Tuesday, October 2, 2012

श्री योगवसिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे......
जब उस राजा ने गन्धमादन पर्वत पर बड़ा तप किया तब देवताओं के राजा इन्द्र ने मुझको बुलाकर आज्ञा दी कि: हे दूत! तुम गन्धमादन पर्वत पर जो नाना प्रकार की लताओं और वृक्षों से पूर्ण है, विमान, अप्सरा और नाना प्रकार की सामग्री एवं गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध, किन्नर, ताल, मृदङ्गादि वादित्र संग ले जाकर राजा को विमान पर बैठा के यहाँ ले आओ । तब मैं विमा
न और सामग्री सहित जहाँ राजा था आया और राजा से कहा: हे राजन! तुम्हारे कारण विमान ले आया हूँ; इस पर आरूढ़ होकर तुम स्वर्ग को चलो और देवताओं के भोग भोगो ।
इतना सुन राजा ने कहा कि: हे दूत! प्रथम तुम स्वर्ग का वृत्तान्त मुझे सुनाओ कि तुम्हारे स्वर्ग में क्या-क्या दोष और गुण हैं तो उनको सुनके मैं हृदयमें विचारूँ । पीछे जो मेरी इच्छा होगी तो चलूँगा । मैंने कहा कि हे राजन्! स्वर्ग में बड़े-बड़े दिव्य भोग हैं । जीव बड़े पुण्य से स्वर्ग को पाता है । जो बड़े पुण्यवाले होते हैं वे स्वर्ग के उत्तम सुख को पाते हैं; जो मध्यम पुण्यवाले हैं वे स्वर्ग के मध्यम सुख को पाते हैं और जो कनिष्ठ पुण्यवाले हैं वे स्वर्ग के कनिष्ठ सुख को पाते हैं । जो गुण स्वर्ग में हैं वे तो तुमसे कहे, अब स्वर्ग के जो दोष हैं वे भी सुनो । हे राजन्! जो आपसे ऊँचे बैठे दृष्ट आते हैं और उत्तम सुख भोगते हैं उनको देखकर ताप की उत्पत्ति होती है क्योंकि उनकी उत्कृष्टता सही नहीं जाती । जो कोई अपने समान सुख भोगते हैं उनको देखकर क्रोध उपजता है कि ये मेरे समान क्यों बैठे है और जो आपसे नीचे बैठे हैं उनको देखकर अभिमान उपजता है कि मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ । एक और भी दोष है कि जब पुण्य क्षीण होते हैं तब जीव को उसी काल में मृत्युलोक में गिरा देते हैं, एक क्षण भी नहीं रहने देते । यही स्वर्ग में गुण और दोष हैं । हे भद्रे! जब इस प्रकार मैंने राजा से कहा तो राजा बोला कि हे देवदूत! उस स्वर्ग के योग्य हम नहीं हैं और हमको उसकी इच्छा भी नहीं है । जैसे सर्प अपनी त्वचा को पुरातन जानकर त्याग देता है वैसे ही हम उग्र तप करके यह देह त्याग देंगे । हे देवदूत! तुम अपने विमान को जहाँ से लाये हो वहीं ले जाओ, हमारा नमस्कार है ।
श्री योग वसिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
इतना सुन वाल्मीकिजी बोले हे राजन! महारामायण औषध तुमसे कहता हूँ उसको सुनके उसका तात्पर्य हृदय में धारने का यत्न करना । जब तात्पर्य हृदय में धारोगे तब जीवन्मुक्त होकर बिचरोगे । हे राजन् वह वशिष्ठजी और रामचन्द्रजी का संवाद है और उसमें, मोक्ष का उपाय कहा है । उसको सुन कर जैसे रामचन्द्रजी अपने स्वभाव में स्थित हुए और जीवन्मुक्त होकर बिच
रे हैं वैसे ही तुम भी बिचरोगे ।
राजा बोले: हे भगवान्! रामचन्द्रजी कौन थे कैसे थे और कैसे होकर बिचरे सो कृपा करके कहो?
वाल्मीकिजी बोले, हे राजन्! शाप के वश से सच्चिदानन्द विष्णुजी ने जो अद्वैत ज्ञान से सम्पन्न हैं, अज्ञान को अंगीकार करके मनुष्य का शरीर धारण किया । इतना सुन राजा ने पूछा, हे भगवान्! चिदानन्द हरि को शाप किस कारण हुआ और किसने दिया सो कहो?
अलख की ओर
गतांक से आगे.....
'अप्सरा' का अर्थ क्या है? 'अप' माने पानी और 'सरा' माने सरकनेवाला। जैसे पानी नीचे की ओर बहता है ऐसे जीवन सुख-दुःख में नीचे की ओर बहता है। सदगुरुओं का ज्ञान तुम्हें ऊपर उठाता है। परिस्थितियाँ हैं सरिता का प्रवाह जो तुम्हें नीचे की ओर घसीटती हैं, सदगुरु हैं 'पम्पिंग स्टेशन' जो तुम्हें हरदम ऊपर उठाते रहते हैं।

हम सुख-दुःखों से परास्त क्यों हो जाते हैं? स्वतंत्र ढंग से जीने
की कला हमारे पास नहीं है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास अन्न-वस्त्र नहीं है, रूपये-पैसे नहीं हैं, मकान नहीं है इसलिए दुःखी हैं। जिन महापुरुषों को खाने को रोटी नहीं, पहनने को कपड़े नहीं, रहने को घर नहीं वे भी सुखी रह सके। देखो जड़भरतजी का जीवन ! देखो शुकदेवी का जीवन ! आत्मानंद में मस्त ! अब भी, इस समय भी ऐसे महात्मा... ऐसे परम सुख के सम्राट हैं इस वसुन्धरा पर। उनके पास सुख-दुःख का उपयोग करने की, सुख-दुःख के प्रसंगो को नचाने की कला है, समझ है। चीज-वस्तुओं का बाहुल्य होते हुए भी यह समझ अगर हमारे पास नहीं है तो हम सुख-दुःख की परिस्थितियों में उलझ जाते हैं। अगर हमारे पास बढ़िया समझ है तोः

हमें हिला सके ये जमाने में दम नहीं।
हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं।।
श्री योग वसिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
एक समय भारद्वाज चित्त को एकाग्र करके मेरे पास आये और मैंने उसको उपदेश किया था । वह उसको सुनकर वचनरूपी समुद्र से साररूपी रत्न निकाल और हृदयमें धरकर एक समय सुमेरु पर्वत पर गया । वहाँ ब्रह्माजी बैठे थे, उसने उनको प्रणाम किया और उनके पास बैठकर यह कथा सुनाई । तब ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उससे कहा, हे पुत्र! कुछ वर माँग; मैं तुझ पर प्रसन

्न हुआ हूँ । भारद्वाज ने, जिसका उदार आशय था, उनसे कहा, हे भूत-भविष्य के ईश्वर! जो तुम प्रसन्न हुए हो, तो यह वर दो कि सम्पूर्ण जीव संसार-सुख से मुक्त हों और परमपद पावें और उसी का उपाय भी कहो । ब्रह्माजी ने कहा, हे पुत्र! तुम अपने गुरु वाल्मीकिजी के पास जाओ । उसने आत्मबोध महारामायण शास्त्र का जो परमपावन संसार समुद्र के तरने का पुल है, आरम्भ किया है । उसको सुनकर जीव महामोहजनक संसार समुद्र से तरेंगे । निदान परमेष्ठी ब्रह्मा जिनकी सर्वभूतों के हित में प्रीति है आप ही, भारद्वाज को साथ लेकर मेरे आश्रम में आये और मैंने भले प्रकार से उनका पूजन किया । उन्होंने मुझसे कहा, हे मुनियोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकि! यह जो तुमने रामके स्वभाव के कथन का आरम्भ किया है इस उद्यम का त्याग न करना; इसकी आदि से अन्त पर्यन्त समाप्ति करना; क्योंकि यह मोक्ष उपाय संसार रूपी समुद्र के पार करने का जहाज और इससे सब जीव कृतार्थ होंगे ।

अलख की ओर
गतांक से आगे.....
सुख और दुःख हमारे जीवन के विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। चलने के लिए दायाँ और बायाँ पैर जरूरी है, काम करने के लिए दायाँ और बायाँ हाथ जरूरी है, चबाने के लिए ऊपर का और नीचे का जबड़ा जरूरी है वैसे ही जीवन की उड़ान के लिए सुख व दुःखरूपी दो पंख जरूरी हैं। सुख-दुःख का उपयोग हम नहीं कर पाते, सुख-दुःख से प्रभावित हो जाते हैं तो जीवन पर आत्मविमुख होकर स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर से
बँधे ही रह जाते हैं। अपने मुक्त स्वभाव का पता नहीं चलता।

इसलिए रोटी की जितनी जरूरत है, कपड़ों की जितनी जरूरत है, मकान की जितनी जरूरत है उससे हजार गुनी ज्यादा जरूरत है सच्ची समझ की। सच्ची समझ के बिना हमारा जीवन सुख का और दुःखों का शिकार हुआ जा रहा है। लोग बोलते हैं-

'बापू ! बेटा नहीं है इसलिए दुःख हो रहा है। रोना आता है....!'
गुरु भक्ति योग
गतांक से आगे......
प.पू. संत श्री आसारामजी बापूः एक अदभुत विभूति
ध्यान और योग के अनुभव कैसे प्राप्त किये जाएँ? पूजा पाठ, जप-तप ध्यान करने पर भी जीवन में व्याप्त अतृप्ति का कैसे निवारण करें? ईश्वर में कैसे मन लगायें? अपने अंदर ही निहित आत्मानंद के खजाने को कैसे खोलें? व्यावहारिक जीवन में परेशान करने वाले भय, चिन्ता, निराशा, हताशा, आदि को जीवन से दूर कैसे भगायें? निश्चिंतता, निर्भयता,
निरन्तर प्रसन्नता प्राप्त करके जीवन को आनन्द से कैसे महकायें? अपने प्राचीन शास्त्रों में वर्णित आनन्द-स्वरूप ईश्वर के अस्तित्व की झाँकी हम अपने हृदय में कैसे पायें? क्या आज भी यह सब सम्भव है?
हाँ, सम्भव है, अवश्यमेव। मानव को चिंतित बनाने वाले इन प्रश्नों का समाधान साधना के निश्चित परिणामों के द्वारा कराके पिपासु साधकों के जीवन को ईश्वराभिमुख करके उन्हें मधुरता प्रदान करने वाले ऋषि-महर्षि और संत-महापुरूष आज भी समाज में मौजूद है। 'बहुरत्ना वसुन्धरा।' इन संत महापुरूषों की सुगंधित हारमाला में पूज्य संत श्री आसारामजी बापू एक पूर्ण विकसित सुमधुर पुष्प हैं।
री योग वसिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
इतना कहकर ब्रह्माजी, जैसे समुद्र से चक्र एक मुहूर्त पर्यन्त उठके फिर लीन हो जावे वैसे ही अन्तर्द्धान हो गये । तब मैंने भारद्वाज से कहा, हे पुत्र! ब्रह्माजी ने क्या कहा? भारद्वाज बोले हे भगवान्! ब्रह्माजी ने तुमसे यह कहा कि हे मुनियों में श्रेष्ठ! यह जो तुमने राम के स्वभावके कथन का उद्यम किया है उसका त्याग न करना; इसे अन्तपर्यन्त समा

