Thursday, April 22, 2010

अय मानव ! ऊठ.... जाग...। अपनी महानता को पहचान। कब तक भवाटवी में भटकेगा ? जो भगवान वैकुण्ठ में, कैलास में और ऋषियों के हृदय में है वही के वही, उतने के उतने तेरे पास भी हैं। ऊठ... जाग....। अपने प्यारे को पहचान। सत्संग करके बुद्धि को बढ़ा और परब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जा।

'मैं भगवान का हूँ

अग्नि से अंगार दूर हो जाता है तो वह काला कोयला बन जाता है। पर वही कोयला जब पुनः अग्नि से मिल जाता है तो वह अग्निरूप बन जाता है और अंगार होकर चमक उठता है।

ऐसे ही यह जीव भगवान से विमुख हो जाता है तो वह बार-बार जन्मता-मरता और दुःख पाता रहता है। पर जब वह भगवान के सम्मुख हो जाता है, अनन्य भाव से भगवान की शरण में हो जाता है तो वह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है। इतना ही नहीं, विश्व का भी कल्याण करने वाला हो जाता है।


साधक को सबसे पहले 'मैं भगवान का हूँ' इस प्रकार अपने अहंता को बदल देना चाहिए। कारण कि बिना अहंता के बदले साधन सुगमता से नहीं होता और अहंता के बदलने पर साधन सुगमता से, स्वाभाविक ही होने लगता है।


विवाह हो जाने पर कन्या अपनी अहंता को बदल देती है कि 'मैं तो ससुराल की ही हूँ' और पिता के कुल का सम्बन्ध बिल्कुल छूट जाता है। ऐसे ही साधक को अपनी अहंता बदल देनी चाहिए कि 'मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं, मैं संसार का नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है।' अहंता के बदलने पर ममता भी अपने आप बदल जाती है।

'मैं प्रभु के चरणों में ही पड़ा हुआ हूँ' – ऐसा मन में भाव रखते हुए जो कुछ अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाय उसमें भगवान का मंगलमय विधान मानकर परम प्रसन्न रहें।

भगवान के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा वह मंगलमय हो होगा। पूरी परिस्थिति मेरी समझ में आये या न आये यह बात दूसरी है, पर भगवान का विधान तो मेरे लिए कल्याणकारी ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं। इसलिए जो कुछ होता है वह मेरे कर्मों का फल नहीं है, प्रत्युत भगवान के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हित के लिए भेजा हुआ विधान है।

तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठ में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।

-प्राप्ति की इच्छा तीव्र न होने के कारण संसार की इच्छा जोर पकड़ती है। संसार की इच्छाएँ जीव को नचाती रहती हैं और राग पैदा करती रहती हैं। वस्तुओं में राग बढ़ता है उसे लोभ कहते हैं, व्यक्ति में राग बढ़ता है उसे मोह कहते हैं। राग ही लोभ और मोह बना देता है, राग काम बना देता है।

तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठ में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।

-प्राप्ति की इच्छा तीव्र न होने के कारण संसार की इच्छा जोर पकड़ती है। संसार की इच्छाएँ जीव को नचाती रहती हैं और राग पैदा करती रहती हैं। वस्तुओं में राग बढ़ता है उसे लोभ कहते हैं, व्यक्ति में राग बढ़ता है उसे मोह कहते हैं। राग ही लोभ और मोह बना देता है, राग काम बना देता है।

सुखमें विकास नहींहोता,इसमेंपुराने पुण्य नष्ट होतेहैं और सुखभोगमें उलझ जानेके कारण आगे उन्नतिनहीं होती।जोप्रतिकूलता आनेपरभी साधनकरता रहताहै,वह अनुकूलतामेंभी सुगमतापूर्वकसाधन करसकता है।इसलियेगृहस्थका उद्धारजल्दीहोताहै,परसाधुका उद्धारजल्दीनहींहोता।कारणकि साधुतो थोड़ीभी प्रतिकूलतासह नहींसकता औरप्रतिकूलता आनेपर कमण्डलुउठाकर चलदेता है,परगृहस्थ प्रतिकूलता आनेपर कहाँ जाय?वह माँ-बाप,स्त्री-पुत्रको कैसे छोड़े?

सच्चे प्यार

सच्चे प्यार का अहसास किया जा सकता। इसे शब्दों में अभिव्यक्त करना न केवल मुश्किल है बल्कि असंभव भी है। सच्चे प्यार में गहराई इतनी होती है कि चोट लगे एक को, तो दर्द दूसरे को होता है, एक के चेहरे की उदासी से दूसरे की आँखें छलछला आती हैं। सच्चे प्रेम का 'पुष्प' कोमल भावनाओं की भूमि पर आपसी विश्वास और मन की पवित्रता के संरक्षण में ही खिलता और महकता है।

धर्म

हम जो सत्कार्य करते हैं उससे हमें कुछ मिले – यह जरूरी नहीं है। किसी भी सत्कार्य का उद्देश्य हमारी आदतों को अच्छी बनाना है। हमारी आदते अच्छी बनें, स्वभाव शुद्ध, मधुर हो और उद्देश्य शुद्ध आत्मसुख पाने का हो। जीवन निर्मल बने इस उद्देश्य से ही सत्कार्य करने चाहिए।


