Wednesday, April 11, 2012

आदत के गुलाम ....

एक सज्जन ने पूछाः "गाँधी जी के बारे में उनके आश्रमवासी प्यारेलाल ने जो लिखा है, क्या आप उसे जानते हैं?"
दूसराः "हाँ, मैं उसे जानता हूँ।"
पहलाः "क्या यह सब सत्य होगा?"
दूसराः "हमें उस पर विचार करने की आवश्यकता ही क्या है? जिसे अभद्रता पसन्द है, चन्द्रमा में भी कलंक देखेगा। वह चन्द्र की शीतल चाँदनी का लाभ लेने के बदले दूसरी-तीसरी बातें करेगा, क्या यह ठीक माना जायेगा?
मैंने अनेक अनुभवों के बाद यह निश्चय किया है कि जिस बरसात से फसल पैदा न हो, वह बरसात नहीं झींसी है। इस संसार में ऐसे अनेक मनुष्य हैं, जो अपनी अलभ्य चैतन्य शक्ति को इधर-उधर नष्ट कर देते हैं। ऐसे लोग अमृत को भी विष बनाकर ही पेश करते हैं।"

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