प्तिकरना क्योंकि; संसारसमुद्र के पार करने को यह कथा जहाज है और इससे अनेक जीव कृतार्थ होकर संसार संकट से मुक्त होंगे । इतना कह कर फिर वाल्मीकिजी बोले हे राजन! जब इस प्रकार ब्रह्माजीने मुझसे कहा तब उनकी आज्ञानुसार मैंने ग्रन्थ बनाकर भारद्वाज को सुनाया । हे पुत्र! वशिष्ठजी के उपदेश को पाकर जिस प्रकार रामजी निश्शंक हो बिचरे हैं वैसे ही तुम भी बिचरो । तब उसने प्रश्न किया कि हे भगवान्! जिस प्रकार रामचन्द्रजी जीवन्मुक्त होकर बिचरे वह आदि से क्रम करके मुझसे कहिये? वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज! रामचन्द्र, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता,कौशल्या, सुमित्रा और दशरथ ये आठ तो जीवन्मुक्त हुए हैं और आठ मन्त्री अष्टगण वशिष्ठ और वामदेव से आदि अष्टाविंशति जीवन्मुक्त हो बिचरे हैं उनके नाम सुनो । रामजी से लेकर दशरथपर्यन्त आठ तो ये कृतार्थ होकर परम बोधवान् हुए हैं और १ कुन्तभासी, २ शतवर्धन, ३ सुखधाम, ४ विभीषण, ५ इन्द्रजीत्, ६ हनुमान ७ वशिष्ठ और ८ वामदेव ये अष्टमन्त्री निश्शंक हो चेष्टा करते भये और सदा अद्वैत-निष्ठ हुए हैं । इनको कदाचित् स्वरूप से द्वैतभाव नहीं फुरा है । ये अनामय पद की स्थिति में तृप्त रहकर केवल चिन्मात्र शुद्धपर परमपावनता को प्राप्त हुए हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणेकथारम्भवर्णनो नाम प्रथमस्सर्गः ॥१॥
शेष कल......
अलख की ओर
गतांक से आगे.....
किसी का बेटा नहीं है तो दुःख हो रहा है, किसी को पति नहीं है, पत्नी नहीं है, मकान नहीं है तो दुःख हो रहा है लेकिन जिनके आगे हजारों बेटों की, हजारों पतियों की, हजारों पत्नियों की, हजारों मकानों की, हजारों दुकानों की कोई कीमत नहीं है ऐसे परमात्मा हमारे साथ हैं, भीतर हैं फिर भी आज तक उनकी पहचान नहीं हुई इस बात का दुःख नहीं होता। आनंदस्वरूप अन्तर्यामी परमात्मा का अनुभव नहीं

होता इसके लिए रोना नहीं आता।

जो आदमी जितना सुख चाहता है, जितनी तीव्रता से चाहता है उतना दुःखी होता है। दुःख का सदुपयोग करने की कला नहीं आयी तो कमजोर होता है। फिर देवी देवताओं को मनाता है, मंदिरों में दौड़ता है, मस्जिदों में दौड़ता है, गिरजाघरों में गिड़गिड़ाता है। मंदिर मस्जिद में जाने का फल यही है कि कोई आपके दिल का मन्दिर खोल दे, आपके हृदय का द्वार खटखटा दे, आपके भीतर छुपी हुई अथाह शक्ति का दीदार आपको करा दे। फिर बारहों मेघ गर्जें, प्रलयकाल के सूर्य तपें, आपका बाल बाँका नहीं होगा। आप ऐसी चीज हैं आपको पता नहीं। पूरी सृष्टि का प्रलय हो जाय तब भी आपका कुछ नहीं बिगड़ता। सारी दुनिया के लोग आपके विरोध में खड़े हो जाएँ, सारे देवी देवता कोपायमान हो जायें फिर भी आपका कुछ नहीं बिगड़ सकता ऐसी महान् विभूति आप हैं, लेकिन...? आपको पता नहीं।
शेष कल....

Wednesday, September 26, 2012

श्री योगवसिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
हे देवि! जब इस प्रकार राजा ने मुझसे कहा तब मैं विमान और अप्सरा आदि सबको लेकर स्वर्ग को गया और सम्पूर्ण वृत्तान्त इन्द्र से कहा । इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और सुन्दर वाणी से मुझसे बोला कि: हे दूत! तुम फिर जहाँ राजा है वहाँ जाओ । वह संसार से उपराम हुआ है । उसको अब आत्मपद की इच्छा हुई है इसलिये तुम उसको अपने साथ वाल्मीकिजी के पास , जिसने आत्मतत्त्व को आत्माकार जाना है, ले जाकर मेरा यह सन्देशा देना कि हे महाऋषे! इस राजा को तत्त्वबोध का उपदेश करना क्योंकि यह बोध का अधिकारी है । इसको स्वर्ग तथा और पदार्थों भी इच्छा नहीं, इससे तुम इसको तत्त्व बोध का उपदेश करो और यह तत्त्वबोध को पाकर संसारदुःख से मुक्त हो ।
हे सुभद्रे! जब इस प्रकार देवराज ने मुझसे कहा तब मैं वहाँ से चलकर राजाके निकट आया और उससे कहा कि हे राजन्! तुम संसारसमुद्र से मोक्ष होने के निमित्त वाल्मीकिजी के पास चलो; वे तुमको उपदेश करेंगे । उसको साथ लेकर मैं वाल्मीकिजी स्थान पर आया और उस स्थान में राजा को बैठा और प्रणामकर इन्द्र का सन्देशा दिया । तब वाल्मीकिजी ने कहा: हे राजन् कुशल तो है? राजा बोले, हे भगवान्! आप परमतत्त्वज्ञ और वेदान्त जाननेवालों में श्रेष्ठ हैं, मैं आपके दर्शन करके कृतार्थ हुआ और अब मुझको कुशलता प्राप्त हुई है । मैं आपसे पूछता हूँ कृपा करके उत्तर दीजिए कि संसार बन्धन से कैसे मुक्ति हो?
शेष कल......
अपने स्वरूप का पता नहीं है, इसीलिए जीव बिचारा विषय विकारों में
भटक-भटककर अपना जीवन गँवा देता है। समझदार लोग समझते हैं कि शरीर की
नश्वरता क्या है। आग लगने पर कुआँ खोदना पड़े, उसके पहले ही कुआँ खोदकर
तैयार कर देते हैं।

बुढ़ापा आने से पूर्व ही शरीर को विषय-विकारों में न गिराकर परमात्मा के
ज्ञान में लगा देते हैं। सारी रात दूसरों की नींद खराब हो और लोग बोलने
लगें कि बुढ्ढा जल्दी मर जाये तो अच्छा, उसके पहले वह अपने अहंकार को मार
देता है, वासना को मार देता है।

चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ जायें और चेहरा भद्दा हो जाये उसके पहले वह अपना
असली चेहरा देख लेता है। बाल सफेद होने से पूर्व वह अपना हृदय स्वच्छ कर
लेता है। आँखें कमजोर हो जायें, कान बहरे हो जायें और मित्र-संबंधी सब
पराये होने लग जायें, इसके पूर्व वह परमात्मा का हो जाने की कोशिश करता
है।…….पूज्यपाद श्रीबापूजी
उठ जाओ और वैराग्य का आश्रय लो। जैसे साईकल के पहिए निकाल दो तो साईकल
चलना मुश्किल है ऐसे ही जीवन से अभ्यास और वैराग्य हटा दो तो प्रभु की
यात्रा होना मुश्किल है।

अतः तुम ध्यान का अभ्यास करो और विवेक के साथ अपने भीतर छुपे हुए वैराग्य
को जगाकर वैराग्य में ही राग रखो। वैराग्यरागरसिको भवः। संसार के राग से
बचकर प्रभु परायण हो जाओ।

भगवन कहते हैं: जैसे कोई व्यक्ति आँखों में शूल नहीं भोंकना चाहता ऐसे ही
समझदार व्यक्ति अपने आप को विषयों के शूल नहीं भोंकना चाहता। जैसे कोई भी
समझदार मनुष्य अपने भोजन में विष नहीं डालना चाहता, ऐसे ही हे उद्धव !
जिज्ञासु व्यक्ति अपने जीवन में विषयों का विष नहीं डालना
चाहता।…….पूज्यपाद श्रीबापूजी

Monday, August 27, 2012

जिनका जीवन आज भी किसी संत या महापुरुष के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सान्निध्य में है, उनके जीवन में निश्चिन्तता, निर्विकारिता, निर्भयता, प्रसन्नता, सरलता, समता व दयालुता के दैवी गुण साधारण मानवों की अपेक्षा अधिक ही होते हैं तथा देर-सवेर वे भी महान हो जाते हैं और जो लोग महापुरुषों का, धर्म का सामीप्य व मार्गदर्शन पाने से कतराते हैं, वे प्रायः अशांत, उद्विग्न व दुःखी देखे जाते हैं व भटकते रहते हैं। इनमें से कई लोग आसुरी वृत्तियों से युक्त होकर संतों के निन्दक बनकर अपना सर्वनाश कर लेते हैं।

अति नींद करने वाला, जड़, स्थूलकाय, निष्क्रिय, आलसी एवं मूर्ख मन का शिष्य गुरू संतुष्ट हों, इस प्रकार उनकी सेवा नहीं कर सकता।
जिस शिष्य में उपदेश के आचरण का गुण होता है वह अपने गुरू की सेवा में सफल होता है। आबादी एवं अमरत्व उसको आ मिलते है।
गुरू की सेवा करने की उत्कण्ठा एवं लगन शिष्य में होनी चाहिए।
गुरू के प्रति भक्तिभाव तमाम योग्य मानवमहेच्छाओं का एकमात्र ध्येय है।
शिष्य जब गुरू के पास रहकर अभ्यास करता हो तब उसके कान श्रवण के लिए तत्पर होने चाहिए। वह जब गुरू की सेवा करता हो तब उसकी दृष्टि सावधान होनी चाहिए।
शिष्य को अपने गुरू, माँ-बाप, बुजुर्ग, सब योगी एवं संतों के साथ अच्छी तरह बरताव करना चाहिए।
अच्छी तरह बरताव करना माने अपने गुरू के प्रति अच्छा आचरण करना।
गुरू शिष्य के आचरण पर से उसका स्वभाव तथा उसके मन की पद्धति जान सकते हैं।
अपने पवित्र गुरू के प्रति अच्छा आचरण परम सुख के धाम का पासपोर्ट है।
शिष्य जब गुरू की सेवा करता हो तब उसे तरंगी नहीं बनना चाहिए।
अपने गुरू की सेवा करके प्राप्त किये हुए व्यवहारू ज्ञान की अभिव्यक्ति है ‘आचरण ’।
दैवी एवं उत्तम गुण दुकान से खरीद करने की चीजें नहीं हैं। वे गुण तो लम्बे समय तक की हुई गुरू सेवा, श्रद्धा एवं भक्तिभाव द्वारा ही प्राप्त किये जा सकते हैं।

