कह रहा है आसमाँ यह समाँ कुछ भी नहीं ।
रोती है शबनम कि नैरंगे जहाँ कुछ भी नहीं ॥
जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानूस ।
झाड़ उनकी कब्र पर है और निशाँ कुछ भी नहीं ॥
जिनकी नौबत से सदा गूँजते थे आसमाँ ।
दम बखुद है कब्र में अब हूँ न हाँ कुछ भी नहीं ॥
तख्तवालों का पता देते हैं तख्ते गौर के ।
खोज मिलता तक नहीं वादे अजां कुछ भी नहीं ॥
Thursday, March 29, 2012
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