संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ ।
कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ ॥
मरो मरो सब कोई कहे मरना न जाने कोय ।
एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होय ॥
एक दिन वह एक पेड़ के नीचे बैठा था, तभी एक सूखा पत्ता सामने आ गिरा। उसे देखकर वह खुशी से पागल हो गया। वह आश्रम गया और सभी से कहने लगा, 'मैं सीख गया, मैं सीख गया।' सभी उससे पूछने लगे कि उसने क्या सीखा है, किस धर्मग्रंथ से सीखा है? इस पर उसने कहा, 'मैंने तो बस पेड़ के एक पत्ते को गिरते देखा और सीख गया।'
उसकी बात सुनकर दूसरे शिष्य बोले, 'अरे भाई। हम तो रोज सूखे पत्ते को गिरते देखते हैं हम तो कुछ नहीं सीखते। तुमने ऐसा क्या सीख लिया?' वह बोला, 'सूखा पत्ता गिरा तो मेरे भीतर भी कुछ गिरा। मुझे लगा कि कल मैं भी सूखे पत्ते की तरह गिर जाऊंगा। जब सूखे पत्ते की तरह गिर ही जाना है, तो फिर इतनी अकड़ क्यों? इतना अहंकार क्यों?' उसके गुरु भी यह सुन रहे थे। उन्होंने उसे गले से लगा लिया।