Thursday, April 22, 2010
'मैं भगवान का हूँ
ऐसे ही यह जीव भगवान से विमुख हो जाता है तो वह बार-बार जन्मता-मरता और दुःख पाता रहता है। पर जब वह भगवान के सम्मुख हो जाता है, अनन्य भाव से भगवान की शरण में हो जाता है तो वह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है। इतना ही नहीं, विश्व का भी कल्याण करने वाला हो जाता है।
साधक को सबसे पहले 'मैं भगवान का हूँ' इस प्रकार अपने अहंता को बदल देना चाहिए। कारण कि बिना अहंता के बदले साधन सुगमता से नहीं होता और अहंता के बदलने पर साधन सुगमता से, स्वाभाविक ही होने लगता है।
विवाह हो जाने पर कन्या अपनी अहंता को बदल देती है कि 'मैं तो ससुराल की ही हूँ' और पिता के कुल का सम्बन्ध बिल्कुल छूट जाता है। ऐसे ही साधक को अपनी अहंता बदल देनी चाहिए कि 'मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं, मैं संसार का नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है।' अहंता के बदलने पर ममता भी अपने आप बदल जाती है।
'मैं प्रभु के चरणों में ही पड़ा हुआ हूँ' – ऐसा मन में भाव रखते हुए जो कुछ अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाय उसमें भगवान का मंगलमय विधान मानकर परम प्रसन्न रहें।
भगवान के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा वह मंगलमय हो होगा। पूरी परिस्थिति मेरी समझ में आये या न आये यह बात दूसरी है, पर भगवान का विधान तो मेरे लिए कल्याणकारी ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं। इसलिए जो कुछ होता है वह मेरे कर्मों का फल नहीं है, प्रत्युत भगवान के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हित के लिए भेजा हुआ विधान है।
तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठ में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।
-प्राप्ति की इच्छा तीव्र न होने के कारण संसार की इच्छा जोर पकड़ती है। संसार की इच्छाएँ जीव को नचाती रहती हैं और राग पैदा करती रहती हैं। वस्तुओं में राग बढ़ता है उसे लोभ कहते हैं, व्यक्ति में राग बढ़ता है उसे मोह कहते हैं। राग ही लोभ और मोह बना देता है, राग काम बना देता है।
तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठ में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।
-प्राप्ति की इच्छा तीव्र न होने के कारण संसार की इच्छा जोर पकड़ती है। संसार की इच्छाएँ जीव को नचाती रहती हैं और राग पैदा करती रहती हैं। वस्तुओं में राग बढ़ता है उसे लोभ कहते हैं, व्यक्ति में राग बढ़ता है उसे मोह कहते हैं। राग ही लोभ और मोह बना देता है, राग काम बना देता है।
सच्चे प्यार
धर्म
किसी को पानी पिलायें, भोजन करायें एवं बदले में पच्चीस-पचास रूपये मिल जायें – यह अच्छे कार्य करने का फल नहीं है। अच्छे कार्य करने का फल यह है कि हमारी आदतें अच्छी बनें। कोई ईनाम मिले तभी सुखी होंगे क्या ? प्यासे को पानी एवं भूखे को भोजन देना यह कार्य क्या स्वयं ही इतना अच्छा नहीं है कि उस कार्य को करने मात्र से हमें सुख मिले ? है ही। उत्तम कार्य को करने के फलस्वरूप चित्त में जो प्रसन्नता होती है, निर्मलता का अनुभव होता है उससे उत्तम फल अन्य कोई नहीं है। यही चित्त का प्रसाद है, मन की निर्मलता है, अंतःकरण की शुद्धि है कि कार्य करने मात्र से प्रसन्न हो जायें। अतः जिस कार्य को करने से हमारा चित्त प्रसन्न हो, जो कार्य शास्त्रसम्मत हो, महापुरुषों द्वारा अनुमोदित हो वही कार्य धर्म कहलाता है।