संत में एक भी सदगुण दिखे तो लाभ ले लें। उनमें दोष देखना और सुनना अपने को मुक्तिफल से वंचित करके अशांति की आग में झोंकने के बराबर है।

श्री योगवाशिष्ठ महारामायण' के निर्वाण प्रकरण के 208वें सर्ग में आता हैः "हे रामजी ! जिसकी संतों की संगति प्राप्त होती है, वह भी संत हो जाता है। संतों का संग वृथा नहीं जाता। जैसे, अग्नि से मिला पदार्थ अग्निरूप हो जाता है, वैसे ही संतों के संग से असंत भी संत हो जाता है और मूर्खों की संगति से साधु भी मूर्ख हो जाता है। जैसे, उज्जवल वस्त्र मल के संग से मलिन हो जाता है, वैसे ही मूढ़ का संग करने से साधु भी मूढ़ हो जाता है। क्योंकि पाप के वश उपद्रव भी होते हैं, इसी से दुर्जनों की संगति से साधु को भी दुर्जनता घेर लेती है। इससे हे राम! दुर्जन की संगति सर्वथा त्यागनी चाहिए और संतों की संगति कर्त्तव्य है। जो परमहंस संत मिले और जो साधु हो और जिसमें एक गुण भी शुभ हो, उसका भी अंगीकार कीजिए, परंतु साधु के दोष न विचारिये, उसके शुभ गुण ही ग्रहण कीजिये।"

द्वेष बुद्धि से तो श्रीकृष्ण, श्रीराम, संत कबीर आदि दुनिया के सभी संतों में दोष देखने को मिलेंगे। उनके यश को देखकर निंदा करने वाले भी बहुत मिलेंगे, परंतु गुणग्राहियों ने संत-महापुरुषों से लाभ उठाया है और अपना जीवन सफल किया है।

सद्गुरु को तुम खोज नहीं सकते, प्रत्युत जब तुम्हारे भीतर सत्य की सच्ची प्यास होती है, तब सद्गुरु स्वयं जी खोज लेते हैं....

Tuesday, April 17, 2012

शरीर की मौत हो जाना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन श्रद्धा की मौत हुई तो समझो सर्वनाश हुआ।
शिष्य चार प्रकार के होते हैं:
1. एक वे होते हैं जो गुरु के भावों को समझकर उसी प्रकार से सेवा, कार्य और चिंतन करने लगते हैं | 2.दूसरे वे होते हैं जो गुरु के संकेत के अनुसार कार्य करते हैं |
3.तीसरे वे होते हैं जो आज्ञा मिलने पर काम करते हैं और
4.चौथे वे होते हैं जिनको गुरु कुछ कार्य बताते हैं तो ‘हाँ जी… हाँ जी…’ करते रहते हैं किन्तु काम कुछ नहीं करते | सेवा का दिखावामात्र ही करते हैं |

गुरू की सेवा साधु जाने, गुरुसेवा का मुढ पिछानै |
खाली हाथों को भरना यहाँ आम होता है,
मैं कौन हूँ , यह जानों यही पैगाम होता है,
जीवन तो बदला है, यही आने से हमारा सबका,
कृपा आपकी होती है मुकद्दर का नाम होता है.....
बहुत से रास्ते यूँ तो दिल की तरफ जाते हैं।
राहे मोहब्बत से आओ तो फासला बहुत कम है।

जीवत्मा अगर परमात्मा से मिलने के लिए तैयार हो तो परमात्मा का मिलना भी असंभव नहीं। कुछ समय अवश्य लगेगा क्योंकि पुरानी आदतों से लड़ना पड़ता है, ऐहिक संसार के आकर्षणों से सावधानीपूर्वक बचना पड़ता है। तत्पश्चात् तो आपको रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होगी, मनोकामनाएँ पूर्ण होने लगेगी, वाकसिद्धि होगी, पूर्वाभ्यास होने लगेंगे, अप्राप्य एवं दुर्लभ वस्तुएँ प्राप्य एवं सुलभ होने लगेंगी, धन-सम्पत्ति, सम्मान आदि मिलने लगेंगे।
उपरोक्त सब सिद्धियाँ इन्द्रदेव के प्रलोभन हैं।
कभी व्यर्थ की निन्दा होने लगेगी। इससे भयभीत न हुए तो बेमाप प्रशंसा मिलेगी। उसमें भी न उलझे तब प्रियतम परमात्मा की पूर्णता का साक्षात्कार हो जाएगा।
दर्द दिल में छुपाकर मुस्कुराना सीख ले।
गम के पर्दे में खुशी के गीत गाना सीख ले।।
तू अगर चाहे तो तेरा गम खुशी हो जाएगा।
मुस्कुराकर गम के काँटों को जलाना सीख ले।।
दर्द का बार-बार चिन्तन मत करो, विक्षेप मत बढ़ाओ। विक्षेप बढ़े ऐसा न सोचो, विक्षेप मिटे ऐसा उपाय करो। विक्षेप मिटाने के लिए भगवान को प्यार करके 'हरि ॐ' तत् सत् और सब गपशप का मानसिक जप या स्मरण करो। ईश्वर को पाने के कई मार्ग हैं लेकिन जिसने ईश्वर को अथवा गुरूतत्त्व को प्रेम व समर्पण किया है, उसे बहुत कम फासला तय करना पड़ा है।

श्रद्धा की रक्षा एवं संवर्धन ....

श्रद्धा मन का विषय है और मन चंचल है । मनुष्य जब सत्त्वगुण में होता है, तब श्रद्धा पुष्ट होती है ।

सत्त्वगुण बढ़ता है सात्त्विक आहार-विहार से, सात्त्विक वातावरण में रहने से एवं सत्संग सुनने से । मनुष्य जब रजो-तमोगुणी जीवन जीता है, तो मति नीचे के केन्द्रों में, हलके केन्द्रो में पहुँच जाती है । मति जब नीचे चली जाती है, तब लगता है कि झूठ बोलने में, कपट करने में सार है, कोर्ट कचहरी जाना चाहिए… आदि-आदि ।

श्रद्धा बनी रहे उसके लिए क्या करना चाहिए ? अपनी श्रद्धा, स्वास्थ्य और सूझबूझ को बुलंद बनाये रखने एवं विकसित करने के लिए अपना आहार शुद्ध रखें । यदि असात्त्विक आहार के कारण मन में जरा भी मलिनता आती है तो श्रद्धा घटने लगती है । अत: श्रद्धा को बनाये रखने के लिए आहार शुद्धि का ध्यान रखें ।

पवित्र संग करें, सत्संग में जायें एवं पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करें ।

Sunday, April 15, 2012

जैसे भगवान निर्वासनिक हैं, निर्भय हैं, आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे तुम भी निर्वासनिक और निर्भय होकर आनन्द में रहो। यही उसकी महा पूजा है।
मन को उदास मत करो। सदैव प्रसन्नमुख रहो। हँसमुख रहो। तुम आनन्दस्वरूप हो। भय, शोक, चिन्ता आदि ने तुम्हारे लिए जन्म ही नहीं लिया है, ऐसी दृढ़ निष्ठा के साथ सदैव अपने आत्मभाव में स्थिर रहो।
शरीर की मौत हो जाना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन श्रद्धा की मौत हुई तो समझो सर्वनाश हुआ।
बिना तेरे मन में, समाये ना कोई,
लगन का ये दीपक, बुझाए ना कोई,
तूही मेरी कश्ती, तू ही किनारा,
तुम्हारा ही गुणगान, गाता रहूँ मैं,
हृदय से तुम्ही को, ध्याता रहूँ मैं,
... तुम्हारे सिवा अब, लगे कुछ ना प्यारा,
तुम्हे क्या बताऊँ की, तुम मेरे क्या हो,
मेरी जिंदगी का, तुम्ही आसरा हो,
तुम्ही ने बनाया, जीवन हमारा,

Thursday, April 12, 2012

हे मेरे प्रभु … !
तुम दया करना । मेरा मन … मेरा चित्त तुममें ही लगा रहे ।
अब … मैं कब तक संसारी बोझों को ढोता फिरुँगा … ? मेरा मन अब तुम्हारी यात्रा के लिए ऊर्ध्वगामी हो जाये … ऐसा सुअवसर प्राप्त करा दो मेरे स्वामी … !
हे मेरे अंतर्यामी ! अब मेरी ओर जरा कृपादृष्टि करो … । बरसती हुई आपकी अमृतवर्षा में मैं भी पूरा भीग जाऊँ …। मेरा मन मयूर अब एक आत्मदेव के सिवाय किसीके प्रति टहुँकार न करे ।

हे प्रभु ! हमें विकारों से, मोह ममता से, साथियों से बचाओ …अपने आपमें जगाओ ।

हे मेरे मालिक ! अब … कब तक … मैं भटकता रहूँगा ? मेरी सारी उमरिया बिती जा रही है … कुछ तो रहमत करो कि अब … आपके चरणों का अनुरागी होकर मैं आत्मानन्द के महासागर में गोता लगाऊँ ।

ॐ शांति ! ॐ आनंद !!
सोऽहम् सोऽहम् सोऽहम्

आखिर यह सब कब तक … ? मेरा जीवन परमात्मा की प्राप्ति के लिए है, यह क्यों भूल जाता हूँ ?

