Sunday, June 20, 2010

मृत्यु किसकी होती है ?

अभी तो जिसे तुम जीवन कहते हो वह जीवन नहीं और जिसे मृत्यु कहते हो वह मोत नहीं है । केवल प्रकृति मे परिवर्तन हो रहा है । प्रकृति में जो हो रहा है वह सब परिवर्तन है । जो पैदा होता दिख रहा है वाही नस्त होता नजर अत है । जिसका सर्जन होता दीखता है वाही विसर्जन ही और जाता नजर अत है । पेड़ - पौधे हो या पशु - पक्सी, नगर हो या जंगल , पहाड़ हो या खाइयां , सागर हो या मरुस्थल, सब परिवर्तन रूपी सरिता मे बहे जा रहे है । जहा नगर थे वहा वीरान हो गये, जहा बस्तियां कड़ी हैं, जहा मरुस्थल थे वहा आज महासागर हिलोरें ले रहे हैं और जहा महासागर थे वहा मरुस्थल खड़े हैं । बड़ें - बड़ें खड्डों की जगह पहाड़ खड़े हो गये और जहा पहाड़ थे वहां आज घाटियाँ, खाइयाँ बनी हुई हैं । जहा बड़े बड़े वन थे वहां भूमि बंजर और पथरीली हो गयी और जो बंजर थी, पथरीली थी वहा आज बाग-बगीचों के रूप मे हरियाली फैली हुई है ।

चाँद सफ़र में, सितारे सफ़र में ।
हवाएं सफ़र में, दरियाके किनारे सफ़र में ।
अरे सायर ! जहाँ की हर चीज सफ़र में ।
... तो आप बेसफ़र कैसे रह सकते हैं ?

आप जिस शरीर को 'में' मानते हैं वह शरीर भी परिवर्तन की धरा मे बह रहा है । प्रतिदिन शरीर के पुराने कोस नस्त हो रहे हैं और उनकी जगह नए कोस बनते जा रहे हैं । इस स्थूल शरीर से सुक्स्म शरीर का वियोग होता है अर्थात सुक्स्म शरीर देहरूपी वस्त्र बदलता है इसको लोग मोत कहते हैं और शोक मे फुट-फुटकर रोते हैं ।

भगवन राम ने जब बलि का वध किया तो बलि की पतनी राम के पास आयी और अपने पति के वियोग में फुट-फुटकर रोने लगी। राम ने उसको धीरज बढ़ाते कहा :

"है तारा ! तू किसके लिए विलाप कर रही है ? शरीर के लिए या जिव के लिए ? पंचमहाभूतो द्वारा रचित शरीर के लिए यदि तू रोटी है तो यह तेरे सामने ही पड़ा है और जीवके लिए रोटी है तो जिव नित्य हैं, वह मरता नहीं । "

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