Thursday, March 29, 2012

संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ ।

कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ ॥


मरो मरो सब कोई कहे मरना न जाने कोय ।

एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होय ॥

तुझ में ओम...मुझ में ओम...सब में ओम समाया....

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...2


एक बाग के पुष्प है सारे...एक माला के मोती...

एक दिए के बाती है सब... एक हम सब की ज्योति...

ना जाने किस कारीगर ने एक माटी का बनाया...

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...2


एक बाप के बेटें है सब... एक हमारी माता...

दाना पानी देने वाला...एक हमारा दाता...

ना जाने किस मूरख ने लड़ना हमे सिखाया...

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...2


ऊंच -नीच और जाति -पाति की... दीवारों को तोडों...

बदला ज़माना तुम भी बदलो,बुरी आद्तें छोड़ों,प्रभु से नाता जोड़ों

जागो और जगाओ सब को...समय है ऐसा आया...

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...2



तुझ में ओम...मुझ में ओम...सब में ओम समाया....

सब से कर लो प्यार जगत में... कोई नही पराया...
कह रहा है आसमाँ यह समाँ कुछ भी नहीं ।
रोती है शबनम कि नैरंगे जहाँ कुछ भी नहीं ॥
जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानूस ।
झाड़ उनकी कब्र पर है और निशाँ कुछ भी नहीं ॥
जिनकी नौबत से सदा गूँजते थे आसमाँ ।
दम बखुद है कब्र में अब हूँ न हाँ कुछ भी नहीं ॥
तख्तवालों का पता देते हैं तख्ते गौर के ।
खोज मिलता तक नहीं वादे अजां कुछ भी नहीं ॥
humse prabhuji dur nahi hai na unse hum dur hai,
jaisa chahe vaisa rakhe , humko to manjur hai,
usne humko janam diya hai, humko vohi palega
har halat me humko to vo hi aake sambhalega,
uski hi hai sari shristi, sabme uska noor hai,
humse prabhuji dur nahi hai, na unse hum dur hai,
ek bharosa uspe karke usko hi man le,
mithya hai ye sansar sara, man me ye jan le,
uski pooja , uski bhakti karni hame jaroor hai,
humse prabhuji dur nahi hai, na unse hum dur hai,
kisme hai kalyan hamara, ye to vahi jaane re,
dhoop chav dukh dard hamare sab vahi pehchane re
daya dristi is param pita ki hum sabpar bharpur hai
humse prabhuji dur nahi hai, na unse hum dur hai,
jo bhi de parsad samajhke prem se hume pana hai,
bangla de ya devi jhopadi rehkar hame nibhana hai,
deta sabka yatha yoga yah uska dastur hai,
jaisa chahe vaisa rakhe , humko to manjur hai,
janam liya to marna hoga, jivan ki hai sacchai,
kal chakra kaise mare, jan saka na koi bhai,
katputli ke khel me dekho hum sab majboor hai,
humse prabhuji dur nahi hai, na hum unse dur hai.
साधकः गुरू बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती है ऐसा सुना जाता है। भगवान तो सबके हैं और जो भी भगवान को पाना चाहे उसे भगवान मिल जाना चाहिए। फिर गुरू क्यों जरूरी हैं ?

पू. बापूः बात तो ठीक है लेकिन..... जैसे आटा पड़ा हो तो भी हर कोई रोटी नहीं बना सकता क्योंकि रोटी बनाने के लिए आटा गूंथने तथा रोटी बेलने, सेंकने की कला आनी चाहिये। यह कला भी किसी गुरू (माता, बहन या भाभी) से सीखी जाती है तो भगवान को प...ाने की कला सिखाने के लिये भी तो कोई गुरू चाहिए।

सहजो कारज संसार को गुरू बिन होत नाहीं।

हरि तो गुरू बिन क्या मिले सोच ले मन माहीं।।

सूर्य तो दिखता है लेकिन 'यह सूर्य है' ऐसा ज्ञान कराने वाला कोई था तभी आप सूर्य को सूर्य के रूप में पहचानते हैं। किसी ने बतलाया होगा तभी तो आपने जाना होगा कि 'यह चन्द्रमा है, ये तारे हैं।'

मनुष्य जीवन में जानने की क्षमता छुपी है इसीलिए बच्चों की जैसे-जैसे समझ निखरती है तो पूछता है कि 'यह क्या है.... वह क्या है....?' माता-पिता बतलाते हैं कि 'यह अमुक वस्तु है.... यह चिड़िया है..... यह कौआ है।' जब तक हमें चिड़िया-कौए का ज्ञान नहीं था, तब तक हम चिड़िया को चिड़िया कौए को कौआ नहीं बोल सकते थे। यह ज्ञान भी तो किसी ने दिया ही है ना !