मुझे … अब … आपके लिए ही प्यास रहे प्रभु … !
अब प्रभु कृपा करौं एहि भाँति ।
सब तजि भजन करौं दिन राती ||

आँखों के द्वारा, कानों के द्वारा दुनियाँ भीतर घुसती है और चित्त को चंचल करती है । जप, ध्यान, स्मरण, शुभ कर्म करने से बुद्धि स्वच्छ होती है । स्वच्छ बुद्धि परमात्मा में शांत होती है और मलिन बुद्धि जगत में उलझती है । बुद्धि जितनी जितनी पवित्र होती है उतनी उतनी परम शांति से भर जाती है । बुद्धि जितनी जितनी मलिन होती है, उतनी संसार की वासनाओं में,विचारों में भटकती है ।

आज तक जो भी सुना है, देखा है, उसमें बुद्धि गई लेकिन मिला क्या? आज के बाद जो देखेंगे, सुनेंगे उसमें बुद्धि को दौड़ायेंगे लेकिन अन्त में मिलेगा क्या? श्रीकृष्ण कहते हैं :

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥

जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरुप दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जायेगा ।

यह कौन सा उकदा है जो हो नहीं सकता ।

तेरा जी न चाहे तो हो नहीं सकता ॥

छोटा सा कीड़ा पत्थर में घर करे ।

और इन्सान क्या दिले दिलबर में घर न करे ॥

देखा अपने आपको, मेरा दिल दीवाना हो गया ।
ना छेड़ो मुझे यारों ! मैं खुद पे मस्ताना हो गया ॥
देखा अपने आपको, मेरा दिल दीवाना हो गया ।
ना छेड़ो मुझे यारों ! मैं खुद पे मस्ताना हो गया ॥
दु:ख और चिन्ता, हताशा और परेशानी, असफलता और दरिद्रता भीतर की चीजें होती हैं, बाहर की नहीं । जब भीतर तुम अपने को असफल मानते हो तब बाहर तुम्हें असफलता दिखती है ।

भीतर से तुम दीन हीन मत होना । घबराहट पैदा करनेवाली परिस्थितियों के आगे भीतर से झुकना मत । ॐकार का सहारा लेना । मौत भी आ जाए तो एक बार मौत के सिर पर भी पैर रखने की ताकत पैदा करना । कब तक डरते रहोगे ? कब तक मनौतियाँ मनाते रहोगे ? कब तक नेताओं को, साहबों को, सेठों को, नौकरों को रिझाते रहोगे ? तुम अपने आपको रिझा लो एक बार । अपने आपसे दोस्ती कर लो एक बार । बाहर के दोस्त कब तक बनाओगे ?

कबीरा इह जग आय के, बहुत से कीने मीत ।
जिन दिल बाँधा एक से, वे सोये निश्चिंत ॥

बहुत सारे मित्र किये लेकिन जिसने एक से दिल बाँधा वह धन्य हो गया । अपने आपसे दिल बाँधना है । यह ‘एक’ कोई आकाश पाताल में नहीं बैठा है । कहीं टेलिफोन के खम्भे नहीं डालने हैं, वायरिंग नहीं जोड़नी है । वह ‘एक’ तो तुम्हारा अपना आपा है । वह ‘एक’ तुम्हीं हो । नाहक सिकुड़ रहे हो । ‘यह मिलेगा तो सुखी होऊँगा, वह मिलेगा तो सुखी होऊँगा …’

अरे ! सब चला जाए तो भी ठीक है, सब आ जाए तो भी ठीक है । आखिर यह संसार सपना है । गुजरने दो सपने को । हो होकर क्या होगा ? क्या नौकरी नहीं मिलेगी ? खाना नहीं मिलेगा ? कोई बात नहीं । आखिर तो मरना है इस शरीर को । ईश्वर के मार्ग पर चलते हुए बहुत बहुत तो भूख प्यास से पीड़ित हो मर जायेंगे । वैसे भी खा खाकर लोग मरते ही हैं न ! वास्तव में होता तो यह है कि प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलनेवाले भक्त की रक्षा ईश्वर स्वयं करते हैं । तुम जब निश्चिंत हो जाओगे तो तुम्हारे लिए ईश्वर चिन्तित होगा कि कहीं भूखा न रह जाए ब्रह्मवेत्ता ।

Wednesday, April 11, 2012

आदत के गुलाम ....

एक सज्जन ने पूछाः "गाँधी जी के बारे में उनके आश्रमवासी प्यारेलाल ने जो लिखा है, क्या आप उसे जानते हैं?"
दूसराः "हाँ, मैं उसे जानता हूँ।"
पहलाः "क्या यह सब सत्य होगा?"
दूसराः "हमें उस पर विचार करने की आवश्यकता ही क्या है? जिसे अभद्रता पसन्द है, चन्द्रमा में भी कलंक देखेगा। वह चन्द्र की शीतल चाँदनी का लाभ लेने के बदले दूसरी-तीसरी बातें करेगा, क्या यह ठीक माना जायेगा?
मैंने अनेक अनुभवों के बाद यह निश्चय किया है कि जिस बरसात से फसल पैदा न हो, वह बरसात नहीं झींसी है। इस संसार में ऐसे अनेक मनुष्य हैं, जो अपनी अलभ्य चैतन्य शक्ति को इधर-उधर नष्ट कर देते हैं। ऐसे लोग अमृत को भी विष बनाकर ही पेश करते हैं।"

दुष्टता की दुनिया....

मार्टिन लूथर नामक एक गुरु ने क्रिश्चियन धर्म में प्रचलित अनेक बुराइयों और मतभेदों को सुधारने के लिए झंडा उठाया तो पोप और उनके सहयोगियों ने मार्टिन को इतना हैरान करना आरंभ किया कि उनके एक शिष्य ने गुरु से कहाः "गुरुजी! अब तो हद हो गई है। अब एक शाप देकर इन सब लोगों को जला कर राख कर दीजिए।"
लूथरः "ऐसा कैसे हो सकता है?"
शिष्यः "आपकी प्रार्थना तो भगवान सुनते हैं। उन्हें प्रार्थना में कह दें कि इन सब पर बिजली गिरे।"
लूथरः "वत्स! यदि मैं भी ऐसा ही करने लगूँ तो मुझमें और उनमें क्या अन्तर रह जाएगा?"
शिष्यः "लेकिन इन लोगों का अविवेक, अन्याय और इनकी नासमझी तो देखिये! क्या बिगाड़ा है आपने इनका.....? आप जैसे सात्त्विक सज्जन और परोपकारी संत को ये नालायक, दुष्ट और पापी जन......"
शिष्य आगे कुछ और बोले उसके पहले ही लूथर बोल पड़ेः "उसे देखना हमारा काम नहीं है। हमें तो अपने ढंग से असत्य और विकृतियों को उखाड़ फेंकने का काम करना है। शेष सारा काम भगवान को स्वयं देखना है।"
शिष्य से रहा न गया तो उसने पुनः विनम्रता से कहाः "गुरुदेव! आप अपनी शक्ति आजमा कर ही उन्हें क्यों नहीं बदल देते? आप तो सर्वसमर्थ हैं।"
लूथरः "यदि राग और द्वेष, रोग और दोष अन्तःकरण से न घटे तो गुरुदेव किस प्रकार सहायक बन सकते हैं? मेरा काम है दुरित (पाप) का विसर्जन कर सत्य और शुभ का नवसर्जन करना। दूसरों को जो करना हो, करें। अपना काम तो अपने रास्ते पर दृढ़तापूर्वक चलना है।"

Shree Ashraramayan ....

गुरु चरण रज शीष धरि, हृदय रूप विचार।

श्रीआसारामायण कहौं, वेदान्त को सार।।

धर्म कामार्थ मोक्ष दे, रोग शोक संहार।

भजे जो भक्ति भाव से, शीघ्र हो बेड़ा पार।।


भारत सिंधु नदी बखानी, नवाब जिले में गाँव बेराणी।

रहता एक सेठ गुण खानि, नाम थाऊमल सिरुमलानी।।

आज्ञा में रहती मेंहगीबा, पतिपरायण नाम मंगीबा।

चैत वद छः उन्नीस अठानवे, आसुमल अवतरित आँगने।।

माँ मन में उमड़ा सुख सागर, द्वार पै आया एक सौदागर।

लाया एक अति सुन्दर झूला, देख पिता मन हर्ष से फूला।।

सभी चकित ईश्वर की माया, उचित समय पर कैसे आया।

ईश्वर की ये लीला भारी, बालक है कोई चमत्कारी।।


संत की सेवा औ' श्रुति श्रवण, मात पिता उपकारी।

धर्म पुरुष जन्मा कोई, पुण्यों का फल भारी।।



सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी।

समाज में थी मान्यता जैसी, प्रचलित एक कहावत ऐसी।।

तीन बहन के बाद जो आता, पुत्र वह त्रेखन कहलाता।

होता अशुभ अमंगलकारी, दरिदता लाता है भारी।।

विपरीत किंतु दिया दिखाई, घर में जैसे लक्ष्मी आयी।

तिरलोकी का आसन डोला, कुबेर ने भंडार ही खोला।

मान प्रतिष्ठा और बड़ाई, सबके मन सुख शांति छाई।।


तेजोमय बालक बढ़ा, आनन्द बढ़ा अपार।

शील शांति का आत्मधन, करने लगा विस्तार।।



एक दिना थाऊमल द्वारे, कुलगुरु परशुराम पधारे।

ज्यूँ ही बालक को निहारे, अनायास ही सहसा पुकारे।।

यह नहीं बालक साधारण, दैवी लक्षण तेज है कारण।

नेत्रों में है सात्विक लक्षण, इसके कार्य बड़े विलक्षण।।

यह तो महान संत बनेगा, लोगों का उद्धार करेगा।

सुनी गुरु की भविष्यवाणी, गदगद हो गये सिरुमलानी।

माता ने भी माथा चूमा, हर कोई ले करके घूमा।।


ज्ञानी वैरागी पूर्व का, तेरे घर में आय।

जन्म लिया है योगी ने, पुत्र तेरा कहलाय।।

पावन तेरा कुल हुआ, जननी कोख कृतार्थ।

नाम अमर तेरा हुआ, पूर्ण चार पुरुषार्थ।।



सैतालीस में देश विभाजन, पाक में छोड़ा भू पशु औ' धन।

भारत अमदावाद में आये, मणिनगर में शिक्षा पाये।।

बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति, आसुमल की आशु युक्ति।

तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता, त्वरित कार्य औ' सहनशीलता।।

आसुमल प्रसन्न मुख रहते, शिक्षक हँसमुखभाई कहते।

पिस्ता बादाम काजू अखरोटा, भरे जेब खाते भर पेटा।।

दे दे मक्खन मिश्री कूजा, माँ ने सिखाया ध्यान औ' पूजा।

ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे, रहे न मछली जल बिन जैसे।।

हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे, वही है विद्या या विमुक्तये।

बहुत रात तक पैर दबाते, भरे कंठ पितु आशीष पाते।।


पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम।

लोगों के तुम से सदा, पूरण होंगे काम।।



सिर से हटी पिता की छाया, तब माया ने जाल फैलाया।

बड़े भाई का हुआ दुःशासन, व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन।।

