मार्टिन लूथर नामक एक गुरु ने क्रिश्चियन धर्म में प्रचलित अनेक बुराइयों और मतभेदों को सुधारने के लिए झंडा उठाया तो पोप और उनके सहयोगियों ने मार्टिन को इतना हैरान करना आरंभ किया कि उनके एक शिष्य ने गुरु से कहाः "गुरुजी! अब तो हद हो गई है। अब एक शाप देकर इन सब लोगों को जला कर राख कर दीजिए।"
लूथरः "ऐसा कैसे हो सकता है?"
शिष्यः "आपकी प्रार्थना तो भगवान सुनते हैं। उन्हें प्रार्थना में कह दें कि इन सब पर बिजली गिरे।"
लूथरः "वत्स! यदि मैं भी ऐसा ही करने लगूँ तो मुझमें और उनमें क्या अन्तर रह जाएगा?"
शिष्यः "लेकिन इन लोगों का अविवेक, अन्याय और इनकी नासमझी तो देखिये! क्या बिगाड़ा है आपने इनका.....? आप जैसे सात्त्विक सज्जन और परोपकारी संत को ये नालायक, दुष्ट और पापी जन......"
शिष्य आगे कुछ और बोले उसके पहले ही लूथर बोल पड़ेः "उसे देखना हमारा काम नहीं है। हमें तो अपने ढंग से असत्य और विकृतियों को उखाड़ फेंकने का काम करना है। शेष सारा काम भगवान को स्वयं देखना है।"
शिष्य से रहा न गया तो उसने पुनः विनम्रता से कहाः "गुरुदेव! आप अपनी शक्ति आजमा कर ही उन्हें क्यों नहीं बदल देते? आप तो सर्वसमर्थ हैं।"
लूथरः "यदि राग और द्वेष, रोग और दोष अन्तःकरण से न घटे तो गुरुदेव किस प्रकार सहायक बन सकते हैं? मेरा काम है दुरित (पाप) का विसर्जन कर सत्य और शुभ का नवसर्जन करना। दूसरों को जो करना हो, करें। अपना काम तो अपने रास्ते पर दृढ़तापूर्वक चलना है।"
Wednesday, April 11, 2012
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