ऐसे ही परमात्मा हमारे साथ है लेकिन अव्यक्त है। वह इन्द्रियों का, आँखों का विषय नहीं है। उपनिषद कहती हैः

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।

यह वाणी का विषय नहीं है। चिड़िया को आप वाणी से बता सकते हो या आँखों से दिखा सकते हो लेकिन भगवान को आप बतला या दिखला नहीं सकते कि 'यह रहा भगवान....।'

जैसे दूध में घी छुपा है ऐसे ही सारे ब्रह्मांड में सच्चिदानंद परमात्मा छुपा है। दूध में घी क्यों नहीं दिखता ? दूध को पहले गर्म करो, दही जमाओ, फिर बिलोओ, मक्खन निकालो और उसे गरम करो तब घी का साक्षात्कार होता है। ऐसे ही इस नश्वर देह एवं बदलने वाले संसार में भी अबदल और शाश्वत तत्त्व छुपा है। थोड़ा व्रत-नियम का तप करो, फिर थोड़ा जमाओ अर्थात् ध्यान करो और विचार करो कि 'ध्यान करने वाला कौन है ? जिसका ध्यान करते हो उस परमेश्वर का स्वरूप क्या है ?' तत्पश्चात् ज्ञानाग्नि से अपनी वासनाओं तथा कर्मों को जलाकर उस मक्खन में से घी निकालो।