छूटा वैभव स्कूली शिक्षा, शुरु हो गयी अग्नि परीक्षा।

गये सिद्धपुर नौकरी करने, कृष्ण के आगे बहाये झरने।।

सेवक सखा भाव से भीजे, गोविन्द माधव तब रीझे।

एक दिन एक माई आई, बोली हे भगवन सुखदाई।।

पड़े पुत्र दुःख मुझे झेलने, खून केस दो बेटे जेल में।

बोले आसु सुख पावेंगे, निर्दोष छूट जल्दी आवेंगे।

बेटे घर आये माँ भागी, आसुमल के पाँवों लागी।।


आसुमल का पुष्ट हुआ, अलौकिक प्रभाव।

वाकसिद्धि की शक्ति का, हो गया प्रादुर्भाव।।


बरस सिद्धपुर तीन बिताये, लौट अमदावाद में आये।

करने लगी लक्ष्मी नर्तन, किया भाई का दिल परिवर्तन।।

दरिद्रता को दूर कर दिया, घर वैभव भरपूर कर दिया।

सिनेमा उन्हें कभी न भाये, बलात् ले गये रोते आये।।

जिस माँ ने था ध्यान सिखाया, उसको ही अब रोना आया।

माँ करना चाहती थी शादी, आसुमल का मन वैरागी।।

फिर भी सबने शक्ति लगाई, जबरन कर दी उनकी सगाई।

शादी को जब हुआ उनका मन, आसुमल कर गये पलायन।।


पंडित कहा गुरु समर्थ को, रामदास सावधान।

शादी फेरे फिरते हुए, भागे छुड़ाकर जान।।



करत खोज में निकल गया दम, मिले भरूच में अशोक आश्रम।

कठिनाई से मिला रास्ता, प्रतिष्ठा का दिया वास्ता।।

घर में लाये आजमाये गुर, बारात ले पहुँचे आदिपुर।

विवाह हुआ पर मन दृढ़ाया, भगत ने पत्नी को समझाया।।

अपना व्यवहार होगा ऐसे, जल में कमल रहता है जैसे।

सांसारिक व्यौहार तब होगा, जब मुझे साक्षात्कार होगा।

साथ रहे ज्यूँ आत्माकाया, साथ रहे वैरागी माया।।


अनश्वर हूँ मैं जानता, सत चित हूँ आनन्द।

स्थिति में जीने लगूँ, होवे परमानन्द।।


मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु, संस्कृत भाषा है एक सेतु।

संस्कृत की शिक्षा पाई, गति और साधना बढ़ाई।।

एक श्लोक हृदय में पैठा, वैराग्य सोया उठ बैठा।

आशा छोड़ नैराश्यवलंबित, उसकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित।।

लक्ष्मी देवी को समझाया, ईश प्राप्ति ध्येय बताया।

छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा, लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा।।

केदारनाथ के दर्शन पाये, लक्षाधिपति आशिष पाये।

पुनि पूजा पुनः संकल्पाये, ईश प्राप्ति आशिष पाये।।

आये कृष्ण लीलास्थली में, वृन्दावन की कुंज गलिन में।

कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला, वे जा पहुँचे नैनिताला।।

वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित, स्वामी लीलाशाह प्रतिष्ठित।

भीतर तरल थे बाहर कठोरा, निर्विकल्प ज्यूँ कागज कोरा।

पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी, ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी।।


ईशकृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान।

ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान।।



जानने को साधक की कोटि, सत्तर दिन तक हुई कसौटी।

कंचन को अग्नि में तपाया, गुरु ने आसुमल बुलवाया।।

कहा गृहस्थ हो कर्म करना, ध्यान भजन घर ही करना।

आज्ञा मानी घर पर आये, पक्ष में मोटी कोरल धाये।।

नर्मदा तट पर ध्यान लगाये, लालजी महाराज आकर्षाये।

सप्रेम शीलस्वामी पहँ धाये, दत्तकुटीर में साग्रह लाये।।

उमड़ा प्रभु प्रेम का चसका, अनुष्ठान चालीस दिवस का।

मरे छः शत्रु स्थिति पाई, ब्रह्मनिष्ठता सहज समाई।।

शुभाशुभ सम रोना गाना, ग्रीष्म ठंड मान औ' अपमाना।

तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास, महल औ' कुटिया आसनिरास।

भक्तियोग ज्ञान अभ्यासी, हुए समान मगहर औ' कासी।।


भव ही कारण ईश है, न स्वर्ण काठ पाषान।

सत चित्त आनंदस्वरूप है, व्यापक है भगवान।।

ब्रह्मेशान जनार्दन, सारद सेस गणेश।

निराकार साकार है, है सर्वत्र भवेश।।


हुए आसुमल ब्रह्माभ्यासी, जन्म अनेकों लागे बासी।

दूर हो गई आधि व्याधि, सिद्ध हो गई सहज समाधि।।

इक रात नदी तट मन आकर्षा, आई जोर से आँधी वर्षा।

बंद मकान बरामदा खाली, बैठे वहीं समाधि लगा ली।।

देखा किसी ने सोचा डाकू, लाये लाठी भाला चाकू।

दौड़े चीखे शोर मच गया, टूटी समाधि ध्यान खिंच गया।।

साधक उठा थे बिखरे केशा, राग द्वेष ना किंचित् लेशा।

सरल लोगों ने साधु माना, हत्यारों ने काल ही जाना।।

भैरव देख दुष्ट घबराये, पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाये।

कामीजनों ने आशिक माना, साधुजन कीन्हें परनामा।।


एक दृष्टि देखे सभी, चले शांत गम्भीर।

सशस्त्रों की भीड़ को, सहज गये वे चीर।।



माता आई धर्म की सेवी, साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी।

दोनों फूट-फूट के रोई, रुदन देख करुणा भी रोई।।

संत लालजी हृदय पसीजा, हर दर्शक आँसू में भीजा।

कहा सभी ने आप जाइयो, आसुमल बोले कि भाइयों।।

चालीस दिवस हुआ न पूरा, अनुष्ठान है मेरा अधूरा।

आसुमल ने छोड़ी तितिक्षा, माँ पत्नी ने की परतीक्षा।।

जिस दिन गाँव से हुई विदाई, जार जार रोय लोग-लुगाई।

अमदावाद को हुए रवाना, मियाँगाँव से किया पयाना।।

मुंबई गये गुरु की चाह, मिले वहीं पै लीलाशाह।

परम पिता ने पुत्र को देखा, सूर्य ने घटजल में पेखा।।

घटक तोड़ जल जल में मिलाया, जल प्रकाश आकाश में छाया।

निज स्वरूप का ज्ञान दृढ़ाया, ढाई दिवस होश न आया।।


आसोज सुद दो दिवस, संवत् बीस इक्कीस।

मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस।।

देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ निस्सार।

हुआ आत्मा से तभी, अपना साक्षात्कार।।



परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया, जीव गया और शिव को पाया।

जान लिया हूँ शांत निरंजन, लागू मुझे न कोई बन्धन।।

यह जगत सारा है नश्वर, मैं ही शाश्वत एक अनश्वर।

दीद हैं दो पर दृष्टि एक है, लघु गुरु में वही एक है।।

सर्वत्र एक किसे बतलाये, सर्वव्याप्त कहाँ आये जाये।

अनन्त शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी।।

सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा, चले उसकी इच्छानुसारा।

यदि वह संकल्प चलाये, मुर्दा भी जीवित हो जाये।।


ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे ना शेष।

मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।


पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।

आसुमल से हो गये, साँई आसाराम।।



जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते, ब्रह्मानन्द का आनन्द लेते।

खाते पीते मौन या कहते, ब्रह्मानन्द मस्ती में रहते।।

रहो गृहस्थ गुरु का आदेश, गृहस्थ साधु करो उपदेश।

किये गुरु ने वारे न्यारे, गुजरात डीसा गाँव पधारे।

मृत गाय दिया जीवन दाना, तब से लोगों ने पहचाना।।

द्वार पै कहते नारायण हरि, लेने जाते कभी मधुकरी।

तब से वे सत्संग सुनाते, सभी आर्ती शांति पाते।।

जो आया उद्धार कर दिया, भक्त का बेड़ा पार कर दिया।

कितने मरणासन्न जिलाये, व्यसन मांस और मद्य छुड़ाये।।


एक दिन मन उकता गया, किया डीसा से कूच।

आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक।।


वे नारेश्वर धाम पधारे, जा पहुँचे नर्मदा किनारे।

मीलों पीछे छोड़ा मन्दर, गये घोर जंगल के अन्दर।।

घने वृक्ष तले पत्थर पर, बैठे ध्यान निरंजन का घर।

रात गयी प्रभात हो आई, बाल रवि ने सूरत दिखाई।।

प्रातः पक्षी कोयल कूकन्ता, छूटा ध्यान उठे तब संता।

प्रातर्विधि निवृत्त हो आये, तब आभास क्षुधा का पाये।।

सोचा मैं न कहीं जाऊँगा, यहीं बैठकर अब खाऊँगा।

जिसको गरज होगी आयेगा, सृष्टिकर्त्ता खुद लायेगा।।

ज्यूँ ही मन विचार वे लाये, त्यूँ ही दो किसान वहाँ आये।

दोनों सिर बाँधे साफा, खाद्यपेय लिये दोनों हाथा।।

बोले जीवन सफल है आज, अर्घ्य स्वीकारो महाराज।

बोले संत और पै जाओ, जो है तुम्हारा उसे खिलाओ।।

बोले किसान आपको देखा, स्वप्न में मार्ग रात को देखा।

हमारा न कोई संत है दूजा, आओ गाँव करें तुमरी पूजा।।

आसाराम तब में धारे, निराकार आधार हमारे।

पिया दूध थोड़ा फल खाया, नदी किनारे जोगी धाया।।


गाँधीनगर गुजरात में, है मोटेरा ग्राम।

ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का, यहीं है पावन धाम।।

आत्मानंद में मस्त हैं, करें वेदान्ती खेल।

भक्तियोग और ज्ञान का, सदगुरु करते मेल।।

साधिकाओं का अलग, आश्रम नारी उत्थान।

नारी शक्ति जागृत सदा, जिसका नहीं बयान।।



बालक वृद्ध और नरनारी, सभी प्रेरणा पायें भारी।

एक बार जो दर्शन पाये, शांति का अनुभव हो जाये।।

नित्य विविध प्रयोग करायें, नादानुसन्धान बतायें।

नाभ से वे ओम कहलायें, हृदय से वे राम कहलायें।।

सामान्य ध्यान जो लगायें, उन्हें वे गहरे में ले जायें।

सबको निर्भय योग सिखायें, सबका आत्मोत्थान करायें।।

हजारों के रोग मिटाये, और लाखों के शोक छुड़ाये।

अमृतमय प्रसाद जब देते, भक्त का रोग शोक हर लेते।।

जिसने नाम का दान लिया है, गुरु अमृत का पान किया है।

उनका योग क्षेम वे रखते, वे न तीन तापों से तपते।।

धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते, आपद रोगों से बच जाते।

सभी शिष्य रक्षा पाते हैं, सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं।।

