Wednesday, May 19, 2010
हमारे पास खाने को पर्याप्त अन्न, पहनने को वस्त्र, रहने को घर होते हुए भी हम भीतर से दुःखी क्यों हैं? दीन क्यों है ? अशान्त क्यों हैं ? ...क्योंकि हम लोग अपने भीतर की चेतना जगाने की तरकीब भूल गये हैं, अन्तर में निहित आनन्दसागर से संपर्क खो बैठे हैं, परमात्मा का अनुसंधान करने के संपर्क-सूत्र छोड़ बैठे हैं, मंत्रजप एवं उसके विधि-विधान त्याग चुके हैं।
वह मति दुर्गति है, जिसमें परमात्मा की तड़प नहीं। वह जीवन व्यर्थ है जिस जीवन में ईश्वर के गीत गूँज न पाए। वह धन बोझा है जो आत्मधन कमाने के काम न आए। वह मन तुम्हारा शत्रु है जिस मन से तुम अपने आपसे मिल न पाओ। वह तन तुम्हारा शत्रु है जिस तन से तुम परमात्मा की ओर न चल पाओ। ऐसा जिनका अनुभव होता है वे साधक ज्ञान के अधिकारी होते हैं।
જે નમી જાય છે તે સૌને ગમી જાય છે એટલે કે જીવન સંગ્રામમાં ઘણા બધા એવા પ્રસંગો-બનાવો અને ઘટનાઓ બનતી હોય છે કે ત્યાં વ્યક્તિ જો થોડું-ઘણું પણ નમી જાય તો તે હારી ગયેલી બાજીને ફરીથી જીતી જાય છે. વ્યક્તિ પોતાના નિર્ણયકે ફેંસલા પર અક્કડ વલણ રાખવાને બદલે જો થોડી નમે છે ત્યારે તે વ્યક્તિ સૌની પ્રિય બની જાય છે. એટલે જ કહેવાય છે કે જે નમે તે સૌ...ને ગમે.
Monday, May 17, 2010
माँका ॠण सबसे बड़ा होता है।परन्तु पुत्र भगवान् का भक्त हो जाय तो माँका ऋण नहीं रहता और माँ का कल्याण भी हो जाता है! इसलिये बहनों!माताओ! अपने बालकोंको भगवान् में लगाओ,उनको भक्त बनाओ!आपकी गोदीमें भक्त आये,भगवान् का भजन करनेवाला आये ऐसा बेटा हो।ऐसा बालक होना बिलकुल आपके हाथकी बात है।बालक का पहला गुरु माँ है।माँ का स्वभाव पुत्रपर ज्यादा आता है।
आया जहाँ से सैर करने, हे मुसाफिर ! तू यहाँ। था सैर करके लौट जाना, युक्त तुझको फिर वहाँ। तू सैर करना भूलकर, निज घर बनाकर टिक गया। कर याद अपने देश की, परदेश में क्यों रुक गया।। फँसकर अविद्या जाल में, आनन्द अपना खो दिया। नहाकर जगत मल सिन्धु में, रंग रूप सुन्दर धो दिया। निःशोक है तू सर्वदा, क्यों मोह वश पागल भया। तज दे मुसाफिर ! नींद, जग, अब भी न तेरा कुछ गया।।
सच्चा भक्त अपने किसी अनिष्टकी आशङ्कासे सन्मार्गका -ईश्वर-सेवाका कदापि त्याग नहीं करता।तन,मन,धन सभी कुछ प्रभुकी ही तो सम्पति है,फिर उन्हें प्रभुके काममें लगा देनेमें अनिष्ट कैसा?इसीसे यदि असहाय रोगीकी सेवा करते-करते भक्तके प्राण चले जाते हैं या भूखे-गरीबोंका पेट भरनेमें भक्तकी सारी समपति स्वाहा हो जाते है तो वह अपने को बड़ा भाग्यवान् समझता है।
Friday, May 14, 2010
हम भगवान् के हो जाते हैं तो भगवान् की सृष्टिके साथ उत्तम-से-उत्तम बर्ताव करना हमारे लिये आवश्यक हो जाता है । यह सब सृष्टि प्रभुकी है, ये सभी हमारे मालिकके हैं—ऐसा भाव रखोगे तो उनके साथ हमारा बर्ताव बड़ा अच्छा होगा । त्यागका, उनके हितका, सेवाका बर्ताव होगा । इससे व्यवहार तो शुद्ध होगा ही, हमारा परमार्थ भी सिद्ध हो जायगा, हम संसारसे मुक्त हो जायँगे । अतः हम भगवान् के होकर भगवान् का काम करें । ये सब प्राणी भगवान् के हैं, इन सबकी सेवा करें । अपना यह भाव बना लें—