किसी को पानी पिलायें, भोजन करायें एवं बदले में पच्चीस-पचास रूपये मिल जायें – यह अच्छे कार्य करने का फल नहीं है। अच्छे कार्य करने का फल यह है कि हमारी आदतें अच्छी बनें। कोई ईनाम मिले तभी सुखी होंगे क्या ? प्यासे को पानी एवं भूखे को भोजन देना यह कार्य क्या स्वयं ही इतना अच्छा नहीं है कि उस कार्य को करने मात्र से हमें सुख मिले ? है ही। उत्तम कार्य को करने के फलस्वरूप चित्त में जो प्रसन्नता होती है, निर्मलता का अनुभव होता है उससे उत्तम फल अन्य कोई नहीं है। यही चित्त का प्रसाद है, मन की निर्मलता है, अंतःकरण की शुद्धि है कि कार्य करने मात्र से प्रसन्न हो जायें। अतः जिस कार्य को करने से हमारा चित्त प्रसन्न हो, जो कार्य शास्त्रसम्मत हो, महापुरुषों द्वारा अनुमोदित हो वही कार्य धर्म कहलाता है।

बाहर कैसी भी घटना घटी हो, चाहे वह कितनी भी प्रतिकूल लगती हो, परन्तु तुम्हें उससे खिन्न होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि अन्ततोगत्वा होती वह तुम्हारे लाभ के लिए ही है। तुम यदि अपने-आपमें रहो तो तुम्हें मिला हुआ शाप भी तुम्हारे लिए वरदान का काम करेगा।

प्रतिकूलता से भय मत करो। सदा शांत और निर्भय रहो। भयानक दृश्य (द्वैत) केवल स्वप्नमात्र है, डरो मत।

चिन्ता, भय, शोक, व्यग्रता और व्यथा को दूर फेंक दो। उधर कतई ध्यान मत दो।

सारी शक्ति निर्भयता से प्राप्त होती है, इसलिए बिल्कुल निर्भय हो जाओ। फिर तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।

दुःख का पहाड़ गिरता हो और तुम परमात्मा में डट जाओ तो वह पहाड़ रास्ता बदले बिना नहीं रह सकता। दुःख का पहाड़ प्रकृति की चीज है। तुम परमात्मा में स्थित हो तो प्रकृति परमात्मा के खिलाफ कभी कदम नहीं उठाती। ध्यान में जब परमात्म-स्वरूप में गोता मारो तो भय, चिन्ता, शोक, मुसीबत ये सब काफूर हो जाते हैं। जैसे टॉर्च का प्रकाश पड़ते ही ठूँठे में दिखता हुआ चोर भाग जाता है वैसे ही आत्मविचार करने से, आत्म-भाव में आने मात्र से भय, शोक, चिन्ता, मुसीबत, पापरूपी चोर पलायन हो जाते हैं।
बीमार शरीर होता है, वास्तव में तुम कभी बीमार नहीं होते। तुम कभी चिन्तित नहीं होते, चिन्तित मन होता है। तुम कभी भयभीत नहीं होते, मन में भय आता है। तुम कभी शोक नहीं करते, शोक तुम्हारे चित्त में आता है लेकिन तुम अपने को उसमें जोड़े देते हो।
बेटा तुम्हारा वारिस हो जाता है । पत्नी तुम्हारे शरीर से सुख की चाह करती है । पति तुम्हारे शरीर का मालिक होना चाहता है । परन्तु तुम्हारा कल्याण करने वाला कौन होता है भगवान और भगवान को प्राप्त महापुरुष ही तुम्हारा चित्त चाहेंगे संसार में कुछ भी मिल गया तो आखिर क्या?

Tuesday, April 20, 2010

पानी तो वही का वही लेकिन समयानुसार उपयोग का असर पृथक-पृथक होता है। ऐसे ही मन तो वही, शरीर भी वही लेकिन किस समय शरीर से, मन से क्या काम लेना है इस प्रकार का ज्ञान जिसके पास है वह मुक्त हो जाता है। अन्यथा कितने ही मंदिर-मस्जिदों में जोड़ो एवं नाक रगड़ो, दुःख और चिन्ता तो बनी ही रहेगी।कभी न छूटे पिण्ड दुःखों से।जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।।

Monday, April 19, 2010

बाल संस्कार केन्द्र के 21 अनमोल रत्न

प्रतिदिन पालनीय नियम

1. सूर्योदय से पहले ब्रह्ममुहूर्त में उठना।
2. प्रातः शुभ चिंतन, शुभ संकल्प, इष्टदेव अथवा गुरूदेव का ध्यान।
3. करदर्शन।
4. प्रार्थना, जप, ध्यान, आसन, प्राणायाम।
5. सूर्य को अर्घ्य एवं सूर्यनमस्कार।
6. तुलसी के 5 पत्तों का सेवन कर 1 गिलास पानी पीना।
7. माता-पिता एवं गुरूजनों को प्रणाम।
8. नियमित अध्ययन।
9. अच्छी संगत।
10. भोजन से पूर्व गीता के पंद्रहवें अध्याय का पाठ व सात्त्विक, सुपाच्य तथा स्वास्थ्कर भोजन।
11. त्रिकाल संध्या।
12. सत्शास्त्र-पठन और सत्संग-श्रवण।
13. सेवा, कर्त्तव्यपालन व परोपकार।
14. सत्य एवं मधुर भाषण, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना)।
15. समय का सदुपयोग। 16. परगुणदर्शन (दूसरों के अच्छे गुणों पर दृष्टि रखना)।
17. घरकाम में मदद और स्वच्छता।
18. खेलकूद।
19. त्राटक, मौन।
20. जल्दी सोना-जल्दी उठना।
21. सोने से पहले आत्मनिरीक्षण, ईश्वर-गुरूदेव का चिंतन, धन्यवाद।

