Thursday, March 22, 2012

ज्यों-ज्यों मति को पुष्टि मिलती है त्यों-त्यों मति देखने-सुनने आदि की इच्छाएँ कम करके अपने आप में तृप्त रहती है। तृप्त मति की योग्यता बढ़ जाती है। योग्यता बढ़ जाती है तो मन और इन्द्रियाँ मति के आधीन हो जाते हैं।
मनुष्य जन्म में ही ऐसी अवस्था आ जाती है कि जब चाहा तब इन्द्रियों को समेटकर मन में ले आये, मन को समेटकर परमात्मा में गोता मार दिया।
दिले तस्वीरे है यार.....
जबकि गरदन झुका ली, मुलाकात कर ली।

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