पूज्य बापूजी के सत्संग से
' श्री योगवशिष्ठ महारामायण ' के ' उपशम प्रकरण ' के आठवें सर्ग में यह कथा आती है :
एक बार राजा जनक अपने मंत्री-टहलुओं के साथ अरण्य-विहार करने के लिए निकले | विहार करते-करते वे मंत्री-टहलुओं को दूर छोड़कर एक विशाल वृक्ष के नीचे जा बैठे |
दैवयोग से कहो या राजा के पुण्यपुंज के प्रभाव से कहो , उनको सिद्धों की गीता (ज्ञानचर्चा ) सुनने का अवसर मिला | वहां अदृष्ट सिद्ध विचर रहे थे | जैसे हम लोगों का शरीर दीखता है वैसे उनका स्थूल शरीर नहीं दीखता | वे सिद्ध आपस में चर्चा कर रहे थे |
मनुष्य का मन जहाँ रमण करता है उसी विषय की चर्चा उसे सुहावनी लगती है | मनुष्य का मन जाग्रत में कहाँ रमण करता है वह जाननी हो तो देखो कि उसे स्वप्न किस प्रकार के आते हैं ? जाग्रत में गहराई में मन जहाँ विचरण करता है , स्वप्न प्रायः उसी प्रकार के आते हैं , स्वाभाविक बातचीत में भी वह बात प्रायः आ ही जाती है | किसी इष्ट में , भगवान में , गुरु में , साधन में मन रमा है तो बात करते-करते उनकी बात निकल ही आती है | साधक को ध्यान देना चाहिए कि वार्तालाप ऐसा हो जो उसके साधन के रास्ते में मददरूप हो जाय |
चर्चा करते हुए प्रथम सिद्ध ने कहा : " यह द्रष्टा जो पुरुष है और दृश्य जो जगत है उस द्रष्टा तथा दृश्य के मिलाप में जो बुद्धि में निश्चित आनंद होता है और इष्ट के संयोग एवं अनिष्ट के वियोग का जो आनंद जो चित्त में दृढ़ होता है - वह आनंद आत्मतत्व से उदय होता है | "
दुसरे सिद्ध ने कहा : " द्रष्टा, दर्शन और दृश्य का वासनासाहित त्याग करो | जो दर्शन से प्रथम प्रकाशरूप है और जिसके प्रकाश से ये तीनों प्रकाशते हैं, उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
तीसरे सिद्ध ने कहा : " जो निराभास और निर्मल है , जिसमे मन का अभाव है अर्थात अद्वैतरूप है , उसकी हम उपासना करते हैं | "
चौथे सिद्ध ने कहा : " जो द्रष्टा व दृश्य इन दोनों के मध्य में है और अस्ति अथवा नास्ति - दोनों पक्षों से रहित प्रकाशरूप सत्ता है और सूर्य आदि को भी प्रकाशता है , उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
पांचवे सिद्ध ने कहा : " जो इश्वर सकार और हकार है अर्थात सकार जिसके आदि में है और हकार जिसके अंत में है , वह अंत से रहित , आनंदस्वरूप , अनंत , शिवस्वरूप , परमात्मा सर्व जीवों के ह्रदय में स्थित है और जिसकी सत्ता से व्यक्ति का अहं ' मैं ' रूप से उच्चारित होता है, उस आत्मा कि हम उपासना करते हैं | "
छठे सिद्ध ने कहा : " ह्रदय में स्थित इश्वर को त्यागकर जो और देव को पाने का यत्न करते हैं , वे पुरुष कौस्तुभमणि को त्यागकर अन्य रत्नों कि वांछा करते हैं | "
सातवें सिद्ध ने कहा : " जो सब आशाओं को त्यागता है उसको उत्तम फल प्राप्त होता है | जब आशारूपी विष की बेल मूलसाहित नष्ट हो जाती है , तब जन्म-मरण आदि दुःख नष्ट हो जाते हैं और फिर नहीं उपजते | जो पदार्थों को अत्यंत विरसरूप जानता है और फिर उनमें आशा बांधता है, वह दुर्बुद्धि गर्दभ है , मनुष्य नहीं | जिन-जिन विषयों की और दृष्टी उठती है उनको विवेक से नष्ट करो , जैसे इन्द्र ने वज्र से पर्वतों को नष्ट किया था | जब इस प्रकार शुद्ध आचरण करोगे तब समभाव को प्राप्त होओगे और उससे मन का उपशम होकर तुम अक्षय , अविनाशी आत्मपद को पाओगे | "
सिद्धों के वचन सुनकर राजा जनक का विवेक जगा | वे अपने महल में आकर झरोखे में से संसार की चंचल गति देखकर विलाप करने लगे और अपने मन को समझाने लगे :
' हे मेरे मन ! तू भी उस परमेश्वर- स्वभाव में आ जा | बाहर कब तक भटकेगा ? आँख, कान, नाक, त्वचा , आदि इन्द्रियों से मिलकर तू कब तक सुख के लिए पागलों की नाई भटकता रहेगा ? ऐसा करते-करते तो कई युग बीत गये, मेरे मन ! अब तो तू अपने आत्मसुख में आ जा | '
कभी राजा जनक का मन शांत होता, कभी इधर-उधर भागता | वे अपने मन को फिर से समझाते : ' हे मेरे मन ! अच्छा जा , तुझे जहाँ भी जाना है , तू जा | अब मेरा तेरे साथ कोई लेना-देना नहीं है | मैं तेरी दौड़ को देखनेवाला तुझसे न्यारा हूँ |'
इस प्रकार का चिंतन करते-करते जनक शांत हो गये | अब न इष्ट की प्राप्ति में उनको हर्ष रहा और न ही अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष , वरन वे सदा-सर्वदा सहज व्यवहार करके जीवन्मुक्त हो विचरने लगे |
जैसे राजा जनक ने अपने मन को समझाया , उसी प्रकार आप भी अपने मन को समझाकर उसे जीत सकते हो | जिसने अपना मन जीत लिया समझो, उसने पूरे जगत को जीत लिया | वह राजाओं का राजा है, सम्राटों का सम्राट है |
इसीलिए कहा गया है :
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत |
मन से ही तो पाइये, परब्रह्म की प्रीत ||
Thursday, March 29, 2012
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