हम नाशवान् चीजोंको अपनी मानकर फँस जाते हैं । ये चीजें पहले भी अपनी नहीं थी और पीछे भी अपनी नहीं रहेंगी—यह पक्की बात है । बीचमें उनको अपनी मानकर हम फँस जाते हैं । अगर हम उन चीजोंको अपनी न मानकर अच्छे-से-अच्छे, उत्तम-से-उत्तम व्यवहारमें लायें तो हम बंधनमें नहीं पड़ेंगे । उन वस्तुओंमें हमारा अपनापन जितना-जितना छूटता चला जायगा, उतनी-उतनी हमारी मुक्ति होती चली जायगी ।
गुरू जीवित है तब भी गुरू, गुरू होते हैं और गुरू का शरीर नहीं होता तब भी गुरू गुरू ही होते हैं।
गुरू नजदीक होते हैं तब भी गुरू गुरू ही होते हैं और गुरू का शरीर दूर होता है तब भी गुरू दूर नहीं होते।
गुरू प्रेम करते हैं, डाँटते हैं, प्रसाद देते हैं, तब भी गुरू ही होते हैं और गुरू रोष भरी नजरों से देखते हैं, ताड़ते हैं तब भी गुरू ही होते हैं।
गुरू नजदीक होते हैं तब भी गुरू गुरू ही होते हैं और गुरू का शरीर दूर होता है तब भी गुरू दूर नहीं होते।
गुरू प्रेम करते हैं, डाँटते हैं, प्रसाद देते हैं, तब भी गुरू ही होते हैं और गुरू रोष भरी नजरों से देखते हैं, ताड़ते हैं तब भी गुरू ही होते हैं।
ये ठाकुरजीके हैं
अपने बालकोंका अपना न मानकर (ठाकुरजीका मानकर) पालन करो और चाहे जो अपने बालक नहीं हैं,उनका पालन करो तो बड़ा पुण्य होगा । परन्तु ममता करनेसे यह पुण्य खत्म हो जाता है । मैं अपने बच्चोंका पालन करूँ,अपने जनोंकी रक्षा करूँ—यह अपनापन ही आपके पुण्यका भक्षण कर जाता है । इसलिए ! आप कृपा करके अपने कुटुम्बको भगवान् का मानें । छोटे-बड़े जितने हैं, सब प्रभुके हैं । उनकी सेवा करें और प्रभुसे कहें कि हे नाथ ! हम आपके जनोंकी सेवा करते हैं यदि आप ऐसा करने लग जायँ तो भगवान् पर इसका अहसान हो जाय । भगवान् भी कहेंगे कि हाँ भाई, मेरे बालकोंका पालन किया । आप ममता करेंगे तो भगवान् पर कोई अहसान नहीं । अपने बच्चोंका पालन तो सब करते हैं । केवल यह भाव रखें कि ये हमारे नहीं हैं, ये ठाकुरजीके हैं । जीवन सफल हो जायगा
इस प्रकार भगवान् और सन्त सब कहते हैं की यह जीव परमात्माका अंश है यद्यपि हम परमात्माके हैं ही, तथापि ‘हम परमात्माके हैं’ ऐसा जबतक नहीं मानेंगे, तबतक परमात्माके होते हुए भी लाभ नहीं ले सकेंगे । जबतक हम परमात्मासे विमुख रहेंगे, तबतक हमें शान्ति, प्रसन्नता नहीं मिलेगी, आनंद नहीं मिलेगा ।
इस प्रकार भगवान् और सन्त सब कहते हैं की यह जीव परमात्माका अंश है यद्यपि हम परमात्माके हैं ही, तथापि ‘हम परमात्माके हैं’ ऐसा जबतक नहीं मानेंगे, तबतक परमात्माके होते हुए भी लाभ नहीं ले सकेंगे । जबतक हम परमात्मासे विमुख रहेंगे, तबतक हमें शान्ति, प्रसन्नता नहीं मिलेगी, आनंद नहीं मिलेगा ।