ध्यान की एकाग्रता और संयम का जो दही जमाया और मक्खन निकला, उसे घी बनाने के लिए बाकी की विधि करो तो घी प्रकट हो जाता है। ईश्वर को कोई क्यों नहीं पा सकता है ? जैसे दूध में से घी बिना ज्ञान के नहीं बना सकते, कोई न कोई ज्ञान बताने वाला चाहिए। थोड़ी सी रसोई बनाने की कला बताने वाला कोई अनुभवी गुरू (माता आदि) चाहिए तो फिर परमात्मा का, जीवनदाता का ज्ञान बिना गुरू के कैसे संभव हो सकता है.....?
पूज्य बापूजी के सत्संग से
' श्री योगवशिष्ठ महारामायण ' के ' उपशम प्रकरण ' के आठवें सर्ग में यह कथा आती है :
एक बार राजा जनक अपने मंत्री-टहलुओं के साथ अरण्य-विहार करने के लिए निकले | विहार करते-करते वे मंत्री-टहलुओं को दूर छोड़कर एक विशाल वृक्ष के नीचे जा बैठे |
दैवयोग से कहो या राजा के पुण्यपुंज के प्रभाव से कहो , उनको सिद्धों की गीता (ज्ञानचर्चा ) सुनने का अवसर मिला | वहां अदृष्ट सिद्ध विचर रहे थे | जैसे हम लोगों का शरीर दीखता है वैसे उनका स्थूल शरीर नहीं दीखता | वे सिद्ध आपस में चर्चा कर रहे थे |
मनुष्य का मन जहाँ रमण करता है उसी विषय की चर्चा उसे सुहावनी लगती है | मनुष्य का मन जाग्रत में कहाँ रमण करता है वह जाननी हो तो देखो कि उसे स्वप्न किस प्रकार के आते हैं ? जाग्रत में गहराई में मन जहाँ विचरण करता है , स्वप्न प्रायः उसी प्रकार के आते हैं , स्वाभाविक बातचीत में भी वह बात प्रायः आ ही जाती है | किसी इष्ट में , भगवान में , गुरु में , साधन में मन रमा है तो बात करते-करते उनकी बात निकल ही आती है | साधक को ध्यान देना चाहिए कि वार्तालाप ऐसा हो जो उसके साधन के रास्ते में मददरूप हो जाय |
चर्चा करते हुए प्रथम सिद्ध ने कहा : " यह द्रष्टा जो पुरुष है और दृश्य जो जगत है उस द्रष्टा तथा दृश्य के मिलाप में जो बुद्धि में निश्चित आनंद होता है और इष्ट के संयोग एवं अनिष्ट के वियोग का जो आनंद जो चित्त में दृढ़ होता है - वह आनंद आत्मतत्व से उदय होता है | "
दुसरे सिद्ध ने कहा : " द्रष्टा, दर्शन और दृश्य का वासनासाहित त्याग करो | जो दर्शन से प्रथम प्रकाशरूप है और जिसके प्रकाश से ये तीनों प्रकाशते हैं, उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
तीसरे सिद्ध ने कहा : " जो निराभास और निर्मल है , जिसमे मन का अभाव है अर्थात अद्वैतरूप है , उसकी हम उपासना करते हैं | "
चौथे सिद्ध ने कहा : " जो द्रष्टा व दृश्य इन दोनों के मध्य में है और अस्ति अथवा नास्ति - दोनों पक्षों से रहित प्रकाशरूप सत्ता है और सूर्य आदि को भी प्रकाशता है , उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
पांचवे सिद्ध ने कहा : " जो इश्वर सकार और हकार है अर्थात सकार जिसके आदि में है और हकार जिसके अंत में है , वह अंत से रहित , आनंदस्वरूप , अनंत , शिवस्वरूप , परमात्मा सर्व जीवों के ह्रदय में स्थित है और जिसकी सत्ता से व्यक्ति का अहं ' मैं ' रूप से उच्चारित होता है, उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
छठे सिद्ध ने कहा : " ह्रदय में स्थित इश्वर को त्यागकर जो और देव को पाने का यत्न करते हैं , वे पुरुष कौस्तुभमणि को त्यागकर अन्य रत्नों कि वांछा करते हैं | "
सातवें सिद्ध ने कहा : " जो सब आशाओं को त्यागता है उसको उत्तम फल प्राप्त होता है | जब आशारूपी विष की बेल मूलसाहित नष्ट हो जाती है , तब जन्म-मरण आदि दुःख नष्ट हो जाते हैं और फिर नहीं उपजते | जो पदार्थों को अत्यंत विरसरूप जानता है और फिर उनमें आशा बांधता है, वह दुर्बुद्धि गर्दभ है , मनुष्य नहीं | जिन-जिन विषयों की और दृष्टी उठती है उनको विवेक से नष्ट करो , जैसे इन्द्र ने वज्र से पर्वतों को नष्ट किया था | जब इस प्रकार शुद्ध आचरण करोगे तब समभाव को प्राप्त होओगे और उससे मन का उपशम होकर तुम अक्षय , अविनाशी आत्मपद को पाओगे | "
सिद्धों के वचन सुनकर राजा जनक का विवेक जगा | वे अपने महल में आकर झरोखे में से संसार की चंचल गति देखकर विलाप करने लगे और अपने मन को समझाने लगे :
' हे मेरे मन ! तू भी उस परमेश्वर- स्वभाव में आ जा | बाहर कब तक भटकेगा ? आँख, कान, नाक, त्वचा , आदि इन्द्रियों से मिलकर तू कब तक सुख के लिए पागलों की नाई भटकता रहेगा ? ऐसा करते-करते तो कई युग बीत गये, मेरे मन ! अब तो तू अपने आत्मसुख में आ जा | '
कभी राजा जनक का मन शांत होता, कभी इधर-उधर भागता | वे अपने मन को फिर से समझाते : ' हे मेरे मन ! अच्छा जा , तुझे जहाँ भी जाना है , तू जा | अब मेरा तेरे साथ कोई लेना-देना नहीं है | मैं तेरी दौड़ को देखनेवाला तुझसे न्यारा हूँ |'
इस प्रकार का चिंतन करते-करते जनक शांत हो गये | अब न इष्ट की प्राप्ति में उनको हर्ष रहा और न ही अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष , वरन वे सदा-सर्वदा सहज व्यवहार करके जीवन्मुक्त हो विचरने लगे |
जैसे राजा जनक ने अपने मन को समझाया , उसी प्रकार आप भी अपने मन को समझाकर उसे जीत सकते हो | जिसने अपना मन जीत लिया समझो, उसने पूरे जगत को जीत लिया | वह राजाओं का राजा है, सम्राटों का सम्राट है |
इसीलिए कहा गया है :
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत |
मन से ही तो पाइये, परब्रह्म की प्रीत ||