सचमुच गुरु हैं दीनदयाल, सहज ही कर देते हैं निहाल।

वे चाहते सब झोली भर लें, निज आत्मा का दर्शन कर लें।।

एक सौ आठ जो पाठ करेंगे, उनके सारे काज सरेंगे।

गंगाराम शील है दासा, होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा।।


वराभयदाता सदगुरु, परम हि भक्त कृपाल।

निश्छल प्रेम से जो भजे, साँई करे निहाल।।

मन में नाम तेरा रहे, मुख पे रहे सुगीत।

हमको इतना दीजिए, रहे चरण में प्रीत।।

Thursday, April 5, 2012

चित्त का निर्माण होता है आत्मविचार से। ध्यान करें और शून्यमनस्क नहीं लेकिन अनात्मप्रवाह का तिरस्कार करें और आत्मप्रवाह को चलायें। आत्मभाव को चलायें और देहभाव को हटायें।

ब्रह्मभाव को जगाना और देहभाव को अलविदा देना, यह है चित्त के निर्माण की पद्धति। इस प्रकार ध्यान होगा तो मस्त हो जायेंगे। ध्यान के वक्त भी मस्त और ध्यान के बाद भी मस्त।

इस प्रकार चित्त का निर्माण हो जायगा तो जो संसार बूँद होकर भी दरिया बनकर डूबता था वह अब दरिया होकर आयेगा तो भी बून्द होकर भासेगा। जरा-जरा बात से सुख-दुःखादि द्वन्द्व परेशान कर रहे थे वे अब प्रभाव नहीं डालेंगे। जितने प्रमाण में चित्त का निर्माण होता जायेगा उतने प्रमाण में द्वन्द्वैर्विमुक्ताः होते जायेंगे।..... पूज्यपाद श्रीबापूजी
महापुरूषों का अनुभव है कि वे कभी मरते नहीं। वे कभी बिगड़ते नहीं, कभी बनते नहीं। वास्तव में जीवमात्र का जो असली स्वरूप है वह बनने बिगड़ने से बहुत ऊँचा है।

बनता बिगड़ता तुम्हारा शरीर है, बनता बिगड़ता तुम्हारा मन है, बनता बिगड़ता तुम्हारा भाव है लेकिन तुम्हारा स्वरूप, तुम्हारा आत्मा कभी बनता बिगड़ता नहीं।..... पूज्यपाद श्रीबापूजी
सुख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा तो दुःख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा। पर्दे को क्या? कई फिल्में और उनके दृश्य आये और चले गये, पर्दा अपनी महिमा में स्थित है। तुम तो छाती ठोककर कहोः ‘अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दुःख जिसे आना हो आये और जाय। मुझे क्या...?’ किसी भी दृश्य को सच्चा मत मानो। तुम दृष्टा बनकर देखते रहो, अपनी महिमा में मस्त रहो।
‘मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे है’ ये स्वमानतीकता है; अभिमान नही…नम्रता आती है..सहजता आती है..जन-बल, बुध्दी-बल, शरीर-बल, द्रव्य-बल ये सच्चा नही है; लेकिन भगवत प्रेम-बल मंगलमय बल है – सच्चा बल है..उस के आगे ’सर्प विषैले बाबा तेरे वश में’ हो जाते है…ये सर्व – सर्वसुमंगल की पहेचान है…ऐसे सर्वमंगल से प्रेम, सेवा, स्नेह, समर्पण सहेज में हो जाता है…

Tuesday, April 3, 2012

हम शांत सुखस्वरूप आत्मा हैं। तूफान से सरोवर में लहरें उठ रही थीं। तूफान शान्त हो गया। सरोवर निस्तरंग हो गया। अब जल अपने स्वभाव में शान्त स्थित है। इसी प्रकार अहंकार और इच्छाओं का तूफान शान्त हो गया। मेरा चित्तरूपी सरोवर अहंकार और इच्छाओं से रहित शान्त हो गया। अब हम बिल्कुल निःस्पंद अपनी महिमा में मस्त हैं।

मन की मनसा मिट गई भरम गया सब दूर।

गगन मण्डल में घर किया काल रहा सिर कूट।।

इच्छा मात्र, चाहे वह राजसिक हो या सात्त्विक हो, हमको अपने स्वरूप से दूर ले जाती है। ज्ञानवान इच्छारहित पद में स्थित होते हैं। चिन्ताओं और कामनाओं के शान्त होने पर ही स्वतंत्र वायुमण्डल का जन्म होता है।

हम वासी उस देश के जहाँ पार ब्रह्म का खेल।

दीया जले अगम का बिन बाती बिन तेल।।

आनन्द का सागर मेरे पास था मुझे पता न था। अनन्त प्रेम का दरिया मेरे भीतर लहरा रहा था और मैं भटक रहा था संसार के तुच्छ सुखों में।

ऐ दुनियाँदारों ! ऐ बोतल की शराब के प्यारों ! बोतल की शराब तुम्हें मुबारक है। हमने तो अब फकीरों की प्यालियाँ पी ली हैं..... हमने अब रामनाम की शराब पी ली है।
उस नजर की तरफ मत देखो जो आप को देखने से इंकार करती है ,
दुनिया की भीड़ में उस नज़र को देखीये जो सिर्फ आप का इंतजार करती है ,
वो नजर है इश्वर और गुरु की .
सुख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा तो दुःख का दृश्य भी आयेगा और जायेगा। पर्दे को क्या? कई फिल्में और उनके दृश्य आये और चले गये, पर्दा अपनी महिमा में स्थित है। तुम तो छाती ठोककर कहोः ‘अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दुःख जिसे आना हो आये और जाय। मुझे क्या...?’ किसी भी दृश्य को सच्चा मत मानो। तुम दृष्टा बनकर देखते रहो, अपनी महिमा में मस्त रहो।
इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही इस प्रकृति में स्थित मन और पाँचो इन्द्रियों को आकर्षित करता है । वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इस मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है । (८)

बापूजी, मैं आपसे प्रार्थना करना चाहती हूँ ,आपसे बातें करना चाहती हूँ ,पर जब साधन -भजन के लिए बैठती हूँ तो मन शांत हो जाता है . न प्रार्थना कर पाती हूँ ,न बातें कर पाती हूँ . न हीं मेरे मन में कोई भाव उठता है . गुरुदेव मै क्या करू ?

**तुम करने के झंझट से पार हो जाओ । जो प्रभु तेरी मर्ज़ी । बातें करके भी क्या करोगी ? तो बातें कर -कराके अगर अच्छी बातें होंगी तो मैं बोलूँगा ,भगवान में शांत हो जाओ । संकल्प रहित हो जाओ । वो तो आ गई तो , फिर बातें करने की झंझट को क्यों बुलाती हो ? तुम मेरे से बैठ कर मानसिक बातें करोगी तो मैं इतना खुश नहीं होऊंगा जितना तुम भगवान में शांत हो जाओगी तो मैं खुश होऊंगा । शराबी दूसरे को शराबी देख कर खुश हो जाता है । ऐसे ही तुम भगवान में स्थित होने लगोगी तो मुझे अधिक प्रसन्नता होगी ।
न मुझसे बाहर से मिलने की कोशिश करो ना मेरे से बातें करने की कोशिश करो । जो हो रहा है उसी में आगे बढ़ो , "ईश्वर की ओर" पुस्तक पढ़ते -पढ़ते "नारायण स्तुति " पुस्तक पढ़ते -पढ़ते भगवान के स्वभाव में डूबते जाओ ।

आप कहाँ जा रहे हैं ?


राजा को महल में सपना आया कि एक काली छाया आयी है और उसकी

कहती है हे राजा कल शाम को सूरज ढलने से पहले-पहले ठीक जगह पर

पहुँच जाना । क्यों ? बोले मै मृत्यु हूँ तेरा अंत काल आ गया है भूलना

नहीं ठीक समय पर सूर्यास्त के पहले ठीक जगह पर आ जाना मैं तुझे

लेने ऑंऊगी घबराकर राजा उठ गया सोचने लगा कि ठीक समय पर ठीक

जगह पर सूर्यास्त के पहले-पहले पहुँच जाना लेकिन जगह तो बताई

नहीं अब जगह बताती मृत्यु तो क्या पहुँच जाता वो कहीं और भाग

जाता सुबह उठकर पंडितों से पूछा क्या करूँ मुझे मृत्यु से डर लगता है

मैं मरना नहीं चाहता पंडितों ने सलाह दी आप घोड़े पर बैठकर भाग

जाओं महल में सपना आया तो हो सकता है कि मौत महल के आसपास

चक्कर काट रही हो और शाम को आपको ले जाय भागो.. भागा .. घोड़ें

को खूब भगाया दौड़ाते-दौड़ाते शाम तक दौड़ाता रहा कितना दूर निकल

गया होगा सुबह से शाम तक घोड़े को दौड़ाते हुए सूर्य अस्त होने का था

तो एक जगह घोड़े का रोका, उतरा घोड़े पर से घोड़े की पीठ सहलाई

बोला शाबास! मेरे प्यारे तू मुझे कितना दूर ले आया धन्यवाद है तेरे को

धन्य है धन्य है शाबास इतने में किसी ने राजा के कंधे पर हाथ रखा

तुमको धन्यवाद है कि तुम ठीक समय पर आ गये तुम्हारे घोड़े को भी

धन्यवाद है कि तुमको ठीक समय पर ले आया और ठीक जगह पर ले

आया बोले कौन ? बोले मैं वही जिसने तुमको सपना दिया था कमबख्त

तुम यहाँ भागकर आये आज पूरा दिन था तुम्हारे पास तुम सद्गुरु की

शरण में भी जा सकते थे उनसे ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुन सकते थे

उनके मुख से भगवान के नाम की दीक्षा लेकर अपना अंतकाल सुधार

सकते थे गीता में लिखा है कि अंतकाले च मामेवं

ये भी कर सकते थे परन्तु जिस दूर भागना चाहते थे अनजाने

में उसी के पास आ गये मौत से दूर भागना चाहता था और अनजाने में

उसी के पास आगया सारी दुनिया में ये हो रहा है सबकी यही कहानी है

जिस दुःख से दूर भागना चाहते है सद्गुरु और भक्ति के अभाव में उसी

दुःख के पास पहुँच जाते है जिन मुसीबते से दूर भागना चाहते है अनजाने

में उसी के पास आ जाते हैं ।
1. यदि तुम अपनी इच्छासे नहीं, भगवानकी इच्छासे ही चल रहे हो तो सैकड़ों जन्म-मृत्युओंमें जाना भी तुम्हारे लिये सौभाग्य और परमानन्द है।

2. चारो ओर प्रलोभन है और उनके बीचमें यह नन्हा-सा जीवन। एक-एकको केवल देखने लगो तो लाखों जन्मोंकी आवश्यकता होगी। तुम तो केवल एकको देखो- जो तुम्हारे हृदयमें बैठकर तुम्हें कुछ देखने-सुनने, हिलने-डोलनेकी शक्ति देता है। उस उद्गमके प्राप्त होते ही तुम परमानन्दकी लीला भूमि हो जाओगे।

3. कर्मका चक्र अनिवार्य है। इसमें इच्छा करनेवाले ही मारे जाते है। परंतु यदि समता और अनासक्तिका आश्रय लेकर तुम झूलेमें बैठ जाओ तो देखोगे कि झुलानेवाला भी तुम्हारे साथ है और तुम इस झूलन-लीलाके आनन्दमें मस्त हो।

Thursday, March 29, 2012

संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ ।

कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ ॥


मरो मरो सब कोई कहे मरना न जाने कोय ।

एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होय ॥

तुझ में ओम...मुझ में ओम...सब में ओम समाया....

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...2


एक बाग के पुष्प है सारे...एक माला के मोती...

एक दिए के बाती है सब... एक हम सब की ज्योति...

ना जाने किस कारीगर ने एक माटी का बनाया...

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...2


एक बाप के बेटें है सब... एक हमारी माता...

दाना पानी देने वाला...एक हमारा दाता...

ना जाने किस मूरख ने लड़ना हमे सिखाया...

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...2


ऊंच -नीच और जाति -पाति की... दीवारों को तोडों...

बदला ज़माना तुम भी बदलो,बुरी आद्तें छोड़ों,प्रभु से नाता जोड़ों

जागो और जगाओ सब को...समय है ऐसा आया...

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...2



तुझ में ओम...मुझ में ओम...सब में ओम समाया....

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...
कह रहा है आसमाँ यह समाँ कुछ भी नहीं ।
रोती है शबनम कि नैरंगे जहाँ कुछ भी नहीं ॥
जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानूस ।
झाड़ उनकी कब्र पर है और निशाँ कुछ भी नहीं ॥
जिनकी नौबत से सदा गूँजते थे आसमाँ ।
दम बखुद है कब्र में अब हूँ न हाँ कुछ भी नहीं ॥
तख्तवालों का पता देते हैं तख्ते गौर के ।
खोज मिलता तक नहीं वादे अजां कुछ भी नहीं ॥
humse prabhuji dur nahi hai na unse hum dur hai,
jaisa chahe vaisa rakhe , humko to manjur hai,
usne humko janam diya hai, humko vohi palega
har halat me humko to vo hi aake sambhalega,
uski hi hai sari shristi, sabme uska noor hai,
humse prabhuji dur nahi hai, na unse hum dur hai,
ek bharosa uspe karke usko hi man le,
mithya hai ye sansar sara, man me ye jan le,
uski pooja , uski bhakti karni hame jaroor hai,
humse prabhuji dur nahi hai, na unse hum dur hai,
kisme hai kalyan hamara, ye to vahi jaane re,
dhoop chav dukh dard hamare sab vahi pehchane re
daya dristi is param pita ki hum sabpar bharpur hai
humse prabhuji dur nahi hai, na unse hum dur hai,
jo bhi de parsad samajhke prem se hume pana hai,
bangla de ya devi jhopadi rehkar hame nibhana hai,
deta sabka yatha yoga yah uska dastur hai,
jaisa chahe vaisa rakhe , humko to manjur hai,
janam liya to marna hoga, jivan ki hai sacchai,
kal chakra kaise mare, jan saka na koi bhai,
katputli ke khel me dekho hum sab majboor hai,
humse prabhuji dur nahi hai, na hum unse dur hai.
साधकः गुरू बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती है ऐसा सुना जाता है। भगवान तो सबके हैं और जो भी भगवान को पाना चाहे उसे भगवान मिल जाना चाहिए। फिर गुरू क्यों जरूरी हैं ?

पू. बापूः बात तो ठीक है लेकिन..... जैसे आटा पड़ा हो तो भी हर कोई रोटी नहीं बना सकता क्योंकि रोटी बनाने के लिए आटा गूंथने तथा रोटी बेलने, सेंकने की कला आनी चाहिये। यह कला भी किसी गुरू (माता, बहन या भाभी) से सीखी जाती है तो भगवान को प...ाने की कला सिखाने के लिये भी तो कोई गुरू चाहिए।

सहजो कारज संसार को गुरू बिन होत नाहीं।

हरि तो गुरू बिन क्या मिले सोच ले मन माहीं।।

सूर्य तो दिखता है लेकिन 'यह सूर्य है' ऐसा ज्ञान कराने वाला कोई था तभी आप सूर्य को सूर्य के रूप में पहचानते हैं। किसी ने बतलाया होगा तभी तो आपने जाना होगा कि 'यह चन्द्रमा है, ये तारे हैं।'

मनुष्य जीवन में जानने की क्षमता छुपी है इसीलिए बच्चों की जैसे-जैसे समझ निखरती है तो पूछता है कि 'यह क्या है.... वह क्या है....?' माता-पिता बतलाते हैं कि 'यह अमुक वस्तु है.... यह चिड़िया है..... यह कौआ है।' जब तक हमें चिड़िया-कौए का ज्ञान नहीं था, तब तक हम चिड़िया को चिड़िया कौए को कौआ नहीं बोल सकते थे। यह ज्ञान भी तो किसी ने दिया ही है ना !

ऐसे ही परमात्मा हमारे साथ है लेकिन अव्यक्त है। वह इन्द्रियों का, आँखों का विषय नहीं है। उपनिषद कहती हैः

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।

यह वाणी का विषय नहीं है। चिड़िया को आप वाणी से बता सकते हो या आँखों से दिखा सकते हो लेकिन भगवान को आप बतला या दिखला नहीं सकते कि 'यह रहा भगवान....।'

जैसे दूध में घी छुपा है ऐसे ही सारे ब्रह्मांड में सच्चिदानंद परमात्मा छुपा है। दूध में घी क्यों नहीं दिखता ? दूध को पहले गर्म करो, दही जमाओ, फिर बिलोओ, मक्खन निकालो और उसे गरम करो तब घी का साक्षात्कार होता है। ऐसे ही इस नश्वर देह एवं बदलने वाले संसार में भी अबदल और शाश्वत तत्त्व छुपा है। थोड़ा व्रत-नियम का तप करो, फिर थोड़ा जमाओ अर्थात् ध्यान करो और विचार करो कि 'ध्यान करने वाला कौन है ? जिसका ध्यान करते हो उस परमेश्वर का स्वरूप क्या है ?' तत्पश्चात् ज्ञानाग्नि से अपनी वासनाओं तथा कर्मों को जलाकर उस मक्खन में से घी निकालो।

ध्यान की एकाग्रता और संयम का जो दही जमाया और मक्खन निकला, उसे घी बनाने के लिए बाकी की विधि करो तो घी प्रकट हो जाता है। ईश्वर को कोई क्यों नहीं पा सकता है ? जैसे दूध में से घी बिना ज्ञान के नहीं बना सकते, कोई न कोई ज्ञान बताने वाला चाहिए। थोड़ी सी रसोई बनाने की कला बताने वाला कोई अनुभवी गुरू (माता आदि) चाहिए तो फिर परमात्मा का, जीवनदाता का ज्ञान बिना गुरू के कैसे संभव हो सकता है.....?
पूज्य बापूजी के सत्संग से
' श्री योगवशिष्ठ महारामायण ' के ' उपशम प्रकरण ' के आठवें सर्ग में यह कथा आती है :
एक बार राजा जनक अपने मंत्री-टहलुओं के साथ अरण्य-विहार करने के लिए निकले | विहार करते-करते वे मंत्री-टहलुओं को दूर छोड़कर एक विशाल वृक्ष के नीचे जा बैठे |
दैवयोग से कहो या राजा के पुण्यपुंज के प्रभाव से कहो , उनको सिद्धों की गीता (ज्ञानचर्चा ) सुनने का अवसर मिला | वहां अदृष्ट सिद्ध विचर रहे थे | जैसे हम लोगों का शरीर दीखता है वैसे उनका स्थूल शरीर नहीं दीखता | वे सिद्ध आपस में चर्चा कर रहे थे |
मनुष्य का मन जहाँ रमण करता है उसी विषय की चर्चा उसे सुहावनी लगती है | मनुष्य का मन जाग्रत में कहाँ रमण करता है वह जाननी हो तो देखो कि उसे स्वप्न किस प्रकार के आते हैं ? जाग्रत में गहराई में मन जहाँ विचरण करता है , स्वप्न प्रायः उसी प्रकार के आते हैं , स्वाभाविक बातचीत में भी वह बात प्रायः आ ही जाती है | किसी इष्ट में , भगवान में , गुरु में , साधन में मन रमा है तो बात करते-करते उनकी बात निकल ही आती है | साधक को ध्यान देना चाहिए कि वार्तालाप ऐसा हो जो उसके साधन के रास्ते में मददरूप हो जाय |
चर्चा करते हुए प्रथम सिद्ध ने कहा : " यह द्रष्टा जो पुरुष है और दृश्य जो जगत है उस द्रष्टा तथा दृश्य के मिलाप में जो बुद्धि में निश्चित आनंद होता है और इष्ट के संयोग एवं अनिष्ट के वियोग का जो आनंद जो चित्त में दृढ़ होता है - वह आनंद आत्मतत्व से उदय होता है | "
दुसरे सिद्ध ने कहा : " द्रष्टा, दर्शन और दृश्य का वासनासाहित त्याग करो | जो दर्शन से प्रथम प्रकाशरूप है और जिसके प्रकाश से ये तीनों प्रकाशते हैं, उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
तीसरे सिद्ध ने कहा : " जो निराभास और निर्मल है , जिसमे मन का अभाव है अर्थात अद्वैतरूप है , उसकी हम उपासना करते हैं | "
चौथे सिद्ध ने कहा : " जो द्रष्टा व दृश्य इन दोनों के मध्य में है और अस्ति अथवा नास्ति - दोनों पक्षों से रहित प्रकाशरूप सत्ता है और सूर्य आदि को भी प्रकाशता है , उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
पांचवे सिद्ध ने कहा : " जो इश्वर सकार और हकार है अर्थात सकार जिसके आदि में है और हकार जिसके अंत में है , वह अंत से रहित , आनंदस्वरूप , अनंत , शिवस्वरूप , परमात्मा सर्व जीवों के ह्रदय में स्थित है और जिसकी सत्ता से व्यक्ति का अहं ' मैं ' रूप से उच्चारित होता है, उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
छठे सिद्ध ने कहा : " ह्रदय में स्थित इश्वर को त्यागकर जो और देव को पाने का यत्न करते हैं , वे पुरुष कौस्तुभमणि को त्यागकर अन्य रत्नों कि वांछा करते हैं | "
सातवें सिद्ध ने कहा : " जो सब आशाओं को त्यागता है उसको उत्तम फल प्राप्त होता है | जब आशारूपी विष की बेल मूलसाहित नष्ट हो जाती है , तब जन्म-मरण आदि दुःख नष्ट हो जाते हैं और फिर नहीं उपजते | जो पदार्थों को अत्यंत विरसरूप जानता है और फिर उनमें आशा बांधता है, वह दुर्बुद्धि गर्दभ है , मनुष्य नहीं | जिन-जिन विषयों की और दृष्टी उठती है उनको विवेक से नष्ट करो , जैसे इन्द्र ने वज्र से पर्वतों को नष्ट किया था | जब इस प्रकार शुद्ध आचरण करोगे तब समभाव को प्राप्त होओगे और उससे मन का उपशम होकर तुम अक्षय , अविनाशी आत्मपद को पाओगे | "
सिद्धों के वचन सुनकर राजा जनक का विवेक जगा | वे अपने महल में आकर झरोखे में से संसार की चंचल गति देखकर विलाप करने लगे और अपने मन को समझाने लगे :
' हे मेरे मन ! तू भी उस परमेश्वर- स्वभाव में आ जा | बाहर कब तक भटकेगा ? आँख, कान, नाक, त्वचा , आदि इन्द्रियों से मिलकर तू कब तक सुख के लिए पागलों की नाई भटकता रहेगा ? ऐसा करते-करते तो कई युग बीत गये, मेरे मन ! अब तो तू अपने आत्मसुख में आ जा | '
कभी राजा जनक का मन शांत होता, कभी इधर-उधर भागता | वे अपने मन को फिर से समझाते : ' हे मेरे मन ! अच्छा जा , तुझे जहाँ भी जाना है , तू जा | अब मेरा तेरे साथ कोई लेना-देना नहीं है | मैं तेरी दौड़ को देखनेवाला तुझसे न्यारा हूँ |'
इस प्रकार का चिंतन करते-करते जनक शांत हो गये | अब न इष्ट की प्राप्ति में उनको हर्ष रहा और न ही अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष , वरन वे सदा-सर्वदा सहज व्यवहार करके जीवन्मुक्त हो विचरने लगे |
जैसे राजा जनक ने अपने मन को समझाया , उसी प्रकार आप भी अपने मन को समझाकर उसे जीत सकते हो | जिसने अपना मन जीत लिया समझो, उसने पूरे जगत को जीत लिया | वह राजाओं का राजा है, सम्राटों का सम्राट है |
इसीलिए कहा गया है :
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत |
मन से ही तो पाइये, परब्रह्म की प्रीत ||

Wednesday, March 28, 2012

अहंकार


क युवक ने शास्त्रों को अच्छी तरह रट लिया था, जिस कारण वह अहंकारी हो गया। एक दिन उसने अपने गुरु से कहा, 'हमें कुछ और सिखाइए।' गुरु बोले, 'सभी तरफ सिखाया जा रहा है। सीख लो।'

एक दिन वह एक पेड़ के नीचे बैठा था, तभी एक सूखा पत्ता सामने आ गिरा। उसे देखकर वह खुशी से पागल हो गया। वह आश्रम गया और सभी से कहने लगा, 'मैं सीख गया, मैं सीख गया।' सभी उससे पूछने लगे कि उसने क्या सीखा है, किस धर्मग्रंथ से सीखा है? इस पर उसने कहा, 'मैंने तो बस पेड़ के एक पत्ते को गिरते देखा और सीख गया।'

उसकी बात सुनकर दूसरे शिष्य बोले, 'अरे भाई। हम तो रोज सूखे पत्ते को गिरते देखते हैं हम तो कुछ नहीं सीखते। तुमने ऐसा क्या सीख लिया?' वह बोला, 'सूखा पत्ता गिरा तो मेरे भीतर भी कुछ गिरा। मुझे लगा कि कल मैं भी सूखे पत्ते की तरह गिर जाऊंगा। जब सूखे पत्ते की तरह गिर ही जाना है, तो फिर इतनी अकड़ क्यों? इतना अहंकार क्यों?' उसके गुरु भी यह सुन रहे थे। उन्होंने उसे गले से लगा लिया।

Thursday, March 22, 2012

ज्यों-ज्यों मति को पुष्टि मिलती है त्यों-त्यों मति देखने-सुनने आदि की इच्छाएँ कम करके अपने आप में तृप्त रहती है। तृप्त मति की योग्यता बढ़ जाती है। योग्यता बढ़ जाती है तो मन और इन्द्रियाँ मति के आधीन हो जाते हैं।
मनुष्य जन्म में ही ऐसी अवस्था आ जाती है कि जब चाहा तब इन्द्रियों को समेटकर मन में ले आये, मन को समेटकर परमात्मा में गोता मार दिया।
दिले तस्वीरे है यार.....
जबकि गरदन झुका ली, मुलाकात कर ली।

Wednesday, March 21, 2012

कोई रात पूनम तो कोई है अमावस, चांदनी उसकी जो चाँद पाना सीख ले |

यूँ तो सभी आये हैं रोते हुए इस जहाँ में, पर सारा जहान उसका जो मुस्कुराना सीख ले |

कुछ भी नज़र न आये अंधेरों में रह कर, रौशनी है उसकी जो शमा जलना सीख ले |

हर गली में मंदिर हर राह में मस्जिद है, पर खुदा है उसका जो सर झुकाना सीख ले |
Gurudev is umar bhi hame jaga rahe hai bar bar nid me se utha rahe hai par ham kab uthenge , kab jagenge , kab tak in nashavar sansar me ulajate rahenge , kab hame shshavat se priti hogi , kab ham apne aap se bahar nikalenge , kab tak kal aur kal karte rahenge , kal to hona hi nahi hai to phir aaj kyu nahi , abhi kyu nahi ,
सपने के संसार पर, क्यों मोहित किया मन मस्ताना है ?

घर मकान महल न अपने, तन मन धन बेगाना है,

चार दिनों का चैत चमन में, बुलबुल के लिए बहाना है,
... ...
आयी खिजाँ हुई पतझड़, था जहाँ जंगल, वहाँ वीराना है,

जाग मुसाफिर कर तैयारी, होना आखिर रवाना है,

दुनिया जिसे कहते हैं, वह तो स्वयं मुसाफिरखाना है।
आपके प्रेम से पत्थर को भी पिघलते देखा....
हज़ारो बिगड़े हुओ के नसीब बदलते देखा.....

जिनको भी अपने दिया सहारा..... बापूजी....
उसे मरते मरते भी जीते देखा.......
आपके प्रेम से पत्थर को भी पिघलते देखा....
हज़ारो बिगड़े हुओ के नसीब बदलते देखा.....

जिनको भी अपने दिया सहारा..... बापूजी....
उसे मरते मरते भी जीते देखा.......
तूफान और आँधी हमको न रोक पाये।
वे और थे मुसाफिर जो पथ से लौट आये।।
मरने के सब इरादे जीने के काम आये।
हम भी तो हैं तुम्हारे कहने लगे पराये।।

ऐसा कौन है जो तुम्हें दुःखी कर सके? तुम यदि न चाहो तो दुःखों की क्या मजाल है जो तुम्हारा स्पर्श भी कर सके? अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्ड को जो चला रहा है वह चेतन तुम्हीं हो।
हे ईश्वर,
हम अगर वो ना कर सके,
जो आप चाहते हो,
तो हमें इतनी समझ जरुर देना की,
हम वो भी ना करे, जो आप 'नही' चाहते .
आदमी खोजता क्या है ? सुख। सुख भी कैसा ? ऐसा नहीं कि आपको दस मिनट के लिए सुख मिले फिर दुःख। दस घंटे, दस दिन या दस साल तक आपको सुख मिले फिर भी बाद में आप दुःख नहीं चाहते हैं। जीवन भर सुख और मरने के बाद आपको दुःख मिले ऐसा भी आप नहीं चाहते।

चार दिन की जिंदगानी में , तन से ,
मन से हमेशा के लिए रहता नहीं इस डरे फानी में |
कुछ अच्छा काम कर लो , चार दिन की जिंदगानी में ||
तन से सेवा करो जगत की , मन से प्रभु के हो जाओ |
शुद्ध बुद्धि से तत्वनिष्ट्ठ हो , मुक्त अवस्था को तुम पाओ ||
पेड़ पर एक कीड़ा चड़ रहा है । हवा का झोंका आया और गिर पड़ा । फिर उसने चढ़ना शुरु किया । हवा का दूसरा झोंका आया और फिर गिर पड़ा । ऐसे वह कीड़ा सात बार गिरा और चढ़ा । आखिर वह आठवीं बार में चढ़ गया ।यह तो संदेश है । एक साधारण कीड़ा अपने लक्ष्य पर पहुँच जाता है और मैं इन्सान होकर पीछे हट जाऊँ?

जय गुरुदेव घुप्प अँधेरे में चरागाँ हो गया. अकेलेपन का साथी मिल गया. भटकते भटकते रास्ता मिल गया. उदासी को खुशी और दर्द को जुबान मिल गयी. क्या क्या नहीं हुआ और क्या क्या नहीं होता इस एक शफ्फाक, पाक आवाज़ के जादू से. शराफत की हज़ार कहानिया और बेझोड मासूमियत की हज़ार मिसालें.

जिंदगी के सबसे अहम सवाल का जवाब हर सांस के साथ हमें मिलता रहता है कि मैं कुछ और नहीं, बल्कि परमात्मा का ही रूप हूं।

हम जो सत्कार्य करते हैं उससे हमें कुछ मिले – यह जरूरी नहीं है। किसी भी सत्कार्य का उद्देश्य हमारी आदतों को अच्छी बनाना है। हमारी आदते अच्छी बनें, स्वभाव शुद्ध, मधुर हो और उद्देश्य शुद्ध आत्मसुख पाने का हो। जीवन निर्मल बने इस उद्देश्य से ही सत्कार्य करने चाहिए।

आप उस व्यक्ति को कभी समझा नहीं सकते , जिसने यह तय कर लिया है कि वह आपसे असहमत ही रहेगा।

Jivan mukat Mahapursh ke sanidhay me jab aap jude jate ho to na aapko sansar ka moh raheta hai na sansari chijo ka aapka har pal , har xan sirf aur sirf Gurudev aur Parmata ke liye hi bitata hai , na kisise se rag hota hai na kisese dwesh aur na pane ke chah hoti hai na bichadane ka dar jo bhi pal bit raha hai bas us ki sogat hai
Is jiwan ko nirthak nahi gawana hai , bas yahi samajana hai , aaj to hai kal aayegi ki nahi pata nahi to kal ke barose kyu betho aaj ko hi sawar do , suraj roshan ho raha haai m, chanda chandani bikhar raha hai to us se mulakat bhi aaj bhi kar do na kab tak gharo me bethe rahoge , kab kadam badavoge