श्री
योगवाशिष्ठ महारामायण' के निर्वाण प्रकरण के 208वें सर्ग में आता हैः "हे
रामजी ! जिसकी संतों की संगति प्राप्त होती है, वह भी संत हो जाता है।
संतों का संग वृथा नहीं जाता। जैसे, अग्नि से मिला पदार्थ अग्निरूप हो जाता
है, वैसे ही संतों के संग से असंत भी संत हो जाता है और मूर्खों की संगति
से साधु भी मूर्ख हो जाता है। जैसे, उज्जवल वस्त्र मल के संग से मलिन हो
जाता है, वैसे ही मूढ़ का संग करने से साधु भी मूढ़ हो जाता है। क्योंकि पाप
के वश उपद्रव भी होते हैं, इसी से दुर्जनों की संगति से साधु को भी
दुर्जनता घेर लेती है। इससे हे राम! दुर्जन की संगति सर्वथा त्यागनी चाहिए
और संतों की संगति कर्त्तव्य है। जो परमहंस संत मिले और जो साधु हो और
जिसमें एक गुण भी शुभ हो, उसका भी अंगीकार कीजिए, परंतु साधु के दोष न
विचारिये, उसके शुभ गुण ही ग्रहण कीजिये।"
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