Wednesday, April 14, 2010
भगवान् प्रेम करते है तो अपनेमें लीन कर देते है, प्रेमका तो अंत होता नहीं ,भक्तिरस, प्रेमरस, प्रेमका आस्वादन है,भगवान् को जितना प्यारा भक्त होता है , उतना प्यारा और कोई नहीं है !! ऐसे अपने आपको देनेवाले प्रभुके चरणोंकी शरण हो जाय, हे नाथ ! हे नाथ !! अपने आपको समर्पित कर दें ! सर्वथा भगवान् को समर्पित कर दें ! भगवान् आनंदमग्न, मस्त हो जाते है ,वो मेरा है, मैं उसका हूँ । मेरा है, मेरा है ... कहते-कहते 'मैं उसीका हूँ' हो जाय । जैसे गंगाजीमें जाते-जाते डूब जाय !! ऐसे ही परमात्माकी शरण जाते-जाते डूब जाय, परमात्मा ही रह जाय ,ऐसे अनंत प्रेममें मस्त होते है, मौज में मग्न हो जाते है एकदम ! आनद ही आनंद ! अपार आनंद ! असीम आनंद !
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment