Monday, June 28, 2010

संसार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी के सम्बन्ध की तरह गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी एक सम्बन्ध ही है लेकिन अन्य सब सम्बन्ध बन्धन बढ़ाने वाले हैं जबकि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सम बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। यह सम्बन्ध एक ऐसा सम्बन्ध है जो सब बन्धनों से छुड़ाकर अन्त में आप भी हट जाता है और जीव को अपने शिवस्वरूप का अनुभव करा देता है।
संसार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी के सम्बन्ध की तरह गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी एक सम्बन्ध ही है लेकिन अन्य सब सम्बन्ध बन्धन बढ़ाने वाले हैं जबकि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सम बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। यह सम्बन्ध एक ऐसा सम्बन्ध है जो सब बन्धनों से छुड़ाकर अन्त में आप भी हट जाता है और जीव को अपने शिवस्वरूप का अनुभव करा देता है।
वेदान्त का यह सिद्धांत है कि हम बद्ध नहीं हैं बल्कि नित्य मुक्त हैं इतना ही नहीं, ‘बद्ध हैं’ यह सोचना भी अनिष्टकारी है, भ्रम है ज्यों हीआपने सोचा कि ‘मैं बद्ध हूँ…, दुर्बल हूँ…, असहाय हूँ…’ त्यों ही अपनादुर्भाग्य शुरू हुआ समझो आपने अपने पैरों में एक जंजीर और बाँध दी अतःसदा मुक्त होने का विचार करो और मुक्ति का अनुभव करो

Tuesday, June 22, 2010

अशुभ का विरोध नहीं करो. सदा शांत रहो, जो कुछ सामने आए उसका स्वागत करो वह चाहे आपके इच्छा की धारा के विपरीत भी हो. तब आप देखेंगे की प्रत्यक्ष बुराई भलाई में बदल जाएगी
रैन की बिछड़ी चकवी आन मिले प्रभात।
सत्य का बिछड़ा मानखा दिवस मिले नहीं रात।।

हे चिड़िया ! सन्ध्या हुई है। तू मुझसे बिछुड़ जाएगी। दूसरे घोंसले में चली जाएगी लेकिन प्रभात को मिल जाएगी। एक बात सुन। सत्य से जो मनुष्य बिछुड़ गया, मनुष्य जन्म पाकर भी उस सत्यस्वरूप परमात्मा में स्थिति नहीं की, ऐसा मनुष्य फिर सत्य से न सुबह मिलेगा, न शाम मिलेगा..., न रात मिलेगा, न प्रभात मिलेगा।

Sunday, June 20, 2010

मृत्यु किसकी होती है ?

अभी तो जिसे तुम जीवन कहते हो वह जीवन नहीं और जिसे मृत्यु कहते हो वह मोत नहीं है । केवल प्रकृति मे परिवर्तन हो रहा है । प्रकृति में जो हो रहा है वह सब परिवर्तन है । जो पैदा होता दिख रहा है वाही नस्त होता नजर अत है । जिसका सर्जन होता दीखता है वाही विसर्जन ही और जाता नजर अत है । पेड़ - पौधे हो या पशु - पक्सी, नगर हो या जंगल , पहाड़ हो या खाइयां , सागर हो या मरुस्थल, सब परिवर्तन रूपी सरिता मे बहे जा रहे है । जहा नगर थे वहा वीरान हो गये, जहा बस्तियां कड़ी हैं, जहा मरुस्थल थे वहा आज महासागर हिलोरें ले रहे हैं और जहा महासागर थे वहा मरुस्थल खड़े हैं । बड़ें - बड़ें खड्डों की जगह पहाड़ खड़े हो गये और जहा पहाड़ थे वहां आज घाटियाँ, खाइयाँ बनी हुई हैं । जहा बड़े बड़े वन थे वहां भूमि बंजर और पथरीली हो गयी और जो बंजर थी, पथरीली थी वहा आज बाग-बगीचों के रूप मे हरियाली फैली हुई है ।

चाँद सफ़र में, सितारे सफ़र में ।
हवाएं सफ़र में, दरियाके किनारे सफ़र में ।
अरे सायर ! जहाँ की हर चीज सफ़र में ।
... तो आप बेसफ़र कैसे रह सकते हैं ?