बाहर कैसी भी घटना घटी हो, चाहे वह कितनी भी प्रतिकूल लगती हो, परन्तु तुम्हें उससे खिन्न होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि अन्ततोगत्वा होती वह तुम्हारे लाभ के लिए ही है। तुम यदि अपने-आपमें रहो तो तुम्हें मिला हुआ शाप भी तुम्हारे लिए वरदान का काम करेगा।
प्रतिकूलता से भय मत करो। सदा शांत और निर्भय रहो। भयानक दृश्य (द्वैत) केवल स्वप्नमात्र है, डरो मत।
चिन्ता, भय, शोक, व्यग्रता और व्यथा को दूर फेंक दो। उधर कतई ध्यान मत दो।
सारी शक्ति निर्भयता से प्राप्त होती है, इसलिए बिल्कुल निर्भय हो जाओ। फिर तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।
Tuesday, April 20, 2010
Monday, April 19, 2010
बाल संस्कार केन्द्र के 21 अनमोल रत्न
1. सूर्योदय से पहले ब्रह्ममुहूर्त में उठना।
2. प्रातः शुभ चिंतन, शुभ संकल्प, इष्टदेव अथवा गुरूदेव का ध्यान।
3. करदर्शन।
4. प्रार्थना, जप, ध्यान, आसन, प्राणायाम।
5. सूर्य को अर्घ्य एवं सूर्यनमस्कार।
6. तुलसी के 5 पत्तों का सेवन कर 1 गिलास पानी पीना।
7. माता-पिता एवं गुरूजनों को प्रणाम।
8. नियमित अध्ययन।
9. अच्छी संगत।
10. भोजन से पूर्व गीता के पंद्रहवें अध्याय का पाठ व सात्त्विक, सुपाच्य तथा स्वास्थ्कर भोजन।
11. त्रिकाल संध्या।
12. सत्शास्त्र-पठन और सत्संग-श्रवण।
13. सेवा, कर्त्तव्यपालन व परोपकार।
14. सत्य एवं मधुर भाषण, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना)।
15. समय का सदुपयोग। 16. परगुणदर्शन (दूसरों के अच्छे गुणों पर दृष्टि रखना)।
17. घरकाम में मदद और स्वच्छता।
18. खेलकूद।
19. त्राटक, मौन।
20. जल्दी सोना-जल्दी उठना।
21. सोने से पहले आत्मनिरीक्षण, ईश्वर-गुरूदेव का चिंतन, धन्यवाद।
आत्मबल
जैसे-जैसे मनुष्य अपने सामर्थ्य में अधिकाधिक विश्वास करता है, वैसे-वैसे वह व्यवहार एवं परमार्थ दोनों में अधिकाधिक विजय हासिल करता है। अमुक कार्य करने का उसमें सामर्थ्य है, ऐसा विश्वास और श्रद्धा-यह कार्यसिद्धि का मूलभूत रहस्य है।
मनुष्य अपनी उन्नति शीघ्र नहीं कर पाता इसका मुख्य कारण यही है कि उसे अपने सामर्थ्य पर संदेह होता है। वह 'अमुक कार्य मेरे से न हो सकेगा' ऐसा सोच लेता है। जिसका परिणाम यह आता है कि वह उस कार्य को कभी करने का प्रयत्न भी नहीं करता। आत्मश्रद्धा का सीधा संबंध संकल्पबल के साथ है।
आत्मबल में अविश्वास प्रयत्न की सब शक्तियों को क्षीण कर देता है। प्रयत्न के बिना कोई भी फल प्रगट नहीं होता। अतः प्रयत्न को उत्पन्न करने वाली आत्मश्रद्धा का जिसमें अभाव है उसका जीवन निष्क्रिय, निरुत्साही एवं निराशाजनक हो जाता है। जहाँ-जहाँ कोई छोटा-बड़ा प्रयत्न होता है वहाँ-वहाँ उसके मूल में आत्मश्रद्धा ही स्थित होती है और अंतःकरण में जब तक आत्मश्रद्धा स्थित होती है तब तक प्रयत्नों का प्रवाह अखंड रूप से बहता रहता है। आत्मश्रद्धा असाधारण होती है तो प्रयत्न का प्रवाह किसी भी विघ्न से न रुके ऐसा असाधारण एवं अद्वितिय होता है।
ASLI GIYAN
Sunday, April 18, 2010
तत्वज्ञान
दूसरी बात, तत्वज्ञानकी इच्छासे व्यक्तित्व (अहम्) दृढ़ होता है, जो तत्वज्ञानमें बाधक है । वास्तवमें तत्वज्ञान, मुक्ति स्वतःसिद्ध है । तत्वज्ञानकी इच्छा करके हम अज्ञानको सत्ता देते है, अपनेमें अज्ञानकी मान्यता करते है, जब कि वास्तवमें अज्ञानकी सत्ता है नहीं ।