आत्मबल

मानवमात्र की सफलता का मूल उसकी आत्मश्रद्धा में निहित है। आत्मश्रद्धा का सीधा संबंध संकल्पबल के साथ है। तन-बल, मन-बल, बुद्धि-बल एवं आत्मबल ऐसे कई प्रकार के बल हैं, उनमें आत्मबल सर्वश्रेष्ठ है। आत्मबललल में अचल श्रद्धा यह विजय प्राप्त करने की सर्वोत्तम कुंजी है। जहाँ आत्मबल में श्रद्धा नहीं है वहीं असफलता, निराशा, निर्धनता, रोग आदि सब प्रकार के दुःख देखने को मिलते हैं। इससे विपरीत जहाँ आत्म बल में अचल श्रद्धा है वहाँ सफलता, समृद्धि, सुख, शांति, सिद्धि आदि अनेक प्रकार के सामर्थ्य देखने को मिलते हैं।

जैसे-जैसे मनुष्य अपने सामर्थ्य में अधिकाधिक विश्वास करता है, वैसे-वैसे वह व्यवहार एवं परमार्थ दोनों में अधिकाधिक विजय हासिल करता है। अमुक कार्य करने का उसमें सामर्थ्य है, ऐसा विश्वास और श्रद्धा-यह कार्यसिद्धि का मूलभूत रहस्य है।

मनुष्य अपनी उन्नति शीघ्र नहीं कर पाता इसका मुख्य कारण यही है कि उसे अपने सामर्थ्य पर संदेह होता है। वह 'अमुक कार्य मेरे से न हो सकेगा' ऐसा सोच लेता है। जिसका परिणाम यह आता है कि वह उस कार्य को कभी करने का प्रयत्न भी नहीं करता। आत्मश्रद्धा का सीधा संबंध संकल्पबल के साथ है।

आत्मबल में अविश्वास प्रयत्न की सब शक्तियों को क्षीण कर देता है। प्रयत्न के बिना कोई भी फल प्रगट नहीं होता। अतः प्रयत्न को उत्पन्न करने वाली आत्मश्रद्धा का जिसमें अभाव है उसका जीवन निष्क्रिय, निरुत्साही एवं निराशाजनक हो जाता है। जहाँ-जहाँ कोई छोटा-बड़ा प्रयत्न होता है वहाँ-वहाँ उसके मूल में आत्मश्रद्धा ही स्थित होती है और अंतःकरण में जब तक आत्मश्रद्धा स्थित होती है तब तक प्रयत्नों का प्रवाह अखंड रूप से बहता रहता है। आत्मश्रद्धा असाधारण होती है तो प्रयत्न का प्रवाह किसी भी विघ्न से न रुके ऐसा असाधारण एवं अद्वितिय होता है।
मैं सब हूँ। विशाल आकाश की नाईं सर्वव्यापक हो रहा है। मैं चिदाकाश-स्वरूप हूँ। सूर्य और चाँद मुझमें लटक रहे हैं। मैं चिदाकाश स्वरूप हूँ। सूर्य और चाँद मुझमें लटक रहे हैं। सब तारे मुझमें टिमटिमा रहे हैं इतना मैं विशाल हूँ। कई राजा-महाराजा इस आकाशस्वरूप चैतन्य में आ-आकर चले गये। मैं वह आकाश हूँ। मैं सर्वव्यापक हूँ। मैं कोई परिस्थिति नहीं हूँ लेकिन सब परिस्थितियों को पहचाननेवाला आधारस्वरूप आत्मा हूँ। आनन्द और शान्ति मेरा अपना स्वभाव है।इस प्रकार अपनी वृत्ति को विशाल... विशाल गगनगामी होने दो।
आँखों को बुरी जगह जाने नहीं देना यह आँखों की सेवा है। वाणी को व्यर्थ नहीं खर्चना यह वाणी की सेवा है। मन को व्यर्थ चिन्तन से बचाना यह मन की सेवा है। बुद्धि को राग-द्वेष से बचाना यह बुद्धि की सेवा है। अपने को स्वार्थ से बचाना यह अपनी सेवा है और दूसरों की ईर्ष्या या वासना का शिकार न बनाना यह दूसरों की सेवा है। इस प्रकार का यज्ञार्थ कर्म कर्त्ता को परमात्मा से मिला देता है।

ASLI GIYAN

कई रात्रियाँ तुमने सो-सोकर गुजार दीं और दिन में स्वाद ले लेकर तुम समाप्त होने को जा रहे हो। शरीर को स्वाद दिलाते-दिलाते तुम्हारी यह उम्र, यह शरीर बुढ़ापे की खाई में गिरने को जा रहा है। शरीर को सुलाते-सुलाते तुम्हारी वृद्धावस्था आ रही है। अंत में तो.... तुम लम्बे पैर करके सो जाओगे। जगाने वाले चिल्लायेंगे फिर भी तुम नहीं सुन पाओगे। डॉक्टर और हकीम तुम्हें छुड़ाना चाहेंगे रोग और मौत से, लेकिन नहीं छुड़ा पायेंगे। ऐसा दिन न चाहने पर भी आयेगा। जब तुम्हें स्मशान में लकड़ियों पर सोना पड़ेगा और अग्नि शरीर को स्वाहा कर देगी। एक दिन तो कब्र में सड़ने गलने को यह शरीर गाड़ना ही है। शरीर कब्र में जाए उसके पहले ही इसके अहंकार को कब्र में भेज दो..... शरीर चिता में जल जाये इसके पहले ही इसे ज्ञान की अग्नि में पकने दो।
विश्वास करें किसी भी रिश्ते को बेहतर तरह से निभाने का मूल मंत्र है, उस पर सौ फीसद विश्वास करना। किसी तरह का भय या शक दिल में जहां रखा आपने, समझिए प्रेम से दूर कर रहे हैं खुद को। विश्वास टूटने के भय से पहले ही उस पर शंकालू निगाह रखना, आपको कमजोर करता जा...ता है। प्रेम तो छूटता ही है, जो चीजें आपके पास होनी थीं, वे भी दूर होती जाती हैं।

