Thursday, April 15, 2010
वस्तुओं से प्राप्त जो सुख है अथवा हमारी मान्यताओं के अनुसार जो सुख है वह वास्तविक में राग का सुख है, आत्मा का सुख नहीं है। हमारी इच्छा के खिलाफ जो हो रहा है उससे जो दुःख होता है वह वास्तविक में बाहर दुःख नहीं है। हमारी मान्यताएँ हमको दुःख देती हैं।को काहू को नहीं सुख दुःख करी दाता।निज कृत कर्म हि भोगत भ्राता।।
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