Wednesday, March 28, 2012

अहंकार


क युवक ने शास्त्रों को अच्छी तरह रट लिया था, जिस कारण वह अहंकारी हो गया। एक दिन उसने अपने गुरु से कहा, 'हमें कुछ और सिखाइए।' गुरु बोले, 'सभी तरफ सिखाया जा रहा है। सीख लो।'

एक दिन वह एक पेड़ के नीचे बैठा था, तभी एक सूखा पत्ता सामने आ गिरा। उसे देखकर वह खुशी से पागल हो गया। वह आश्रम गया और सभी से कहने लगा, 'मैं सीख गया, मैं सीख गया।' सभी उससे पूछने लगे कि उसने क्या सीखा है, किस धर्मग्रंथ से सीखा है? इस पर उसने कहा, 'मैंने तो बस पेड़ के एक पत्ते को गिरते देखा और सीख गया।'

उसकी बात सुनकर दूसरे शिष्य बोले, 'अरे भाई। हम तो रोज सूखे पत्ते को गिरते देखते हैं हम तो कुछ नहीं सीखते। तुमने ऐसा क्या सीख लिया?' वह बोला, 'सूखा पत्ता गिरा तो मेरे भीतर भी कुछ गिरा। मुझे लगा कि कल मैं भी सूखे पत्ते की तरह गिर जाऊंगा। जब सूखे पत्ते की तरह गिर ही जाना है, तो फिर इतनी अकड़ क्यों? इतना अहंकार क्यों?' उसके गुरु भी यह सुन रहे थे। उन्होंने उसे गले से लगा लिया।

Thursday, March 22, 2012

ज्यों-ज्यों मति को पुष्टि मिलती है त्यों-त्यों मति देखने-सुनने आदि की इच्छाएँ कम करके अपने आप में तृप्त रहती है। तृप्त मति की योग्यता बढ़ जाती है। योग्यता बढ़ जाती है तो मन और इन्द्रियाँ मति के आधीन हो जाते हैं।
मनुष्य जन्म में ही ऐसी अवस्था आ जाती है कि जब चाहा तब इन्द्रियों को समेटकर मन में ले आये, मन को समेटकर परमात्मा में गोता मार दिया।
दिले तस्वीरे है यार.....
जबकि गरदन झुका ली, मुलाकात कर ली।

Wednesday, March 21, 2012

कोई रात पूनम तो कोई है अमावस, चांदनी उसकी जो चाँद पाना सीख ले |

यूँ तो सभी आये हैं रोते हुए इस जहाँ में, पर सारा जहान उसका जो मुस्कुराना सीख ले |

कुछ भी नज़र न आये अंधेरों में रह कर, रौशनी है उसकी जो शमा जलना सीख ले |

हर गली में मंदिर हर राह में मस्जिद है, पर खुदा है उसका जो सर झुकाना सीख ले |
Gurudev is umar bhi hame jaga rahe hai bar bar nid me se utha rahe hai par ham kab uthenge , kab jagenge , kab tak in nashavar sansar me ulajate rahenge , kab hame shshavat se priti hogi , kab ham apne aap se bahar nikalenge , kab tak kal aur kal karte rahenge , kal to hona hi nahi hai to phir aaj kyu nahi , abhi kyu nahi ,
सपने के संसार पर, क्यों मोहित किया मन मस्ताना है ?

घर मकान महल न अपने, तन मन धन बेगाना है,

चार दिनों का चैत चमन में, बुलबुल के लिए बहाना है,
... ...
आयी खिजाँ हुई पतझड़, था जहाँ जंगल, वहाँ वीराना है,

जाग मुसाफिर कर तैयारी, होना आखिर रवाना है,

दुनिया जिसे कहते हैं, वह तो स्वयं मुसाफिरखाना है।
आपके प्रेम से पत्थर को भी पिघलते देखा....
हज़ारो बिगड़े हुओ के नसीब बदलते देखा.....

जिनको भी अपने दिया सहारा..... बापूजी....
उसे मरते मरते भी जीते देखा.......
आपके प्रेम से पत्थर को भी पिघलते देखा....
हज़ारो बिगड़े हुओ के नसीब बदलते देखा.....

जिनको भी अपने दिया सहारा..... बापूजी....
उसे मरते मरते भी जीते देखा.......
तूफान और आँधी हमको न रोक पाये।
वे और थे मुसाफिर जो पथ से लौट आये।।
मरने के सब इरादे जीने के काम आये।
हम भी तो हैं तुम्हारे कहने लगे पराये।।

ऐसा कौन है जो तुम्हें दुःखी कर सके? तुम यदि न चाहो तो दुःखों की क्या मजाल है जो तुम्हारा स्पर्श भी कर सके? अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्ड को जो चला रहा है वह चेतन तुम्हीं हो।
हे ईश्वर,
हम अगर वो ना कर सके,
जो आप चाहते हो,
तो हमें इतनी समझ जरुर देना की,
हम वो भी ना करे, जो आप 'नही' चाहते .
आदमी खोजता क्या है ? सुख। सुख भी कैसा ? ऐसा नहीं कि आपको दस मिनट के लिए सुख मिले फिर दुःख। दस घंटे, दस दिन या दस साल तक आपको सुख मिले फिर भी बाद में आप दुःख नहीं चाहते हैं। जीवन भर सुख और मरने के बाद आपको दुःख मिले ऐसा भी आप नहीं चाहते।

चार दिन की जिंदगानी में , तन से ,
मन से हमेशा के लिए रहता नहीं इस डरे फानी में |
कुछ अच्छा काम कर लो , चार दिन की जिंदगानी में ||
तन से सेवा करो जगत की , मन से प्रभु के हो जाओ |
शुद्ध बुद्धि से तत्वनिष्ट्ठ हो , मुक्त अवस्था को तुम पाओ ||
पेड़ पर एक कीड़ा चड़ रहा है । हवा का झोंका आया और गिर पड़ा । फिर उसने चढ़ना शुरु किया । हवा का दूसरा झोंका आया और फिर गिर पड़ा । ऐसे वह कीड़ा सात बार गिरा और चढ़ा । आखिर वह आठवीं बार में चढ़ गया ।यह तो संदेश है । एक साधारण कीड़ा अपने लक्ष्य पर पहुँच जाता है और मैं इन्सान होकर पीछे हट जाऊँ?

जय गुरुदेव घुप्प अँधेरे में चरागाँ हो गया. अकेलेपन का साथी मिल गया. भटकते भटकते रास्ता मिल गया. उदासी को खुशी और दर्द को जुबान मिल गयी. क्या क्या नहीं हुआ और क्या क्या नहीं होता इस एक शफ्फाक, पाक आवाज़ के जादू से. शराफत की हज़ार कहानिया और बेझोड मासूमियत की हज़ार मिसालें.

जिंदगी के सबसे अहम सवाल का जवाब हर सांस के साथ हमें मिलता रहता है कि मैं कुछ और नहीं, बल्कि परमात्मा का ही रूप हूं।

हम जो सत्कार्य करते हैं उससे हमें कुछ मिले – यह जरूरी नहीं है। किसी भी सत्कार्य का उद्देश्य हमारी आदतों को अच्छी बनाना है। हमारी आदते अच्छी बनें, स्वभाव शुद्ध, मधुर हो और उद्देश्य शुद्ध आत्मसुख पाने का हो। जीवन निर्मल बने इस उद्देश्य से ही सत्कार्य करने चाहिए।

आप उस व्यक्ति को कभी समझा नहीं सकते , जिसने यह तय कर लिया है कि वह आपसे असहमत ही रहेगा।

Jivan mukat Mahapursh ke sanidhay me jab aap jude jate ho to na aapko sansar ka moh raheta hai na sansari chijo ka aapka har pal , har xan sirf aur sirf Gurudev aur Parmata ke liye hi bitata hai , na kisise se rag hota hai na kisese dwesh aur na pane ke chah hoti hai na bichadane ka dar jo bhi pal bit raha hai bas us ki sogat hai
Is jiwan ko nirthak nahi gawana hai , bas yahi samajana hai , aaj to hai kal aayegi ki nahi pata nahi to kal ke barose kyu betho aaj ko hi sawar do , suraj roshan ho raha haai m, chanda chandani bikhar raha hai to us se mulakat bhi aaj bhi kar do na kab tak gharo me bethe rahoge , kab kadam badavoge