Sunday, April 18, 2010

तत्वज्ञान

साधनकी ऊँची अवस्थामें ‘मेरेको तत्वज्ञान हो जाय, मैं मुक्त हो जाऊँ’—यह इच्छा भी बाधक होती है । जबतक अंतःकरणमें असत् की सत्ता दृढ़ रहती है, तबतक तो जिज्ञासा सहायक होती है, पर असत् की सत्ता शिथिल होनेपर जिज्ञासा भी तत्वज्ञानमें बाधक होती है । कारण कि जैसे प्यास जलसे दूरी सिद्ध करती है, ऐसे ही जिज्ञासा तत्वसे दूरी सिद्ध करती है, जब कि तत्व वास्तवमें दूर नहीं है, प्रत्युत नित्यप्राप्त है ।

दूसरी बात, तत्वज्ञानकी इच्छासे व्यक्तित्व (अहम्) दृढ़ होता है, जो तत्वज्ञानमें बाधक है । वास्तवमें तत्वज्ञान, मुक्ति स्वतःसिद्ध है । तत्वज्ञानकी इच्छा करके हम अज्ञानको सत्ता देते है, अपनेमें अज्ञानकी मान्यता करते है, जब कि वास्तवमें अज्ञानकी सत्ता है नहीं ।

इसलिए तत्वज्ञान होनेपर फिर मोह नहीं होता —‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्’ (गीता ४/३५); क्योंकि वास्तवमें मोह है ही नहीं । मिटता वही है, जो नहीं होता और मिलता वही है, जो होता है
विश्वास करें किसी भी रिश्ते को बेहतर तरह से निभाने का मूल मंत्र है, उस पर सौ फीसद विश्वास करना। किसी तरह का भय या शक दिल में जहां रखा आपने, समझिए प्रेम से दूर कर रहे हैं खुद को। विश्वास टूटने के भय से पहले ही उस पर शंकालू निगाह रखना, आपको कमजोर करता जाता है। प्रेम तो छूटता ही है, जो चीजें आपके पास होनी थीं, वे भी दूर होती जाती हैं।
Kis tarah ladatee rahi ho, Pyaas se parchhaiyon se, Neend se , angadaiyon se, Maut se aur zindagi se, Teej se ,tanahaiyon se. kab tak ladte rahoge , jiwan me bhar lo ujale ,kar do roshan apni rahe , prabhu prem se Guru Giyan se
जो मृत्यु के बाद भी तुम्हारे साथ रहेगा उस आत्मा का ज्ञान कर लो…जीवन लाचार मोहताज हो जाये उसके पहले जीवन मे परमात्म सुख की पूंजी इकठ्ठी कर लो…।lकर सत्संग अभी से प्यारे नही तो फिर पछताना हैखिला पिला के देह बढाई वो भी अग्नि मे जलाना है…कर सत्संग अभी से प्यारे नही तो फिर पछताना है॥

Saturday, April 17, 2010

जो व्यक्ति व्यवहार में कुशल नहीं है वह परमार्थ में भी कुशल नहीं हो सकता। व्यवहार में कुशलता क्या है ? छोटी-छोटी अनुकूलता-प्रतिकूलता से प्रभावित न होना, छोटे-छोटे मान-अपमान से आक्रान्त न होना यह व्यवहार की कुशलता है। छोटी-छोटी चीजों से प्रभावित न होना यह व्यवहार की कुशलता है। छोटी-छोटी चीजों से प्रभावित हो जाने से अपनी शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। अतः सावधान रहो। अनपेक्षः। तुच्छ मान और अपमान की परवाह मत करो। तुच्छ विषयविकारों की अपेक्षा मत करो। प्रारब्ध में जो होगा वह झख मारके, चक्कर खाकर तुम्हारे चरणों में आ गिरेगा।

हो तो भगवान के भक्त और टुकड़ों की चिन्ता करते हो ? हो तो भगवान के भक्त और चीथड़ों की चिन्ता करते हो ? हो तो प्रभु के प्यारे और खुशामद की अपेक्षा करते हो ? दूर हटा दो इन अपेक्षाओं को। अनपेक्ष शुचिर्दक्षः। अपेक्षा रहित हो जाओ शुद्ध हो जाओ।
Dard Me Koi Mausam Pyara Nahin Hota Dil Ho Pyasa To Pani Se Gujara Nahin Hota Dil Lag Gaya Rab se to Uski masti se jyada koi Payara nahi hota
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥ पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥7॥ भावार्थ:-जगत् में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत् में सुख नहीं है। और हे पक्षीराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है॥7॥
जीवन की माँग है योग। जीवन की माँग है शाश्वत सुख। जीवन की माँग है अखण्डता। जीवन की माँग है पूर्णता।आप मरना नहीं चाहते, यह जीवन की माँग है। आप अपमान नहीं चाहते। भले सह लेते हैं, पर चाहते नहीं। यह जीवन की माँग है। तो अपमान जिसका न हो सके, वह ब्रह्म है। अतः वास्तव में आपको ब्रह्म होने की माँग है। आप मुक्ति चाहते हैं। जो मुक्तस्वरूप है, उसमें अड़चन आती है काम, क्रोध आदि विकारों से।

