Wednesday, September 26, 2012

उठ जाओ और वैराग्य का आश्रय लो। जैसे साईकल के पहिए निकाल दो तो साईकल
चलना मुश्किल है ऐसे ही जीवन से अभ्यास और वैराग्य हटा दो तो प्रभु की
यात्रा होना मुश्किल है।

अतः तुम ध्यान का अभ्यास करो और विवेक के साथ अपने भीतर छुपे हुए वैराग्य
को जगाकर वैराग्य में ही राग रखो। वैराग्यरागरसिको भवः। संसार के राग से
बचकर प्रभु परायण हो जाओ।

भगवन कहते हैं: जैसे कोई व्यक्ति आँखों में शूल नहीं भोंकना चाहता ऐसे ही
समझदार व्यक्ति अपने आप को विषयों के शूल नहीं भोंकना चाहता। जैसे कोई भी
समझदार मनुष्य अपने भोजन में विष नहीं डालना चाहता, ऐसे ही हे उद्धव !
जिज्ञासु व्यक्ति अपने जीवन में विषयों का विष नहीं डालना
चाहता।…….पूज्यपाद श्रीबापूजी

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