आप जिस शरीर को 'में' मानते हैं वह शरीर भी परिवर्तन की धरा मे बह रहा है । प्रतिदिन शरीर के पुराने कोस नस्त हो रहे हैं और उनकी जगह नए कोस बनते जा रहे हैं । इस स्थूल शरीर से सुक्स्म शरीर का वियोग होता है अर्थात सुक्स्म शरीर देहरूपी वस्त्र बदलता है इसको लोग मोत कहते हैं और शोक मे फुट-फुटकर रोते हैं ।

भगवन राम ने जब बलि का वध किया तो बलि की पतनी राम के पास आयी और अपने पति के वियोग में फुट-फुटकर रोने लगी। राम ने उसको धीरज बढ़ाते कहा :

"है तारा ! तू किसके लिए विलाप कर रही है ? शरीर के लिए या जिव के लिए ? पंचमहाभूतो द्वारा रचित शरीर के लिए यदि तू रोटी है तो यह तेरे सामने ही पड़ा है और जीवके लिए रोटी है तो जिव नित्य हैं, वह मरता नहीं । "

Tuesday, June 15, 2010

जैसे स्वप्न-जगत जाग्रत होने के बाद मिथ्या लगता है वैसे ही यह जाग्रत जगत अपने आत्मदेव को जानने से मिथ्या हो जाता है। जिसकी सत्ता लेकर यह जगत् बना है अथवा भासमान हो रहा है उस आत्मा को जान लेने से मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।गुरुदेव जो देना चाहते हैं वह कोई ऐरा-गैरा पदार्थ टिक नहीं सकता है। इसलिए सदगुरु अपने प्यारे शिष्य को चोट मार मारकर मजबूत बनाते हैं, कसौटियों में कसकर योग्य बनाते हैं।प्रभु.....तु मेरा और में तेरा हु.ॐ नमो भगवते वासुदेवाय.........
मनोबल बढ़ाकर आत्मा में बैठ जाओ, आप ही ब्रह्म बन जाओ। संकल्प बल की यह आखिरी उपलब्धि है।अपने को परिस्थितियं का गुलाम कभी न समझो। तुम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हो।
जैसे स्वप्न-जगत जाग्रत होने के बाद मिथ्या लगता है वैसे ही यह जाग्रत जगत अपने आत्मदेव को जानने से मिथ्या हो जाता है। जिसकी सत्ता लेकर यह जगत् बना है अथवा भासमान हो रहा है उस आत्मा को जान लेने से मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।गहरी वास्तविकता में तुम आत्मा हो, ईश्वर हो, सर्वशक्तिमान हो। यह सत्य तुम्हारे जीवन में प्रगट होने की प्रतीक्षा कर रहा है।
पावन सत्संग के द्वारा मन से जगत की सत्यता हटती है। जब तक जगत सच्चा लगता है तब तक सुख-दुःख होते हैं। जगत की सत्यता बाधित होते ही अर्थात् आत्मज्ञान होते ही परमात्मा का सच्चा आनन्द प्राप्त होता है। योगी, महर्षि, सन्त, महापुरुष, फकीर लोग इस परम रस का पान करते हैं। हम चाहें तो वे हमको भी उसका स्वाद चखा सकते हैं। परन्तु इसके लिए सत्संग का सेवन करना जरूरी है। जीवन में एक बार सत्संग का प्रवेश हो जाय तो बाद में और सब अपने आप मिलता है और भाग्य को चमका देता है।
करो हिम्मत......! मारो छलांग.....! कब तक गिड़गिड़ाते रहोगे ? हे भोले महेश ! तुम अपनी महिमा में जागो। कोई कठिन बात नहीं है। अपने साम्राज्य को संभालो। फिर तुम्हें संसार और संसार की उपलब्धियाँ, स्वर्ग और स्वर्ग के सुख तुम्हारे कृपाकांक्षी महसूस होंगे। तुम इतने महान हो। तुम्हारा यश वेद भी नहीं गा सकते। कब तक इस देह की कैद में पड़े रहोगे ?
