श्री योग वसिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
इतना सुन वाल्मीकिजी बोले हे राजन! महारामायण औषध तुमसे कहता हूँ उसको सुनके उसका तात्पर्य हृदय में धारने का यत्न करना । जब तात्पर्य हृदय में धारोगे तब जीवन्मुक्त होकर बिचरोगे । हे राजन् वह वशिष्ठजी और रामचन्द्रजी का संवाद है और उसमें, मोक्ष का उपाय कहा है । उसको सुन कर जैसे रामचन्द्रजी अपने स्वभाव में स्थित हुए और जीवन्मुक्त होकर बिच
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
इतना सुन वाल्मीकिजी बोले हे राजन! महारामायण औषध तुमसे कहता हूँ उसको सुनके उसका तात्पर्य हृदय में धारने का यत्न करना । जब तात्पर्य हृदय में धारोगे तब जीवन्मुक्त होकर बिचरोगे । हे राजन् वह वशिष्ठजी और रामचन्द्रजी का संवाद है और उसमें, मोक्ष का उपाय कहा है । उसको सुन कर जैसे रामचन्द्रजी अपने स्वभाव में स्थित हुए और जीवन्मुक्त होकर बिच
रे हैं वैसे ही तुम भी बिचरोगे ।
राजा बोले: हे भगवान्! रामचन्द्रजी कौन थे कैसे थे और कैसे होकर बिचरे सो कृपा करके कहो?
वाल्मीकिजी बोले, हे राजन्! शाप के वश से सच्चिदानन्द विष्णुजी ने जो अद्वैत ज्ञान से सम्पन्न हैं, अज्ञान को अंगीकार करके मनुष्य का शरीर धारण किया । इतना सुन राजा ने पूछा, हे भगवान्! चिदानन्द हरि को शाप किस कारण हुआ और किसने दिया सो कहो?
राजा बोले: हे भगवान्! रामचन्द्रजी कौन थे कैसे थे और कैसे होकर बिचरे सो कृपा करके कहो?
वाल्मीकिजी बोले, हे राजन्! शाप के वश से सच्चिदानन्द विष्णुजी ने जो अद्वैत ज्ञान से सम्पन्न हैं, अज्ञान को अंगीकार करके मनुष्य का शरीर धारण किया । इतना सुन राजा ने पूछा, हे भगवान्! चिदानन्द हरि को शाप किस कारण हुआ और किसने दिया सो कहो?

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