ऐसा कोई लोक नहीं जिसका विनाश न हो। ऐसा कोई शरीर नहीं जो मरता न हो। ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसका रूपान्तर न हो। यह अकाट्य सिद्धान्त है।अपनी बुद्धि की योग्यता बढ़ाकर, अपनी क्षमता बढ़ाकर यहीं अपनी अमरता का साक्षात्कार कर लो।तुम निर्भीक हो, निर्द्वन्द्व हो। निश्चिन्त जीवन जीने की कला पाकर जीते जी मुक्त बनो।
Friday, May 7, 2010
रूचि
माँग आसानी से पूरी हो सकती है और रूचि जल्दी पूरी होती नहीं। जब होती है तब निवृत्ति नहीं होती, अपितु और गहरी उतरती है अथवा उबान और विषाद में बदलती है। रूचि के अनुसार सदा सब चीजें होंगी नहीं, रूचि के अनुसार सब लोग तुम्हारी बात मानेंगी नहीं। रूचि के अनुसार सदा तुम्हारा शरीर टिकेगा नहीं। अन्त में रूचि बच जायेगी, शरीर चला जायगा। रूचि बच गई तो कामना बच गई। जातीय सुख की कामना, धन की कामना, सत्ता की कामना, सौन्दर्य की कामना, वाहवाही की कामना, इन कामनाओं से सम्मोह होता है। सम्मोह से बुद्धिभ्रम होता है, बुद्धिभ्रम से विनाश होता है।करने की, मानने की और जानने की शक्ति को अगर रूचि के अनुसार लगाते हैं तो करने का अंत नहीं होगा, मानने का अंत नहीं होगा, जानने का अंत नहीं होगा। इन तीनों योग्यताओं को आप अगर यथायोग्य जगह पर लगा देंगे तो आपका जीवन सफल हो जायगा।
आपका समय इतना बहुमूल्य है कि समय देकर आप दुनिया की सब चीजें प्राप्त कर सकते हैं लेकिन दुनिया की सब चीजें न्योछावर करके भी आप बीते हुए आयुष्य का सौवाँ हिस्सा भी वापस नहीं पा सकते।उसका खूब-खूब सदुपयोग करेंक। समय को किसी के आँसू पोंछने में लगायें, ईश्वरप्राप्ति में लगायें।परम श्रेष्ठ परमात्मा के लिए समय खर्च के लिए समय खर्च करते हैं तो बदले में आप परमातममय बन जाते हैं
जैसे स्वप्न में मिली हुई सजा जागृत अवस्था में नहीं रहती, दूध में से घी निकलने के बाद वह दूध में नहीं मिलता अपितु पृथक ही रहता है, लकड़ी जल जाने के बाद वह अग्निरूप हो जाती है और लकड़ी का कहीं नामोनिशान नहीं रहता है, उसी प्रकार संसारस्वप्न में से जो जीव जाग जाता है उसे फिर संसार स्वप्न की कैद में, माता के गर्भ में आने का दुर्भाग्य नहीं होता
संसारी लोग की और साधक की दिशा बहुत अलग होती है। संसारी के पास जो जो संसार के पद-पदार्थ होते हैं उन्हें बढ़ाने की एवं भविष्य के हवाई किले बाँधने की इच्छा होती है। साधक अपने पास जो है उसको सत्कार्य में लगाने के लिए सोचता है और भविष्य में हरिमय हो जाने की इच्छा करता है।साधक का लक्ष्य परमात्मा है और संसारी का लक्ष्य तुच्छ भोग है। संसारी की धारा चिन्ता के तरफ जा रही है और साधक की धारा चिन्तन के तरफ जा रही है।
ईश्वरीयविधान को नजानने से हीसारे दुःख दर्दआते हैं।। किसी भीव्यक्ति,वस्तु,प्राणी, पदार्थमें हम आबद्धहुए तोईश्वरीयविधान हमेंवहाँ से ऊपरउठाने के लिएविघ्न बाधाएँऔर दण्ड देकरभी सावधान कर देताहै। जो प्रेमपरमात्मा सेकरना चाहिए वहप्रेम अगरकिसी व्यक्ति,वस्तु, पद सेकिया तो ईश्वरीयविधान हमेंवहाँ से बलात्घसीट लेता है।अतः ईश्वरीयविधान कोसमझकर सहज मुक्तिके मार्ग परअग्रसर रहो।"
