Tuesday, June 22, 2010

रैन की बिछड़ी चकवी आन मिले प्रभात।
सत्य का बिछड़ा मानखा दिवस मिले नहीं रात।।

हे चिड़िया ! सन्ध्या हुई है। तू मुझसे बिछुड़ जाएगी। दूसरे घोंसले में चली जाएगी लेकिन प्रभात को मिल जाएगी। एक बात सुन। सत्य से जो मनुष्य बिछुड़ गया, मनुष्य जन्म पाकर भी उस सत्यस्वरूप परमात्मा में स्थिति नहीं की, ऐसा मनुष्य फिर सत्य से न सुबह मिलेगा, न शाम मिलेगा..., न रात मिलेगा, न प्रभात मिलेगा।

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