कहती है हे राजा कल शाम को सूरज ढलने से पहले-पहले ठीक जगह पर
पहुँच जाना । क्यों ? बोले मै मृत्यु हूँ तेरा अंत काल आ गया है भूलना
नहीं ठीक समय पर सूर्यास्त के पहले ठीक जगह पर आ जाना मैं तुझे
लेने ऑंऊगी घबराकर राजा उठ गया सोचने लगा कि ठीक समय पर ठीक
जगह पर सूर्यास्त के पहले-पहले पहुँच जाना लेकिन जगह तो बताई
नहीं अब जगह बताती मृत्यु तो क्या पहुँच जाता वो कहीं और भाग
जाता सुबह उठकर पंडितों से पूछा क्या करूँ मुझे मृत्यु से डर लगता है
मैं मरना नहीं चाहता पंडितों ने सलाह दी आप घोड़े पर बैठकर भाग
जाओं महल में सपना आया तो हो सकता है कि मौत महल के आसपास
चक्कर काट रही हो और शाम को आपको ले जाय भागो.. भागा .. घोड़ें
को खूब भगाया दौड़ाते-दौड़ाते शाम तक दौड़ाता रहा कितना दूर निकल
गया होगा सुबह से शाम तक घोड़े को दौड़ाते हुए सूर्य अस्त होने का था
तो एक जगह घोड़े का रोका, उतरा घोड़े पर से घोड़े की पीठ सहलाई
बोला शाबास! मेरे प्यारे तू मुझे कितना दूर ले आया धन्यवाद है तेरे को
धन्य है धन्य है शाबास इतने में किसी ने राजा के कंधे पर हाथ रखा
तुमको धन्यवाद है कि तुम ठीक समय पर आ गये तुम्हारे घोड़े को भी
धन्यवाद है कि तुमको ठीक समय पर ले आया और ठीक जगह पर ले
आया बोले कौन ? बोले मैं वही जिसने तुमको सपना दिया था कमबख्त
तुम यहाँ भागकर आये आज पूरा दिन था तुम्हारे पास तुम सद्गुरु की
शरण में भी जा सकते थे उनसे ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुन सकते थे
उनके मुख से भगवान के नाम की दीक्षा लेकर अपना अंतकाल सुधार
सकते थे गीता में लिखा है कि अंतकाले च मामेवं
ये भी कर सकते थे परन्तु जिस दूर भागना चाहते थे अनजाने
में उसी के पास आ गये मौत से दूर भागना चाहता था और अनजाने में
उसी के पास आगया सारी दुनिया में ये हो रहा है सबकी यही कहानी है
जिस दुःख से दूर भागना चाहते है सद्गुरु और भक्ति के अभाव में उसी
दुःख के पास पहुँच जाते है जिन मुसीबते से दूर भागना चाहते है अनजाने
में उसी के पास आ जाते हैं ।

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