परमात्मा के नित्यावतारूप ज्ञानी महात्मा के दर्शन तो कई लोगों को हो जाते है लेकिन उनकी वास्तविक पहचान सब को नहीं होती, इससे वे लाभ से वंचित रह जाते हैं। महात्मा के साक्षात्कार के लिए हृदय में अतुलनीय श्रद्धा और प्रेम के पुष्पों की सुगन्ध चाहिए।
गुरुसेवा रूपी तीक्षण तलवार और ध्यान की सहायता से शिष्य मन, वचन, प्राण और देह के अहंकार को छेद देता है और सब रागद्वेष से मुक्त होकर इस संसार में स्वेच्छापूर्वक विहार करता है।
महापुरुष का आश्रय प्राप्त करने वाला मनुष्य सचमुच परम सदभागी है। सदगुरु की गोद में पूर्ण श्रद्धा से अपना अहं रूपी मस्तक रखकर निश्चिंत होकर विश्राम पाने वाले सत्शिष्य का लौकिक एवं आध्यात्मिक मार्ग तेजोमय हो जाता है। सदगुरु में परमात्मा का अनन्त सामर्थ्य होता है। उनके परम पावन देह को छूकर आने वाली वायु भी जीव के अनन्त जन्मों के पापों का निवारण करके क्षण मात्र में उसको आह्लादित कर सकती है तो उनके श्री चरणों में श्रद्धा-भक्ति से समर्पित होने वाले सत्शिष्य के कल्याण में क्या कमी रहेगी ?
ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ब्रह्मभाव से अपने हाथ से जिसको स्पर्श करते हैं, अपने चक्षुओं से जिसको देखते हैं वह जड़ पदार्थ भी कालांतर में जीवत्व पाकर आखिर ब्रह्मत्व को उपलब्ध होकर मुक्ति पाता है, तो फिर उनकी दृष्टि में आये हुए मानव के मोक्ष के बारे में संदेह ही कहाँ है ?
महापुरुष का आश्रय प्राप्त करने वाला मनुष्य सचमुच परम सदभागी है। सदगुरु की गोद में पूर्ण श्रद्धा से अपना अहं रूपी मस्तक रखकर निश्चिंत होकर विश्राम पाने वाले सत्शिष्य का लौकिक एवं आध्यात्मिक मार्ग तेजोमय हो जाता है। सदगुरु में परमात्मा का अनन्त सामर्थ्य होता है। उनके परम पावन देह को छूकर आने वाली वायु भी जीव के अनन्त जन्मों के पापों का निवारण करके क्षण मात्र में उसको आह्लादित कर सकती है तो उनके श्री चरणों में श्रद्धा-भक्ति से समर्पित होने वाले सत्शिष्य के कल्याण में क्या कमी रहेगी ?
हम अपने वास्तविक स्वरूप, अपनी असीम महिमा को नहीं जानते। नहीं तो मजाल है कि जगत के सारे लोग और तैंतीस करोड़ देवता भी मिलकर हमें दुःखी करना चाहें और हम दुःखी हो जायें ! जब हम ही भीतर से सुख अथवा दुःख को स्वीकृति देते हैं तभी सुख अथवा दुःख हम को प्रभावित करते हैं। सदैव प्रसन्न रहना ईश्वर की सबसे बड़ी भक्ति है।
कभी श्रेयस् की ओर खिंचाव होता है तो कभी प्रेयस की ओर खिंचाव होता है।श्रेय और प्रेय (परस्पर मिश्रित होकर) मनुष्य के पास आते हैं। बुद्धिमान पुरुष यथायोग्य सोच-विचार करके इन दोनों को अलग करता है। विवेकी पुरुष प्रेय और श्रेय में से श्रेय को ग्रहण करता है किन्तु मूढ़ योगक्षेम चलाने के लिए प्रेय को पसन्द करता है।'
ज्ञानी का राग तो संसार में है नहीं। उसका राग तो परमात्मा में है और परमात्मा सब जगह मिलते हैं, परमात्मा सर्वत्र मौजूद हैं, परमात्मा ज्ञानी का अपना आपा होकर बैठे हैं। इसलिए ज्ञानी को कोई भी सासांरिक परिस्थिति का राग नहीं है। राग नहीं है तो द्वेष भी नहीं है। राग द्वेष नहीं है तो उसका चित्त सदा समाहित है।
