Thursday, April 5, 2012

‘मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे है’ ये स्वमानतीकता है; अभिमान नही…नम्रता आती है..सहजता आती है..जन-बल, बुध्दी-बल, शरीर-बल, द्रव्य-बल ये सच्चा नही है; लेकिन भगवत प्रेम-बल मंगलमय बल है – सच्चा बल है..उस के आगे ’सर्प विषैले बाबा तेरे वश में’ हो जाते है…ये सर्व – सर्वसुमंगल की पहेचान है…ऐसे सर्वमंगल से प्रेम, सेवा, स्नेह, समर्पण सहेज में हो जाता है…

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