Thursday, April 15, 2010

तुम्हारे स्व में

दुनियाँ के सब लोग मिलकर तुम्हारे शरीर की सेवा में लग जाएँ फिर भी तुम्हारे स्व में कुछ बढ़ौती नहीं होगी। तुम्हारा विरोध में सारा विश्व उल्टा होकर टँग जाय फिर भी तुम्हारे स्व में कोई कटौती नहीं होगी, कोई घाटा नहीं होगा। ऐसा विलक्ष्ण तुम्हारा स्व है। इतने तुम स्वतन्त्र हो। संसार के सारे देशों के प्रेसिडेन्ट, प्रमुख, राष्ट्रपति, सरमुखत्यार, सुल्तान, प्राईम मिनिस्टर सब मिलकर एक आदमी की सेवा में लग जाएँ उसको सुखी करने में लग जाएँ फिर भी जब तक वह आदमी स्व का चिन्तन नहीं करता, स्व का विचार नहीं करता, आत्म विचार नहीं करता तब उसका दुर्भाग्य चालू रहता है। उपर्युक्त सब लोग मिलकर एक आदमी को सताने लग जाए और वह आदमी अगर आत्म-स्वरूप में सुप्रतिष्ठित है तो उसकी कोई हानि नहीं होती। उसके शरीर को चाहे काट दें या जला दें फिर भी वह आत्मवेत्ता अपने को कटा हुआ या जला हुआ मानकर दुःखी नहीं होगा। वह तो उस अनुभव पर खड़ा है जहाँ.....

नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्याप न शोषयति मारूतः।।

'आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।'

को काहू को नहीं सुख दुःख करी दाता।

निज कृत कर्म हि भोगत भ्राता।।

वस्तुओं से प्राप्त जो सुख है अथवा हमारी मान्यताओं के अनुसार जो सुख है वह वास्तविक में राग का सुख है, आत्मा का सुख नहीं है। हमारी इच्छा के खिलाफ जो हो रहा है उससे जो दुःख होता है वह वास्तविक में बाहर दुःख नहीं है। हमारी मान्यताएँ हमको दुःख देती हैं।को काहू को नहीं सुख दुःख करी दाता।निज कृत कर्म हि भोगत भ्राता।।

परमात्म-प्राप्ति की इच्छा तीव्र न होने के कारण संसार की इच्छा जोर पकड़ती है। संसार की इच्छाएँ जीव को नचाती रहती हैं और राग पैदा करती रहती हैं। वस्तुओं में राग बढ़ता है उसे लोभ कहते हैं, व्यक्ति में राग बढ़ता है उसे मोह कहते हैं।

राग ही लोभ और मोह बना देता है, राग काम बना देता है। राग ही क्रोध को जन्म देता है।

इच्छित वस्तु पाने में किसी ने विघ्न डाला और वह अपने से छोटा है तो उस पर क्रोध आयगा, वह अपनी बराबरी का है तो उससे द्वेष होगा और अपने से वह बड़ा है तो उससे भय होगा। राग से ही क्रोध, द्वेष और भय पैदा होते हैं।

राग से ही मोह पैदा होता है और राग से ही काम पैदा होता है।केवल राग के कारण ही जीव की दुर्दशा है।

जीव रागरहित हो गया तो वह योगी हो गया, वह भक्त हो गया, वह ज्ञानी हो गया, वह मुक्त हो गया।

Wednesday, April 14, 2010

अनन्य भक्ति और अव्यभिचारिणी भक्ति अगर भगवान में हो जाय, तो भगवत्प्राप्ति कठिन नहीं है। भगवान प्राणिमात्र का अपना आपा है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पति के सिवाय अन्य पुरूष में पतिभाव नहीं रखती, ऐसे ही जिसको भगवत्प्राप्ति के सिवाय और कोई सार वस्तु नही दिखती, ऐसा जिसका विवेक जाग गया है, उसके लिए भगवत्प्राप्ति सुगम हो जाती है। वास्तव में, भगवत्प्राप्ति ही सार है

केवल कुर्सी-टेबल पर बैठकर कलम चलाने के लिए ही बुद्धि नहीं मिली है। बुद्धिपूर्वक कलम तो भले चलाओ, परंतु बुद्धि का उपयोग केवल रोटी कमाकर पेट भरना ही नहीं है। कलम भी चलाओ तो परमात्मा को रिझाने के लिये और कुदाली चलाओ तो भी उसको रिझाने के लिए।