मनुष्य मात्र में परब्रह्म परमात्मा को पाने की योग्यता है। परमात्मा ने मनुष्य को ऐसी बुद्धि इसीलिए दे रखी है कि उसको आत्मा-परमात्मा के ज्ञान की जिज्ञासा जाग जाय, आत्मसाक्षात्कार हो जाय। कलम भी चलाओ तो परमात्मा को रिझाने के लिये और कुदाली चलाओ तो भी उसको रिझाने के लिए।अनन्य भाव से हरि का नाम ले लेंगे तो सारे पातक नष्ट हो जायेंगे।
दुनियाँ नहीं है, संसार नहीं है और सांसारिक जीवों की बातें कुछ नहीं है। ईश्वर ही एक मात्र सत्य है।संसार में कोई पदार्थ नहीं जो मुझे बाँध सके। प्रत्येक वस्तु वास्तव में मुझसे ही उत्पन्न होती है।चाहे करोड़ों सूर्यों का प्रलय हो जाय, अगणित चन्द्रमा भले ही गल कर नष्ट हो जाएँ, पर ज्ञानी पुरुष मेरू की तरह अटल और अचल रहते हैं।
निश्चय रखना चाहिये कि संसार से हमें जाना अवश्य है और सब कुछ यहीं छोड़ कर जाना होगा ; साथ में कुछ नहीं जायगा यह भी निश्चित है। जब साथ में कुछ ले नहीं जाना है तो जब तक यहाँ रहो निश्चिन्तता से रहो। व्यर्थ की चिन्तायें बना कर अशान्ति मत भोगो।
जिसकेजीवन मेंदिव्य विचारनहीं है,दिव्यचिन्तन...नहीं है वह चिन्ताकी खाई गिरताहै।चिन्ता सेबुद्धि संकीर्णहोती है,बुद्धि काविनाश होता है,,विकार पैदाहोते हैं।विचारवानपुरुष अपनीविचारशक्तिसेविवेक वैराग्यउत्पन्न करकेजिसकी आवश्यकताहै उसेपा लेगा।मूर्ख मनुष्यजिसकीआवश्यकता हैउसे समझ नहींपायेगा औरजिसकीआवश्यकतानहीं है उसकोआवश्यकतामानकर अपनाअमूल्यजीवनखो देगा।
गुरुदेव का सान्निध्य साधक के लिए एक सलामत नौका है जो अंधकार के उस पार निर्भयता के किनारे पहुँचाती है। जो साधक अपने साधनापथ में ईमानदारी से और सच्चे हृदय से प्रयत्न करता है और ईश्वर साक्षात्कार के लिए तड़पता है उस योग्य शिष्य पर गुरुदेव की कृपा उतरती है।आजकल शिष्य ऐश-आराम का जीवन जीते हुए और गुरु की आज्ञा का पालन किये बिना उनकी कृपा की आकांक्षा रखते है
जोअस्तित्व है उस अस्तित्व का ज्ञान नहीं है इससे हमारा भय जगहें बदल लेता है लेकिन निर्मूल नहीं होता। संसारी लोग सिखा सिखा कर क्या सिखायेंगे ? वे अज्ञानी संसार का बन्धन ही पक्का करायेंगे। जिस फ्रेम में दादा जकड़े गये, पिता जकड़े गये, उसी फ्रेम में पुत्र को भी फिट करेंगे। बन्धन से छुड़ा तो नहीं सकेंगे।आत्मतत्त्व नहीं जानने के कारण ही हमको सुख-दुःख की चोट लगती है।
सत्शिष्य वही है जो गुरु के आदेश के मुताबिक चले। गुरुमुख बनो, मनमुख नहीं। गुरुदेव के वचनों पर चलो। सब ठीक हो जायेगा। बड़े दिखने वाले आपत्तियों के घनघोर बादल गुरुमुख शिष्य को डरा नहीं सकते। उसके देखते देखते ही वे बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। गुरुमुख शिष्य कभी ठोकर नहीं खाता। जिसको अपने गुरुदेव की महिमा पर पूर्ण भरोसा हो...ता है ऐसा शिष्य इस दुर्गम माया से अवश्य पार हो जाता है।
जो अस्तित्व है उस अस्तित्व का ज्ञान नहीं है इससे हमारा भय जगहें बदल लेता है लेकिन निर्मूल नहीं होता। संसारी लोग सिखा सिखा कर क्या सिखायेंगे ? वे अज्ञानी संसार का बन्धन ही पक्का करायेंगे। जिस फ्रेम में दादा जकड़े गये, पिता जकड़े गये, उसी फ्रेम में पुत्र को भी फिट करेंगे। बन्धन से छुड़ा तो नहीं सकेंगे।आत्मतत्त्व नहीं जानने के कारण ही हमको सुख-दुःख की चोट लगती है।

