श्री योग वसिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
एक समय भारद्वाज चित्त को एकाग्र करके मेरे पास आये और मैंने उसको उपदेश किया था । वह उसको सुनकर वचनरूपी समुद्र से साररूपी रत्न निकाल और हृदयमें धरकर एक समय सुमेरु पर्वत पर गया । वहाँ ब्रह्माजी बैठे थे, उसने उनको प्रणाम किया और उनके पास बैठकर यह कथा सुनाई । तब ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उससे कहा, हे पुत्र! कुछ वर माँग; मैं तुझ पर प्रसन
प्रथम वैराग्य प्रकरण
गतांक से आगे.....
एक समय भारद्वाज चित्त को एकाग्र करके मेरे पास आये और मैंने उसको उपदेश किया था । वह उसको सुनकर वचनरूपी समुद्र से साररूपी रत्न निकाल और हृदयमें धरकर एक समय सुमेरु पर्वत पर गया । वहाँ ब्रह्माजी बैठे थे, उसने उनको प्रणाम किया और उनके पास बैठकर यह कथा सुनाई । तब ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उससे कहा, हे पुत्र! कुछ वर माँग; मैं तुझ पर प्रसन
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हुआ हूँ । भारद्वाज ने, जिसका उदार आशय था, उनसे कहा, हे भूत-भविष्य के
ईश्वर! जो तुम प्रसन्न हुए हो, तो यह वर दो कि सम्पूर्ण जीव संसार-सुख से
मुक्त हों और परमपद पावें और उसी का उपाय भी कहो । ब्रह्माजी ने कहा, हे
पुत्र! तुम अपने गुरु वाल्मीकिजी के पास जाओ । उसने आत्मबोध महारामायण
शास्त्र का जो परमपावन संसार समुद्र के तरने का पुल है, आरम्भ किया है ।
उसको सुनकर जीव महामोहजनक संसार समुद्र से तरेंगे । निदान परमेष्ठी ब्रह्मा
जिनकी सर्वभूतों के हित में प्रीति है आप ही, भारद्वाज को साथ लेकर मेरे
आश्रम में आये और मैंने भले प्रकार से उनका पूजन किया । उन्होंने मुझसे
कहा, हे मुनियोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकि! यह जो तुमने रामके स्वभाव के कथन का
आरम्भ किया है इस उद्यम का त्याग न करना; इसकी आदि से अन्त पर्यन्त समाप्ति
करना; क्योंकि यह मोक्ष उपाय संसार रूपी समुद्र के पार करने का जहाज और
इससे सब जीव कृतार्थ होंगे ।

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