शिष्य चार प्रकार के होते हैं:
1. एक वे होते हैं जो गुरु के भावों को समझकर उसी प्रकार से सेवा, कार्य और चिंतन करने लगते हैं | 2.दूसरे वे होते हैं जो गुरु के संकेत के अनुसार कार्य करते हैं |
3.तीसरे वे होते हैं जो आज्ञा मिलने पर काम करते हैं और
4.चौथे वे होते हैं जिनको गुरु कुछ कार्य बताते हैं तो ‘हाँ जी… हाँ जी…’ करते रहते हैं किन्तु काम कुछ नहीं करते | सेवा का दिखावामात्र ही करते हैं |
गुरू की सेवा साधु जाने, गुरुसेवा का मुढ पिछानै |
Tuesday, April 17, 2012
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