वेदान्त ज्ञान

दुनियाँ मेरा शरीर है सम्पूर्ण विश्व मेरा शरीर है। जो ऐसा कह सकता है वही आवागमन के बन्धन से मुक्त है। वह तो अनन्त है। कहाँ जायेगा और कहाँ से आयेगा ? सारा विश्वब्रह्मांड उसमें हैं।वेदान्त रसायनविद्या है के समान प्रयोगत्मक विज्ञान है।वेदान्त निराशावाद नहीं है। वह तो आशावाद का सर्वोच्च शिखर है।किसी भी प्रसंग को मन में लाकर हर्ष, शोक के वशीभूत मत हो जाना। मैं अजर हूँ, अमर हूँ। मेरा जन्म नहीं, मेरी मृत्यु नहीं। मैं निर्लिप्त आत्मा हूँ। यही भावना दृढ़ रीति से हृदय में धारण करके जीवन व्यतीत करना, इसी भाव की निरन्तर सेवा करना और उसी में तल्लीन रहना।मुक्ति अथवा आत्मज्ञान यह तेरे ही हाथ में है। अमुक क्या कहता है क्या नहीं, इस पर यदि ध्यान दिया करें तो कुछ काम नहीं कर सकते।
सत्शिष्य वहीहै जो गुरु केआदेश केमुताबिक चले।गुरुमुख बनो, मनमुख नहीं।गुरुदेव केवचनों पर चलो।सब ठीक होजायेगा। बड़ेदिखने वालेआपत्तियों केघनघोर बादलगुरुमुखशिष्य को डरानहीं सकते।उसके देखतेदेखते ही वेबादलछिन्न-भिन्न होजाते हैं।गुरुमुखशिष्य कभीठोकर नहीं खाता।जिसको अपनेगुरुदेव कीमहिमा परपूर्ण भरोसाहोता है ऐसाशिष्य इसदुर्गम मायासे अवश्य पारहो जाता है।
आत्म-साक्षात्कारी सदगुरुदेव और ईश्वर में तनिक भी भेद नहीं है। दोनों एक, अभिन्न और अद्वैत हैं।गुरुदेव का सान्निध्य साधक के लिए एक सलामत नौका है जो अंधकार के उस पार निर्भयता के किनारे पहुँचाती है। जो साधक अपने साधनापथ में ईमानदारी से और सच्चे हृदय से प्रयत्न करता है और ईश्वर साक्षात्कार के लिए तड़पता है उस योग्य शिष्य पर गुरुदेव की कृपा उतरती है।