना मेरे से बातें करने की कोशिश करो । जो हो रहा है उसी में आगे बढ़ो , "ईश्वर की ओर" पुस्तक पढ़ते -पढ़ते "नारायण स्तुति " पुस्तक पढ़ते -पढ़ते भगवान के स्वभाव में डूबते जाओ ।

आप कहाँ जा रहे हैं ?


राजा को महल में सपना आया कि एक काली छाया आयी है और उसकी

कहती है हे राजा कल शाम को सूरज ढलने से पहले-पहले ठीक जगह पर

पहुँच जाना । क्यों ? बोले मै मृत्यु हूँ तेरा अंत काल आ गया है भूलना

नहीं ठीक समय पर सूर्यास्त के पहले ठीक जगह पर आ जाना मैं तुझे

लेने ऑंऊगी घबराकर राजा उठ गया सोचने लगा कि ठीक समय पर ठीक

जगह पर सूर्यास्त के पहले-पहले पहुँच जाना लेकिन जगह तो बताई

नहीं अब जगह बताती मृत्यु तो क्या पहुँच जाता वो कहीं और भाग

जाता सुबह उठकर पंडितों से पूछा क्या करूँ मुझे मृत्यु से डर लगता है

मैं मरना नहीं चाहता पंडितों ने सलाह दी आप घोड़े पर बैठकर भाग

जाओं महल में सपना आया तो हो सकता है कि मौत महल के आसपास

चक्कर काट रही हो और शाम को आपको ले जाय भागो.. भागा .. घोड़ें

को खूब भगाया दौड़ाते-दौड़ाते शाम तक दौड़ाता रहा कितना दूर निकल

गया होगा सुबह से शाम तक घोड़े को दौड़ाते हुए सूर्य अस्त होने का था

तो एक जगह घोड़े का रोका, उतरा घोड़े पर से घोड़े की पीठ सहलाई

बोला शाबास! मेरे प्यारे तू मुझे कितना दूर ले आया धन्यवाद है तेरे को

धन्य है धन्य है शाबास इतने में किसी ने राजा के कंधे पर हाथ रखा

तुमको धन्यवाद है कि तुम ठीक समय पर आ गये तुम्हारे घोड़े को भी

धन्यवाद है कि तुमको ठीक समय पर ले आया और ठीक जगह पर ले

आया बोले कौन ? बोले मैं वही जिसने तुमको सपना दिया था कमबख्त

तुम यहाँ भागकर आये आज पूरा दिन था तुम्हारे पास तुम सद्गुरु की

शरण में भी जा सकते थे उनसे ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुन सकते थे

उनके मुख से भगवान के नाम की दीक्षा लेकर अपना अंतकाल सुधार

सकते थे गीता में लिखा है कि अंतकाले च मामेवं

ये भी कर सकते थे परन्तु जिस दूर भागना चाहते थे अनजाने

में उसी के पास आ गये मौत से दूर भागना चाहता था और अनजाने में

उसी के पास आगया सारी दुनिया में ये हो रहा है सबकी यही कहानी है

जिस दुःख से दूर भागना चाहते है सद्गुरु और भक्ति के अभाव में उसी

दुःख के पास पहुँच जाते है जिन मुसीबते से दूर भागना चाहते है अनजाने

में उसी के पास आ जाते हैं ।
1. यदि तुम अपनी इच्छासे नहीं, भगवानकी इच्छासे ही चल रहे हो तो सैकड़ों जन्म-मृत्युओंमें जाना भी तुम्हारे लिये सौभाग्य और परमानन्द है।

2. चारो ओर प्रलोभन है और उनके बीचमें यह नन्हा-सा जीवन। एक-एकको केवल देखने लगो तो लाखों जन्मोंकी आवश्यकता होगी। तुम तो केवल एकको देखो- जो तुम्हारे हृदयमें बैठकर तुम्हें कुछ देखने-सुनने, हिलने-डोलनेकी शक्ति देता है। उस उद्गमके प्राप्त होते ही तुम परमानन्दकी लीला भूमि हो जाओगे।

3. कर्मका चक्र अनिवार्य है। इसमें इच्छा करनेवाले ही मारे जाते है। परंतु यदि समता और अनासक्तिका आश्रय लेकर तुम झूलेमें बैठ जाओ तो देखोगे कि झुलानेवाला भी तुम्हारे साथ है और तुम इस झूलन-लीलाके आनन्दमें मस्त हो।