Sunday, May 2, 2010
teri chah
He mera ke kanihiya , he bakto ke bhagawan , shabri ke ram , teri bhakti ka dan de de , teri priti ki dan de de , sansar ne to khub sataya hai , teri priti pa kar ham teri raho me chal pade , degree pane ke liye hamen to bahto sal khapa diye , pet bharane kiliye to ham pal pal apne ko mar rahe hai par kyu teri priti ki aur janae ka man nahi hota prabhu , teri rah par chalne ki priti kara de , teri giyan ki ras me dubane ka samarthay de de data , he prabhu , he mere nath , me to bebas hu , nadan hu , kanjor hu , par to to sarve samarth hai , sarve jag ka palak hai , tumhare liye to kuch bhi asambhav nahi hai , mujme tere tak aane ke takat nahi hai prabhu par tu to mere pass aa sakata hai , kya mera pyar tume nahi risa pata hai , kya mera sneh tumehe nahi pighala pata ,
kya meri arju me voh bat nahi hai jo meri dil me hai , he nath he prabhu ab to daya kar do , ab to apni kripa barsa do mere nath mere prabhu , bas tere siva kuch nahi bhata ab to , teri raho ke siva koi rah nahi meri , teri chah ke siva koi chah nahi meri
kya meri arju me voh bat nahi hai jo meri dil me hai , he nath he prabhu ab to daya kar do , ab to apni kripa barsa do mere nath mere prabhu , bas tere siva kuch nahi bhata ab to , teri raho ke siva koi rah nahi meri , teri chah ke siva koi chah nahi meri
फिर क्या
संसार और चित्तवृत्तियों का बहुत पसारा मत करो। बहुत पसारा करने से फिर गंदी मोरियों से पसार होना पड़ेगा, नालियों से पसार होना पड़ेगा। कभी दो पैरवाली माँ की नाली से पसार होंगे कभी चार पैरवाली माँ की नाली से पसार होंगे, कभी आठ पैरवाली माँ की नाली से, कभी सौ पैरवाली माँ की नाली से। आज तक ऐसी कई प्रकार की माँ की नालियों से पसार होते आये हैं युगों से। अब कब तक उन नालियों से गुजरते रहोगे ? अब उन नालियों से उपराम हो जाओ। अब तो उस परमात्मा से मिलो, फिर कभी किसी नाली से गुजरना न पड़े।
अपने विवेक और वैराग्य को निरन्तर जागृत रखना। विवेक जरा-सा भी कम हुआ कि नाली तैयार हो जाती है। विवेक जरा-सा भी कम हुआ कि नाली तैयार हो जाती है। ब्रह्मचारी को जरा-सी विस्मृति हो जाएगी तो वह कुलटा उसे फिर से बुलाने में उत्सुक है। तुम सदा याद रखना कि आखिर क्या ? इतना खा लिया फिर क्या ? इतना भोग लिया फिर क्या ?
अपने विवेक और वैराग्य को निरन्तर जागृत रखना। विवेक जरा-सा भी कम हुआ कि नाली तैयार हो जाती है। विवेक जरा-सा भी कम हुआ कि नाली तैयार हो जाती है। ब्रह्मचारी को जरा-सी विस्मृति हो जाएगी तो वह कुलटा उसे फिर से बुलाने में उत्सुक है। तुम सदा याद रखना कि आखिर क्या ? इतना खा लिया फिर क्या ? इतना भोग लिया फिर क्या ?