शमा जलती है परवानों को आमंत्रण नहीं देती। परवाने अपने आप आ जाते हैं। ऐसे ही तुम्हारा जीवन अगर परहित के लिए खर्च होता है तो तुम्हारे शरीर रूपी साधन के लिए आवश्यकताएँ, सुविधाएँ अपने आप आ जाती हैं। लोग नहीं देंगे तो लोकेश्वर उनको प्रेरित करके तुम्हारी आवश्यकताएँ हाजिर कर देंगे।जिसने बाँटा उसने पाया। जिसने सँभाला उसने गँवाया।
भगवान् प्रेम करते है तो अपनेमें लीन कर देते है, प्रेमका तो अंत होता नहीं ,भक्तिरस, प्रेमरस, प्रेमका आस्वादन है,भगवान् को जितना प्यारा भक्त होता है , उतना प्यारा और कोई नहीं है !! ऐसे अपने आपको देनेवाले प्रभुके चरणोंकी शरण हो जाय, हे नाथ ! हे नाथ !! अपने आपको समर्पित कर दें ! सर्वथा भगवान् को समर्पित कर दें ! भगवान् आनंदमग्न, मस्त हो जाते है ,वो मेरा है, मैं उसका हूँ । मेरा है, मेरा है ... कहते-कहते 'मैं उसीका हूँ' हो जाय । जैसे गंगाजीमें जाते-जाते डूब जाय !! ऐसे ही परमात्माकी शरण जाते-जाते डूब जाय, परमात्मा ही रह जाय ,ऐसे अनंत प्रेममें मस्त होते है, मौज में मग्न हो जाते है एकदम ! आनद ही आनंद ! अपार आनंद ! असीम आनंद !

फकीर

जिसके जीवन में सच्चा प्रेम आ जाता है उसका आचरण भी बदल जाता है बाहर से उसे फिर दिखावा करने की जरुरत नहीं पड़ती

जो प्रभु के प्रेम में इतना आगे बड जाता है, प्रभु वियोग में तड़पता रहता है, सुध नहीं उसे किसी बात की, उसने तन, मन, धन, अहंकार सब कुछ समर्पित कर दिया प्रभु के आगे, प्रेम में अहंकार आड़े आ जाता है, अहंकार बोलेंगा भई मै क्यों झुकू? और प्रेम में तो झुकना ही है, डूबना ही है, जीते जी मरना ही है

उसे अपने शरीर का होश नहीं है, कैसा भी वस्त्र मिला पहनलिया, कैसा भी रुखा-सुखा मिला खा लिया, उसकी न ही खुद की कोई इच्छा है, न ही किसी से कोई उम्मीद, उसने न ही किसी से कुछ लेना है, न ही किसी को कुछ देना है, उसके पास जो कुछ है वो उसने पहले ही प्रभु को समर्पित कर दिया है वो खली है, फकीर है बस जपता रहता है प्रभु का नाम.....

बस उसी की तड़प... उसी की चिंता... उसी की लगन... उसी की प्यास, खंजर.....प्रभु के नाम का खंजर उसके सिने में खुपा रहता है....उसी का दर्द सिने में लिए वो घूमता रहता है, उसी की तड़प में जी रहा है... उसी का नाम रट रहा है, न रात में सोने की चिंता है, न दिन में खाने-पिने की, न ही मान-बड़ाई की...
“Life is full of beauty. Notice it. Notice the bumble bee, the small child, and the smiling faces. Smell the rain, and feel the wind. Live your life to the fullest potential, and fight for your dreams.”

'बाल संस्कार केन्द्र' स्पेशल

जहाजों से जो टकराये, उसे तूफान कहते हैं।
तूफानों से जो टकराये, उसे इन्सान कहते हैं।।1।।

हमें रोक सके, ये ज़माने में दम नहीं।
हमसे है ज़माना, ज़माने से हम नहीं।।2।।

जिन्दगी के बोझ को, हँसकर उठाना चाहिए।
राह की दुश्वारियों पे, मुस्कुराना चाहिए।।3।।

बाधाएँ कब रोक सकी हैं, आगे बढ़ने वालों को।
विपदाएँ कब रोक सकी हैं, पथ पे बढ़ने वालों को।।4।।

मैं छुई मुई का पौधा नहीं, जो छूने से मुरझा जाऊँ।
मैं वो माई का लाल नहीं, जो हौवा से डर जाऊँ।।5।।

जो बीत गयी सो बीत गयी, तकदीर का शिकवा कौन करे।
जो तीर कमान से निकल गयी, उस तीर का पीछा कौन करे।।6।।

अपने दुःख में रोने वाले, मुस्कुराना सीख ले।दूसरों
के दुःख दर्द में आँसू बहाना सीख ले।।7।।

जो खिलाने में मज़ा, वो आप खाने में नहीं।
जिन्दगी में तू किसी के, काम आना सीख ले।।8।।

खून पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा।
यह नाव तो हिलती जाएगी, तू हँसता जा या रोता जा।।9।।

खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले।
खुदा बन्दे से यह पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।।10।

शब्द संभाले बोलिए

शब्द संभाले बोलिए ......

शब्द संभाले बोलिए ......

शब्द के हाथ न पाव रे ........

१। एक शब्द औषध करे..., एक शब्द करे घाव रे ......

२। मुख से निकला शब्द तो, वापिस फिर न आएगा .....

३। दिल किसी का तोरकर तू भी चेन न पायेगा .....

४। इसलिए कहते गुरूजी ,शब्द पे रखना ध्यान रे...

५। सच करवा भाता न किसीको ,...सच मीठा कर बोलिए...

६। गुरु की अमृत वाणी सुनकर, मुख से अमृत घोलिये...

७। इसलिए कहते गुरूजी, मीठा शब्द महान रे......

८। मुख की मौन देवता बनाती, मन की मौन भगवान रे.......

९। मौन से ही तुम अपने , शब्दों मैं भर लो जान रे ....

१०। इसलिए कहते गुरूजी,मौन ही भगवान रे...

११। ज्ञानी तो हर वक्त ही, मौन मैं ही है रहता ....

१२। मुख से कुछ न कहते हुए भी, सब कुछ ही है वो कहता ....