इसलिए तत्वज्ञान होनेपर फिर मोह नहीं होता —‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्’ (गीता ४/३५); क्योंकि वास्तवमें मोह है ही नहीं । मिटता वही है, जो नहीं होता और मिलता वही है, जो होता है
Saturday, April 17, 2010
हो तो भगवान के भक्त और टुकड़ों की चिन्ता करते हो ? हो तो भगवान के भक्त और चीथड़ों की चिन्ता करते हो ? हो तो प्रभु के प्यारे और खुशामद की अपेक्षा करते हो ? दूर हटा दो इन अपेक्षाओं को। अनपेक्ष शुचिर्दक्षः। अपेक्षा रहित हो जाओ शुद्ध हो जाओ।
Thursday, April 15, 2010
तुम्हारे स्व में
नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्याप न शोषयति मारूतः।।
'आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।'
परमात्म-प्राप्ति की इच्छा तीव्र न होने के कारण संसार की इच्छा जोर पकड़ती है। संसार की इच्छाएँ जीव को नचाती रहती हैं और राग पैदा करती रहती हैं। वस्तुओं में राग बढ़ता है उसे लोभ कहते हैं, व्यक्ति में राग बढ़ता है उसे मोह कहते हैं।
राग ही लोभ और मोह बना देता है, राग काम बना देता है। राग ही क्रोध को जन्म देता है।
इच्छित वस्तु पाने में किसी ने विघ्न डाला और वह अपने से छोटा है तो उस पर क्रोध आयगा, वह अपनी बराबरी का है तो उससे द्वेष होगा और अपने से वह बड़ा है तो उससे भय होगा। राग से ही क्रोध, द्वेष और भय पैदा होते हैं।
राग से ही मोह पैदा होता है और राग से ही काम पैदा होता है।केवल राग के कारण ही जीव की दुर्दशा है।
जीव रागरहित हो गया तो वह योगी हो गया, वह भक्त हो गया, वह ज्ञानी हो गया, वह मुक्त हो गया।
Wednesday, April 14, 2010
अनन्य भक्ति और अव्यभिचारिणी भक्ति अगर भगवान में हो जाय, तो भगवत्प्राप्ति कठिन नहीं है। भगवान प्राणिमात्र का अपना आपा है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पति के सिवाय अन्य पुरूष में पतिभाव नहीं रखती, ऐसे ही जिसको भगवत्प्राप्ति के सिवाय और कोई सार वस्तु नही दिखती, ऐसा जिसका विवेक जाग गया है, उसके लिए भगवत्प्राप्ति सुगम हो जाती है। वास्तव में, भगवत्प्राप्ति ही सार है
केवल कुर्सी-टेबल पर बैठकर कलम चलाने के लिए ही बुद्धि नहीं मिली है। बुद्धिपूर्वक कलम तो भले चलाओ, परंतु बुद्धि का उपयोग केवल रोटी कमाकर पेट भरना ही नहीं है। कलम भी चलाओ तो परमात्मा को रिझाने के लिये और कुदाली चलाओ तो भी उसको रिझाने के लिए।
फकीर
जो प्रभु के प्रेम में इतना आगे बड जाता है, प्रभु वियोग में तड़पता रहता है, सुध नहीं उसे किसी बात की, उसने तन, मन, धन, अहंकार सब कुछ समर्पित कर दिया प्रभु के आगे, प्रेम में अहंकार आड़े आ जाता है, अहंकार बोलेंगा भई मै क्यों झुकू? और प्रेम में तो झुकना ही है, डूबना ही है, जीते जी मरना ही है
उसे अपने शरीर का होश नहीं है, कैसा भी वस्त्र मिला पहनलिया, कैसा भी रुखा-सुखा मिला खा लिया, उसकी न ही खुद की कोई इच्छा है, न ही किसी से कोई उम्मीद, उसने न ही किसी से कुछ लेना है, न ही किसी को कुछ देना है, उसके पास जो कुछ है वो उसने पहले ही प्रभु को समर्पित कर दिया है वो खली है, फकीर है बस जपता रहता है प्रभु का नाम.....
बस उसी की तड़प... उसी की चिंता... उसी की लगन... उसी की प्यास, खंजर.....प्रभु के नाम का खंजर उसके सिने में खुपा रहता है....उसी का दर्द सिने में लिए वो घूमता रहता है, उसी की तड़प में जी रहा है... उसी का नाम रट रहा है, न रात में सोने की चिंता है, न दिन में खाने-पिने की, न ही मान-बड़ाई की...