सच्चे सदगुरु तो तुम्हारे स्वरचित सपनों की धज्जियाँ उड़ा देंगे। अपने मर्मभेदी शब्दों से तुम्हारे अंतःकरण को झकझोर देंगे। वज्र की तरह वे गिरेंगे तुम्हारे ऊपर। तुमको नया रूप देना है, नयी मूर्ति बनाना है, नया जन्म देना है न ! वे तरह-तरह की चोट पहुँचायेगे, तुम्हें तरह-तरह से काटेंगे तभी तो तुम पूजनीय मूर्ति बनोगे। अन्यथा तो निरे पत्थर रह जाओगे।
निष्काम कर्म करो लेकिन कर्म निष्प्रयोजन तो नहीं होना चाहिए। रागरहित होने के लिए स्वार्थरहित और सप्रयोजन, सार्थक कर्म होना चाहिए। तभी वह परहित का कार्य निष्काम सेवा बन सकेगा। रागरहित होते ही जो होना चाहिए वह होने लगेगा। जो नहीं होना चाहिए वह नहीं होगा। तो फल क्या होगा ? तुम्हारे चित्त में बड़ी शान्ति रहेगी सूर्य के होने से जो होना चाहिए वह अपने आप होने लगता है, सूर्य को कुछ करना नहीं पड़ता
sab sunder hai , ishavar sunder hai , uski kripa sunder hai , ishavar ki banayi huwi yah duniya sunder hai , usme basane vale sab insan sunder hai , bas hamari soch sunder ho jaye , hamari buddhi sunder ho jaye , hamare karm sunder ho jaye , hamri sadhna aur simran sunder ho jaye , to duniya swarg se sunder ho jaye ,
चित्त की मधुरता से, बुद्धि की स्थिरता से सारे दुःख दूर हो जाते हैं। चित्त की प्रसन्नता से दुःख तो दूर होते ही हैं लेकिन भगवद-भक्ति और भगवान में भी मन लगता है। इसीलिए कपड़ा बिगड़ जाये तो ज्यादा चिन्ता नहीं, दाल बिगड़ जाये तो बहुत फिकर नहीं, रूपया बिगड़ जाये तो ज्यादा फिकर नहीं लेकिन अपना दिल मत बिगड़ने देना।
त्याग
जीवन में त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। सब कुछ त्यागने की शक्ति होनी चाहिए। जिनके पास त्यागने की शक्ति होती है वे ही वास्तव में भोग सकते हैं। जिसके पास त्यागने की शक्ति नहीं है वह भोग भी नहीं सकता। त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए। यश मिल गया तो यश के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए, धन के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए, सत्ता के त्याग का सामर्थ्य होना चाहिए।
सत्ता भोगने की इच्छा है और सत्ता नहीं मिल रही है तो आदमी कितना दुःखी होता है ! सत्ता मिल भी गई दो-पाँच साल के लिए और फिर चली गई। कुर्सी तो दो-पाँच साल की और कराहना जिन्दगी भर। यही है बाहरी सुख का हाल। विकारी सुख तो पाँच मिनट का और झंझट जीवन भर की।
सत्ता मिली तो सत्ता छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। दृश्य दिखा तो बार-बार दृश्य देखने की आसक्ति को छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। धन मिला तो धन का सदुपयोग करने के लिए धन छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। यहाँ तक कि अपना शरीर छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। जब मृत्यु आवे तब शरीर को भीतर से पकड़कर बैठे न रहें। चलो, मृत्यु आयी तो आयी, हम तो वही हैं चिदघन चैतन्य चिदाकाश स्वरूप.... सोऽहं...सोऽहम्। ऐसे त्यागी को मरने का भी मजा आता है और जीने का भी मजा आता है।
सत्ता भोगने की इच्छा है और सत्ता नहीं मिल रही है तो आदमी कितना दुःखी होता है ! सत्ता मिल भी गई दो-पाँच साल के लिए और फिर चली गई। कुर्सी तो दो-पाँच साल की और कराहना जिन्दगी भर। यही है बाहरी सुख का हाल। विकारी सुख तो पाँच मिनट का और झंझट जीवन भर की।
सत्ता मिली तो सत्ता छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। दृश्य दिखा तो बार-बार दृश्य देखने की आसक्ति को छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। धन मिला तो धन का सदुपयोग करने के लिए धन छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। यहाँ तक कि अपना शरीर छोड़ने का सामर्थ्य होना चाहिए। जब मृत्यु आवे तब शरीर को भीतर से पकड़कर बैठे न रहें। चलो, मृत्यु आयी तो आयी, हम तो वही हैं चिदघन चैतन्य चिदाकाश स्वरूप.... सोऽहं...सोऽहम्। ऐसे त्यागी को मरने का भी मजा आता है और जीने का भी मजा आता है।
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