१३। इसलिए कहते गुरूजी, मौन ही वरदान रे.......

१४। एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव रे.....

वासुदेव: सर्वम्

जैसे, समुद्रमें तरंगें उठती हैं, बुदबुद पैदा होते हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर यह सब-का-सब जल ही है । इस जलसे भाप निकलती है । वह भाप बादल बन जाती है । बादलोंसे फिर वर्षा होती है । कभी ओले बरसते हैं । वर्षाका जल बह करके सरोवर, नदी-नालेमें चला जाता है । नदी समुद्रमें मिल जाती है । इस प्रकार एक ही जल कभी समुद्र रूपसे, कभी भाप रूपसे, कभी बूँद रूपसे, कभी ओला रूपसे, कभी नदी रूपसे और कभी आकाशमें परमाणु रूपसे हो जाता है । समुद्र, भाप, बादल, वर्षा, बर्फ, नदी आदिमें तो फर्क दीखता है, पर जल तत्त्वमें कोई फर्क नहीं है । केवल जल-तत्त्वको ही देखें तो उसमें न समुद्र है, न भाप है, न बूँदें हैं, न ओले हैं, न नदी है, न तालाब है । ये सब जलकी अलग-अलग उपाधियाँ हैं । तत्त्वसे एक जलके सिवाय कुछ भी नहीं है । इसी तरह सोनेके अनेक गहने होते हैं । उनका अलग-अलग उपयोग, माप-तौल, मूल्य, आकार आदि होते हैं । परन्तु तत्त्वसे देखें तो सब सोना-ही-सोना है । पहले भी सोना था, अन्तमें भी सोना रहेगा और बीचमें अनेक रूपसे दीखने पर भी सोना ही है। मिट्टीसे घड़ा, हाँडी, ढक्कन, सकोरा आदि कोई चीजें बनती हैं । उन चीजोंका अलग-अलग नाम, रूप, उपयोग आदि होता है । परन्तु तत्त्वसे देखें तो उनमें एक मिट्टीके सिवाय कुछ भी नहीं है । पहले भी मिट्टी थी, अन्तमें भी मिट्टी रहेगी और बीचमें भी अनेक रूपसे दीखने पर भी मिट्टी ही है । इसी प्रकार पहले भी परमात्मा थे, बादमें भी परमात्मा रहेंगे और बीचमें संसार रूपसे अनेक दीखने पर भी तत्त्व से परमात्मा ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्।’
जिस गाँव में नहीं जाना है, उसका रास्ता क्यों पूछा जाय ?’ ऐसा दृढ़ भाव हो जाय ऐसे ही प्रत्येक सद्गुण-सदाचारके ग्रहण और दुर्गुण-दुराचार के त्यागके लिये दृढ़ भाव बना लिया जाय तो यह भाव बहुत जल्दी बन सकता है और फिर वह अनायास ही आचरणमें भी आ सकता है

Tuesday, April 13, 2010

प्रयत्न के बिना कोई भी फल प्रगट नहीं होता। अतः प्रयत्न को उत्पन्न करने वाली आत्मश्रद्धा का जिसमें अभाव है उसका जीवन निष्क्रिय, निरुत्साही एवं निराशाजनक हो जाता है। जहाँ-जहाँ कोई छोटा-बड़ा प्रयत्न होता है वहाँ-वहाँ उसके मूल में आत्मश्रद्धा ही स्थित होती है और अंतःकरण में जब तक आत्मश्रद्धा स्थित होती है तब तक प्रयत्नों का प्रवाह अखंड रूप से बहता रहता है।
There is no thing that is good or bad at all. It is proper utilization that leads to salvation and mis-utilization that leads to downfall. Therefore properly utilize every single thing. There is immense glory of proper utilization and much criticism of mis-utilization.

Monday, April 12, 2010

आप सब शिव जी के वचन बोलना… जो शिव जी के जिव्हा से उच्चारण हुआ है वो तुम्हारी जिव्हा से उच्चारित हो… धन्यो माता पिता धन्यो गोत्रं धन्योम कुलोदभव l धन्याच वसुधा देवी यत्र स्यात गुरु भक्तता ll
हे अज्ञानी मनुष्य ! तू क्या क्या चाहता है ? हे नादान मनुष्य ! तूने क्या क्या किया है ? ईश्वर के सिवाय तूने कितने नाटक किये ? ईश्वर को छोड़कर तूने बहुत कुछ पकड़ा, मगर आज तक मृत्यु के एक झटके से सब कुछ हर बार छूटता आया है । हजारों बार तुझसे छुड़वाया गया है और इस जन्म में भी छुड़वाया जायेगा । तू जरा सावधान हो जा .......
आपके अन्दर ईश्वर का असीम बल छुपा है भैया ! आप डटे रहो अपनी निष्ठा में, अपने धर्म में, अपने कर्त्तव्य कर्म में। लगे रहो सत्कर्म में। अपनी निष्ठा छोड़ो मत।हिलाने वाली परिस्थितियाँ तो आयेंगी, पर तुम दक्ष रहो।शक्कर खिला शक्कर मिले टक्कर खिला टक्कर मिले।नेकी का बदला नेक है

chr din ki yah jidgani

tamasha hai yah diniya , bhukhe ko deti nahi aur jiske pas kuch hai usko sahati nahi har din hota hai yaha tamasha , har pal hoti hai insaniyat lilam yaha , har pal bikti hai manvata , har pal ujadate hai full yaha , har pal jalti raheti hai masumiyat yaha , dokha aur dard bhari duniya me hai musafir kyo aa fasa hai tu

kab tak samjavo ge aurko yaha , kab tak suljavo ke fasano ko yaha , he mere dil bas samja le apne aapko mit banale apne moula ko aur prit kar de apne prabhu se , bhula de duniya ke jalalat ko , maheka de apni bagiya ko guru giyan aur Guru prem se na rehega tu na rahega tera so kuch bhi hai hoga sara uska , na rahega dukh na rahegi chinta , bas apne mit ko bana le apna rahi , chal us rah par jo hai shashvat , chal us path par jo hai tera path , zuthe is sansar se kyu laga betha hai itnai aash

chr din ki yah jidgani , char din ka hai khel , chal musafir sambhal ja ab nahi to waqt dega tuje thokare , jinke liye fasa betha hai tu vahi bula denge ek din tujko , kahekahe uthege tere janaje pe , mout bhi sharma jayegi , teri rah ke rahi sath chod denge tera , tanhai ki sham tuje bahot satayegi , deep jala de apne daman me Guru prit aur Guru giyan ke jo karenge roshan teri har raho ko

Sunday, April 11, 2010

Guruvar teri charano ki pag dhul jo mil

jaye such kehta hu tumse takdir badal jaye

Sunate hai tari rehmat din rat barasati hai

ek bund jo mil jaye jivan hi bada jaye ...Guruvar..teri..................

Najaro se girana na chahe jitni saja denaaaaaaa

najaro se jo gir jaye muskil hi samhal payeyyyyyyyy.....Guruvar teri........

नन्ही कली

नन्ही कली

एक नन्ही दुलारी कली

जन्म लेकर कितनी खुशियाँ लाए

कहते है साथ उसके लक्ष्मी आए

वो अपने आप में ही है हर देवी का रूप

उसे पाकर ना जाने मैने कितने आशीर्वाद पाए

तमन्ना रखती हूँ ,वो फुलो सी खिले

इस से पहले की वो अपने भंवर से मिले

उसके संग मैं अनुभव करना चाहू

मेरा बचपन,वो अनमोल क्षण

जब कभी मेरी आँखें लगे भरी भरी

मेरी ही मा बन,मुझ पे ममता लूटाती सारी

वो ही मुस्कान और हिम्मत मेरी

एक नन्ही दुलारी कली

ईश्वर से मुझे तोहफे में मिली.
बुराई को बुराई से नहीं बल्कि अच्छाई द्वारा, हिंसा को अंहिसा द्वारा और घृणा को प्रेम से खत्म किया जा सकता है।’अपने शत्रुओं से प्यार करो, ईश्वर में विश्वास करो, भविष्य की चिंता मत करो और दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसे कि तुम उनसे अपेक्षा रखते हो।
यदि मेरा मन व्याकुल है, हमेशा क्रोध, बैर, दुर्भावना और द्वेष से भरा रहता है, तो मैं विश्व को शांति कैसे प्रदान कर सकता हूँ? ऐसा कर ही नहीं सकता क्योंकि स्वयं मुझमें शांति नहीं है। इसलिए संतों और प्रबुद्धों ने कहा- 'शांति अपने भीतर खोजो।' स्वयं अपने भीतर निरीक्षण करके देखना है कि क्या सचमुच मुझमें शांति है।
Priti ki meri ab tum hi badana , tum hi prabhu ho mera ashiyana , kitno ko bhav se tumne hai tara , tumko na bhule ho Satgurudeva , Tera hi sahara hai he Satgurudeva , tumne sikhaya jis rah pe chalna , Bhule na kabhi tujko he Gurudeva bas tera hi sahara hai O satguru Deva
बहुत से रास्ते यूँ तो दिल की तरफ जाते हैं। राहे मोहब्बत से आओ तो फासला बहुत कम है। परमात्मा से मिलने की तड़प हो तो परमात्मा का मिलना असंभव नहीं है। अभी से कर लो निर्णय की 'पाना है तो परमात्मा को पाना है। कहीं नहीं फँसना है। कहीं नहीं रूकना है।' समय मत गँवाओ। व्यर्थ की वस्तुओं में फँसकर जीवन व्यर्थ मत करो। सार्थक सत्यस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए कमर कसो
नश्वर वस्तुओं का राग मिटाने के लिए शाश्वत में राग बढ़ा दो। शाश्वत में राग बढ़ाने से रागरहित अवस्था आ जाएगी। बिना रागरहित हुए भोगी योगी नहीं हो सकता, स्वार्थ सेवा में नहीं बदलता, भक्त भगवान को नहीं मिल पाता। रागरहित होने से भोगी योगी बन जाता है, स्वार्थी सात्त्विक सेवक बन जाता है और भक्त भगवान से मिल जाता है, जीव ब्रह्म से मिल जाता है।
'हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप उस दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।'-श्रीमद्भगवद्गीता-8
जो तुम्हारे दिल को चेतना देकर धड़कन दिलाता है, तुम्हारी आँखों को निहारने की शक्ति देता है, तुम्हारे कानों को सुनने की सत्ता देता है, तुम्हारी नासिका को सूँघने की सत्ता देता है और मन को संकल्प-विकल्प करने की स्फुरणा देता है उसे भरपूर स्नेह करो। तुम्हारी 'मैं....मैं...' जहाँ से स्फुरित होकर आ रही है उस उदगम स्थान को नहीं... भी जानते हो फिर भी उसे धन्यवाद देते हुए स्नेह करो।See More