'बाल संस्कार केन्द्र' स्पेशल
तूफानों से जो टकराये, उसे इन्सान कहते हैं।।1।।
हमें रोक सके, ये ज़माने में दम नहीं।
हमसे है ज़माना, ज़माने से हम नहीं।।2।।
जिन्दगी के बोझ को, हँसकर उठाना चाहिए।
राह की दुश्वारियों पे, मुस्कुराना चाहिए।।3।।
बाधाएँ कब रोक सकी हैं, आगे बढ़ने वालों को।
विपदाएँ कब रोक सकी हैं, पथ पे बढ़ने वालों को।।4।।
मैं छुई मुई का पौधा नहीं, जो छूने से मुरझा जाऊँ।
मैं वो माई का लाल नहीं, जो हौवा से डर जाऊँ।।5।।
जो बीत गयी सो बीत गयी, तकदीर का शिकवा कौन करे।
जो तीर कमान से निकल गयी, उस तीर का पीछा कौन करे।।6।।
अपने दुःख में रोने वाले, मुस्कुराना सीख ले।दूसरों
के दुःख दर्द में आँसू बहाना सीख ले।।7।।
जो खिलाने में मज़ा, वो आप खाने में नहीं।
जिन्दगी में तू किसी के, काम आना सीख ले।।8।।
खून पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा।
यह नाव तो हिलती जाएगी, तू हँसता जा या रोता जा।।9।।
खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले।
खुदा बन्दे से यह पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।।10।
शब्द संभाले बोलिए
शब्द संभाले बोलिए ......
शब्द के हाथ न पाव रे ........
१। एक शब्द औषध करे..., एक शब्द करे घाव रे ......
२। मुख से निकला शब्द तो, वापिस फिर न आएगा .....
३। दिल किसी का तोरकर तू भी चेन न पायेगा .....
४। इसलिए कहते गुरूजी ,शब्द पे रखना ध्यान रे...
५। सच करवा भाता न किसीको ,...सच मीठा कर बोलिए...
६। गुरु की अमृत वाणी सुनकर, मुख से अमृत घोलिये...
७। इसलिए कहते गुरूजी, मीठा शब्द महान रे......
८। मुख की मौन देवता बनाती, मन की मौन भगवान रे.......
९। मौन से ही तुम अपने , शब्दों मैं भर लो जान रे ....
१०। इसलिए कहते गुरूजी,मौन ही भगवान रे...
११। ज्ञानी तो हर वक्त ही, मौन मैं ही है रहता ....
१२। मुख से कुछ न कहते हुए भी, सब कुछ ही है वो कहता ....
१३। इसलिए कहते गुरूजी, मौन ही वरदान रे.......
१४। एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव रे.....
वासुदेव: सर्वम्
Tuesday, April 13, 2010
Monday, April 12, 2010
chr din ki yah jidgani
kab tak samjavo ge aurko yaha , kab tak suljavo ke fasano ko yaha , he mere dil bas samja le apne aapko mit banale apne moula ko aur prit kar de apne prabhu se , bhula de duniya ke jalalat ko , maheka de apni bagiya ko guru giyan aur Guru prem se na rehega tu na rahega tera so kuch bhi hai hoga sara uska , na rahega dukh na rahegi chinta , bas apne mit ko bana le apna rahi , chal us rah par jo hai shashvat , chal us path par jo hai tera path , zuthe is sansar se kyu laga betha hai itnai aash
chr din ki yah jidgani , char din ka hai khel , chal musafir sambhal ja ab nahi to waqt dega tuje thokare , jinke liye fasa betha hai tu vahi bula denge ek din tujko , kahekahe uthege tere janaje pe , mout bhi sharma jayegi , teri rah ke rahi sath chod denge tera , tanhai ki sham tuje bahot satayegi , deep jala de apne daman me Guru prit aur Guru giyan ke jo karenge roshan teri har raho ko
Sunday, April 11, 2010
jaye such kehta hu tumse takdir badal jaye
Sunate hai tari rehmat din rat barasati hai
ek bund jo mil jaye jivan hi bada jaye ...Guruvar..teri..................
Najaro se girana na chahe jitni saja denaaaaaaa
najaro se jo gir jaye muskil hi samhal payeyyyyyyyy.....Guruvar teri........
नन्ही कली
एक नन्ही दुलारी कली
जन्म लेकर कितनी खुशियाँ लाए
कहते है साथ उसके लक्ष्मी आए
वो अपने आप में ही है हर देवी का रूप
उसे पाकर ना जाने मैने कितने आशीर्वाद पाए
तमन्ना रखती हूँ ,वो फुलो सी खिले
इस से पहले की वो अपने भंवर से मिले
उसके संग मैं अनुभव करना चाहू
मेरा बचपन,वो अनमोल क्षण
जब कभी मेरी आँखें लगे भरी भरी
मेरी ही मा बन,मुझ पे ममता लूटाती सारी
वो ही मुस्कान और हिम्मत मेरी
एक नन्ही दुलारी कली
ईश्वर से मुझे तोहफे में मिली.
